कोई नाम न दो… भाग – 1

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Mohini Tiwari
Mohini Tiwari

अभी कुछ ही दिन पहले अविनाश ने उसके पड़ोस का मकान किराए पर लिया था। थोड़े से असबाब के साथ वह उसमें रहने लगा था।अकेला था। बहुत तड़के घर छोड़ देता। स्कूल जाता। शाम तक पढ़ा कर वापस घर आता। कुछ आराम करता, खाना बनाता, घर के काम करता, समय मिलता तो गीतों का सर्जन करता। उनके प्रकाशन के लिए पत्र-पत्रिकाओं के दफ्तरों के चक्कर लगाता। कवि गोष्ठियों में जाता। भावुक हृदय के मधुरतम उद्गारों को मुखरित करता। वाह-वाह के असंख्य शब्दों की भीड़ में अपनी तरल आँखों को मूँद कर पुलकित हो उठता। इतना ही सीमित था उसका जीवन।

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और वह रोज बरामदे वाले कमरे की बड़ी सी खिड़की की चौड़ी मुंडेर पर बैठकर उसकी दिनचर्या देखती। कितना सीधा-सादा युवक था। पच्चीस-छब्बीस वर्ष का छरछरा बदन, गेहुँआँ रंग, बड़ी-बड़ी आँखें, पतले-पतले कलात्मक सुर्ख होठों पर छोटी-छोटी मूछों का स्थायी डेरा। बेहरबीती से काढ़े गए सिर के बाल अक्सर हवा में उड़ कर उसके चौड़े मस्तक पर लहराने लगते। वह लापरवाही में उनको अपने दोनों हाथों से ऐसे ही पीछे कर दिया करता था, मानो उसे उनसे कोई सरोकार ही न हो। यदा-कदा उसकी घुँघराली लटें माथे पर ऐसे ठिठक जाती कि अनायास ही देखने वालों को उस पर प्यार आ जाता।

गर्मियों में सफेद पैयजामा-कुर्ता, पैरों में मामूली चमड़े की चप्पल, जाड़ों में भूरे रंग का ऊनी सदरी। बस इतनी सीमित थीं उसकी शारीरिक आवश्यकताएँ।

जब कभी अपने कार्यों से फुरसत पाकर वह बारामदे में पड़ी बेंत की कुर्सी पर आँखें बंद किए बैठता, सपनों की दुनिया में खो जाता। चिड़िया-चिरगुने आते। उसके सिरहाने निडर बैंठते। इधर-उधर कुर्सी पर चोंच मारते, फुर्र हो जाते।
वह खिड़की के सीखचों के पीछे से सब देखती। क्षुब्ध होती। मन चाहता दौड़कर उस तक आए। वही खड़ी रहे। वह सोता रहे और वह उसकी रखवाली में चिड़ियों को शोर करने से रोकती रहे। मगर सामाजिक बंधन। कैसे तोड़ती उन्हें। उदास हो जाती। खिडक़ी की चौखट को पल्लू से पोंछकर वहीं बैठ जाती और जागती आँखों से घंटों सो जाया करती। जब माँ आवाज़ देती तभी हड़बड़ा कर वह भीतर चली जाती। खिड़की सूनी हो जाती।

ऐसा प्रतिदिन ही होता। वह उसके हर पल का मौन जायजा लेती और अपने इर्द-गिर्द की घटनाओं में बेखबर। बेपरवाह।
जब तब खिड़की की चौखट पर आ बैठना उसकी आदत-सी हो गई थी। कभी व्यस्तता के कारण समय न मिलता, तो भी वह किसी-न-किसी बहाने कमरे तक आती। एक पल रुकती। पर्दा हटाकर खिड़की से सड़क के उस पार देखती। मकान पर एक नजर डालती और चली जाती। समय मिलता तो घंटों चौखट पर बैठी कुछ-न-कुछ करती रहती। बंद दरवाजे पर लटके ताले के खुलने की प्रतीक्षा करती रहती।

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अविनाश अभी तक मोहल्ले में अनजान, अपरिचित था। न मोहल्ले में उसे कोई जानता था और न ही वह किसी पड़ोस को जान पाया था। शायद उसने परिचय का दायरा बढ़ाना ही नहीं चाहा था। घर से जब बाहर आता तो उसकी निगाहें नीचे होतीं। वापस घर आता तब भी निगाहें जमीन को भी देखतीं। सिर उठा कर कभी इर्द-गिर्द देखा ही नहीं था। एक हाथ में रजिस्टर, कुछ किताबें और दूसरा हाथ खाली, मगर उसके शरीर से सटा। पाँव सहमते उठते। आगे बढ़ते। दरवाजे तक पहुंचते ही वह बाहर पड़ी बाँस की कुर्सी पर रजिस्टर और किताबें रखता। चाभी निकालकर ताला खोलता। रजिस्टर और किताबों को फिर उठाता। कमरे में दाखिल हो जाता। दरवाजे से लगे बायीं ओर बिजली के स्विच को ऑन करता। रोशनी छिटकते, कमरा बंद कर लेता। कभी ऐसा भी होता कि शाम को उसके कमरे के दरवाजे खुले दिखाई देते। नहीं तो अगले दिन सुबह ही दरवाजा पल भर के लिए खुलता और दिन भर के लिए बंद हो जाता। वह अपने एकांत जीवन के इन खामोश लम्हों को कैसे काटता, अर्चना सोच कर अनमनी हो उठती।

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हर महीने की चार तारीख पर मकान मालिक के घर जाता, किराया देता और तभी मकान मालिक भी पूँछ बैठते।
“अरे अविनाश तुम इतनी जल्दी, क्यों कष्ट करते हो?”
“इसमें तकलीफ की क्या बात, किराया तो देना ही है, क्यों न जल्दी दे दूँ।”
“आप ठीक से है न।”
“जी आपकी दुआ है, आप सब कैसे हैं?”
“ठीक ही हैं।”
“अच्छा।”
“नमस्ते।”
“नमस्ते।”
वापस घर आ जाता। बस।
न कहीं आना न जाना।

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पाँच महीनों में इतना जरूर हो गया था कि अड़ोस-पड़ोस के बच्चे उसको जब कभी आता-जाता देखते तो बड़े सम्मान से दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते।
प्रतिउत्तर में वह मात्र मुस्कुरा दिया करता था।
हाँ यदा-कदा बच्चों के माता-पिता उसके पास अब आने लगे थे। कभी बच्चों की प्रोग्रेस पूँछने तो कभी बच्चों को ट्यूशन देने के लिए। अभी तक उसने किसी को पढ़ाना स्वीकार नहीं किया था।
एक दिन वह रोजाना की भाँति स्कूल से लौट रहा था। पीछे से किसी ने आवाज़ दी।
“अविनाश बाबू नमस्कार।”
” नमस्कार।” वह पीछे मुड़कर आगंतुक को पहचानने का प्रयास करने लगा।”
“आपने मुझे पहचाना नहीं।”
“जी नहीं।”
“कैसे पहचानोगे बेटा? कभी भी तो घर के बाहर नहीं निकलते हो। सच, तुम जैसे भगवान स्वरूप इंसान ने इस छोटे से मोहल्ले में आकर नैतिकता का एक अपूर्व मापदंड स्थापित किया है।”
“ऐसी क्या बात है?”
“अविनाश बाबू यह एक ऐसा मोहल्ला है जहाँ अगल-बगल लोगों की जवान बहू-बेटियाँ रहती हैं। ईश्वर की दुआ से तुम भी जवान हो। मगर तुम्हारा मन बहुत खरा और निष्कलंक है।”
“आप क्या कहना चाहते हैं बाबूजी?”
“अविनाश बाबू मैं डॉ. मिश्रा हूँ। मैं आपसे एक प्रार्थना करना चाहता हूँ।”
“नि:संकोच कहें, आपको अधिकार है।”
“अविनाश बाबू आप मेरी पौत्री को ट्यूशन दे सकें तो बहुत कृपा होगी। वह दसवीं में पढ़ रही है। सोलह-सत्रह वर्ष की है। हम उसे किसी अनजान से पढ़वाना पसंद नहीं करेंगे।”
“आप कहाँ रहते हैं?”
“आपके ठीक सामने वाला मकान ही तो हमारा है।”
“देखिए वैसे तो मुझे को आपत्ति नहीं, किंतु मैं अपने कार्यों में इतना अधिक व्यस्त हूँ कि समय निकाल पाऊँगा, यकीन नहीं होता।”
“अविनाश बाबू यह बुजुर्ग आपसे निवेदन करता है।”
” मैं आपका आदर करता हूँ मगर…”
” रोज नहीं तो सप्ताह में एक या दो दिन ही समय निकाल लीजिए।”
“मैं रेगुलर ट्यूशन तो नहीं कर पाऊँगा। सप्ताह में दो-तीन दिन भी नहीं। हाँ पड़ोस का मामला है तो इतना जरूर करूँगा कि जब कभी समय होगा आकर विषय संबंधी उनकी घटनाएं दूर कर दूँगा। इससे अधिक तो समय के अभाव में मुश्किल हो जाएगा।”
” बहुत मेहरबानी होगी।”
“आप शर्मिंदा न करें, मुझे बता दें उन्हें कब समय रहता है। मैं उसी समय पर आ जाया करूँगा।”
“इससे पहले कि आप समय निकाल कर उसे पढ़ाने आएँ। मैं चाहूँगा कि आप फीस भी बता दें।”
“बाबूजी ज्ञान को बेचना उचित नहीं, उसे दान ही किया जाना चाहिए।”
“किंतु यह तो बहुत अनुचित होगा।”
” बस मेरा भी यही अनुरोध है। कृपया स्वीकार करें।”
“जैसी आपकी इच्छा। और हाँ आज शाम को घर आइए। हम सबके साथ चाय पीजिए।”
“चाय?”
“क्यों? क्या आप चाय नहीं पीते हैं?”
“नहीं, ऐसा तो नहीं।”
“बेटा संकोच मत करो। आप हमारे पड़ोसी हो, फिर ज्ञानदाता भी।”
“जी अच्छा आऊँगा।”
दोनों अपने-अपने रास्ते हो लिए। पड़ोस का नाम सुनकर अविनाश का कौतूहल जागा।

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घर के बरामदे पर चढ़ते-चढ़ते उसने पड़ोस के मकान पर एक अपरिचित दृष्टि डाली। उसकी निगाहें खिड़की पर बैठी अर्चना की निगाहों से टकरा गई। वह शर्म से गढ़ गया। पसीना छूटने लगा। चेहरा लाल हो उठा। सारे शरीर में सिरहन-सी दौड़ गई। अनियंत्रित खिसकता वह अपने कमरे में दाखिल हो गया। बत्ती जलाना भूल गया था। अंधेरे में ही दरवाजे को बंद किया। चिटकनी लगाई। बिस्तर पर अनमना-सा लेट गया।
वह क्या सोचेगी? लोगों से क्या कहेगी, वह क्या सोचेंगे? ऐसे ही कितने सवालात उसके मन को झकझोरते रहे। वह टकटकी लगाए कमरे के अंधेरों में छत पर न जाने किन प्रकाश किरणों को खोजता रहा।

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शाम होने को थी। पड़ोस में उसकी प्रतीक्षा हो रही थी। वह यह भूल गया था। जब बहुत देर हो गई वह डॉ. मिश्रा के घर नहीं पहुँचा, तब आखिर में बूढ़े मिसिर जी अपनी छड़ी लिए उसके कमरे तक आ गए। ऊँचे स्वर में उन्होंने अविनाश को आवाज दी। हड़बड़ाहट में उसने दरवाजा खोला।
“अरे, आप?”
“क्या भूल गए बेटा?”
” नहीं, नहीं”
” फिर चलो, घर पर सब इंतजार कर रहे हैं। किसी ने भी चाय नहीं पी है।”
“बाबू जी आज क्षमा करें, फिर कभी आऊँगा।”
“क्यों भाई क्या बात है?”
“कुछ नहीं। मन कुछ अस्वस्थ और अशांत है।”
“अरे आओ भी, घर में अकेले पड़े रहते हो न, इसी से उदासी घिर आती है। घर चलो। पाँच-छः लोगों में बैठोगे, मन ठीक हो जाएगा।”
“बाबू जी आज यदि क्षमा कर दें तो कृपा होगी।”
“जैसी तुम्हारी इच्छा। मैं ज़बरदस्ती हरगिज़ नहीं करूँगा। हाँ हमारे लायक कोई सेवा हो तो अवश्य बताओ।”
“बस आपकी मेहरबानी बनी रहे।”
“मिसिर जी चले गए थे।”
“अविनाश घर पर ही पड़ा रहा।”

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घर जाकर जब उन्होंने अविनाश के न आने की बात अपने बेटे को बताई तो अर्चना ने बड़े से पर्दे के पीछे से सब सुन लिया। उसका हर्षित मन उदास हो गया। बेचैनी भर गई, क्या कहती किससे कहती, कोई भी तो उसका हम उम्र नहीं था, फिर अगर कोई होता भी तो वह क्या कहती। कोई बात भी तो नहीं थी। कितनी ही देर तक वह अपने मनोभावों में उलझती पर्दे का सहारा लिए खड़ी रही।

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‘अर्चू’ मिसिर जी ने आवाज दी।
“आई बाबा”
साड़ी के पल्लू से अपनी नम आँखों को पोंछते हुए वह मिसिर जी के कमरे में चली गई।
“बेटी, मैंने अविनाश से तुम्हें पढ़ाने के लिए कह दिया है। रोज तो नहीं, सप्ताह में एक-दो दिन आ जाया करेंगे। तुम्हारी कठिनाइयों का समाधान कर जाएँगे। तुम लगन से पढ़ो, हर विषय की कठिनाइयाँ निकाल कर रखो। वह जब आएँ तो पूछ लेना।”
“मगर कब…” कुछ कहते-कहते वह रुक गई।”
“हाँ, कहो, कहो”
“कुछ नहीं बाबा” वह झेंप गई थी। मिसिर जी को प्रश्न पूछने का समय दिए बिना ही वह दूसरे कमरे में चली गई।

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वह बाहर वाले कमरे की खिड़की की ओर गई। परदा किनारे करके बाहर झाँका। कमरा अभी भी बंद था। पल भर कुछ सोचती वह वहीं खड़ी रही फिर पलट कर अपनी पढ़ने वाली मेज की ओर बढ़ गई। किताबों को सलीके से लगाया। कॉपियों को अलग रखा। अंग्रेजी की किताब लेकर पढ़ने बैठ गई।
कितने ही दिन नियमपूर्वक वह अपनी मेज पर पढ़ने बैठती रही। हर आहट पर संयत हो जाती। न जाने क्यों हर पल उसे लगता अविनाश आ गया। दौड़कर दरवाजे तक जाती। उसे न पाकर वापस कमरे आ जाती। मन कसमसा उठता।
धीरे-धीरे एक महीना बीत गया। अविनाश मिसिर जी के घर नहीं गया। मिसिर जी भी दोबारा उसे न तो मिले और न ही घर आने का उससे उन्होंने अनुरोध किया।

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एक दिन वह बाहर बरामदे में कुर्सी डाले बैठा था। सामने सड़क पर कुछ बच्चे खेल रहे थे। खेलते-खेलते एक लड़का उसके बरामदे पर चढ़ आया। वह भूल गया कि यह उसके मास्टर साहब का घर था। अविनाश उसे निस्पृह भाव से देख रहा था। वह घबराहट में सन्न खड़ा था। दूसरे बच्चे उसे देखकर सड़क से दूर कहीं छिप गए। उसे जब कुछ नहीं सूझा तो झट अविनाश के पैर छूने को झुक गया।
“मास्टर साहब नमस्ते।”
“तुम कहाँ रहते हो?” अविनाश ने पूछा।
“इस मकान के बाद वाले मकान में।”
“मेरे मकान के सामने जो लोग रहते हैं, उन्हें तुम जानते हो?” अविनाश ने पूछा।
“जी हाँ, मिसिर जी का मकान है। वह आजकल बहुत बीमार हैं।”
“बहुत बीमार हैं?” अविनाश ने आश्चर्य भाव से प्रश्न किया।
“जी बहुत बीमार हैं। वह बीमार तो कई वर्षों से हैं, किंतु आजकल अधिक बीमार हैं।”
“तुम उनके घर जाते हो?” उसने पुनः प्रश्न किया।
“जी”
“कौन-कौन रहता है वहाँ?”
“मिसिर जी, उनके लड़के और उनकी बेटी।”
“तुम मुझे उनके घर ले जा सकते हो?”
“जी हाँ आइए”, अब तक वह घबराया लड़का काफी निश्चिंत हो गया था।

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अविनाश ने कपड़े बदले, बालों को बेपरवाही से अपने दोनों हाथों से पीछे किया, पैरों में चप्पल डाली, गली के बाहर आ गया।
“लाइए सर, मैं ताला लगा दूँ।”
अविनाश ने उस छोटे लड़के को ताला-चाबी दे दिया। उसने पल भर में कमरे में ताला लगा दिया और तेज कदमों से मिसिर जी के घर की ओर चल दिया। अविनाश एक-एक कदम ऐसे सहम कर रखता बढ़ रहा था मानो वह कोई अपराधी हो।
मिसिर जी के घर पर पहुँचते ही वह छोटा लड़का दरवाजा खुला पाकर अंदर चला गया। अविनाश बाहर खड़ा प्रतीक्षा करने लगा।
“माँ जी मास्टर साहब आए हैं। बाबू जी को देखने आए हैं।”
“कौन रे?”
“वही जो सामने वाले मकान में रहते हैं।”
“जा बाबा से पूछ ले।”
“बालक दौड़ता हुआ मिसिर जी के कमरे में चला गया।”
“बाबा”
“हाँ?”
“सामने वाले मास्टर साहब आए हैं।”
“अरे कहाँ हैं?”
“बाहर खड़े हैं।”
“जा, जल्दी जा, बुला ला उन्हें। बाहर क्यों छोड़ आया?”
“जाता हूँ बाबा।”
बालक दौड़ कर बाहर आया। अविनाश को लेकर मिसिर जी के कमरे की ओर चल दिया। मिसिर जी के बड़े लड़के श्यामानंद जी भी अविनाश को बुलाने बैठक तक आ गए थे।
“मास्टर साहब, नमस्ते यह तो आपका ही घर है। संकोच की क्या बात? आप बाहर ही क्यों खड़े रहे? अंदर आ जाते।”
“कुछ नहीं, संकोच तो नहीं, बस ऐसे ही।”
“नहीं, नहीं मास्टर साहब, आप तनिक भी संकोच न करें। हम सब आपका बहुत आदर करते हैं।”
“बाबू जी कैसे हैं?”
“अब कुछ बेहतर हैं, पेट का रोग है, बहुत पुराना है, जहाँ जरा-सी बदपरहेजी हुई कि बस तकलीफ बढ़ जाती है।”
“कहाँ हैं बाबू जी?”
“आइए, बगल वाले कमरे में हैं।”
श्यामानंद अविनाश को मिसिर जी के कमरे में ले आए। वह सो रहे थे।
“कल रात भर पिता जी सो नहीं पाए, इसलिए शायद गहरी तन्द्रा में हैं।”
“सोने दीजिए, मैं फिर आ जाऊँगा।”
“नहीं, नहीं आप एक मिनट बैठें, मैं अभी आया।”

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श्यामानंद कमरे से बाहर चले गए। अविनाश ने कमरे में एक सरसरी दृष्टि दौड़ाई। अर्चना गिलास में पानी लिए कमरे के दरवाजे के सामने से गुजरी। अविनाश की नजर उस पर पड़े बिना नहीं रह सकी। नजर मिलते ही उसने आँखें नीचे कर लीं और अपने में संकुचित होता गया। ‘मास्टर साहब’ श्यामानंद ने कमरे में प्रवेश करते हुए कहा, “आपकी तो जितनी प्रशंसा की जाए थोड़ी है, उम्र ऐसी है जिसमें लोग बहक जाते हैं लेकिन आप कितने संयमित हैं।”

“भाई साहब, मैं इतनी प्रशंसा के योग्य नहीं हूँ।”
“आप क्या हैं, आप स्वयं कैसे समझ सकते हैं?”
“अच्छा तो आज्ञा दीजिए।”
“कैसी बातें कर रहे हैं आप पहली बार हमारे घर आए, भला बिना कुछ नाश्ता किए कैसे चले जाएँगे।”
“मैं फिर कभी आऊँगा, आज यह वक्त नाश्ते का नहीं।”
“नहीं मैं अभी आया।” कहते-कहते श्यामानंद कमरे से बाहर जाने लगे।
“आप तो बहुत तकुल्लुफ कर रहे हैं। इन सब की कोई जरूरत नहीं।”
“देखिए मास्टर साहब तकुल्लुफ की कोई बात नहीं, घर में जो है आपके आतिथ्य सत्कार में प्रस्तुत करेंगे। तकुल्लुफ तो आप कर रहे हैं। भला यह भी कोई बात हुई।”
अविनाश कुछ कहना चाहता था, किंतु जैसे ही उसने जमीन से अपने दृष्टि उठाई, सामने अर्चना को खड़ा देखकर हतप्रभ रह गया। उसके एक हाथ में पानी का गिलास और दूसरे हाथ में प्लेट में कुछ मिठाई थी।
“मास्टर साहब नमस्ते।” बड़े अदब के साथ दोनों हाथ जोड़कर अर्चना ने अभिवादन किया। ”
“नमस्ते।”
अर्चना ने प्लेट और पानी का गिलास एक स्टूल पर रख दिया। वह बाहर चली गई और अंदर जाकर अपनी दादी को अविनाश के आने की सूचना दी। दादी बाहर आईं।
“नमस्ते माता जी” अविनाश ने खड़े होकर अभिवादन किया।
“खुश रहो बेटा” कहते-कहते उन्होंने धोती के पल्लू से अपना मुँह ढँप लिया।
“आइए बैठिए” मूढ़े पर से उठते हुए उसने माता जी से आग्रह किया।
“नहीं मैं बैठ जाऊँगी, तुम बैठो।”

मिसिर जी की ओर देखते हुए दादी बोलीं, “क्या बताऊँ, क्या करूँ, कुछ समझ नहीं आता। डर लगता है कहीं मेरा सुहाग मेरे ही सामने न लुट जाए। सब कुछ तो उसको समर्पित कर रखा है।” दाहिनी ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा।
अविनाश ने मुड़कर देखा। भगवान कृष्ण की एक छोटी-सी मूर्ति का कितना श्रृंगार किया था। कितनी श्रद्धा और विश्वास से उस पर फूल चढ़ाए गए थे। मानो प्रतिदिन ही नियमपूर्वक ऐसे ही पूजा की जाती हो।
सुगंधित अगरबत्तियों का धुआँ एक लड़ी रूप में पिरोया हुआ ऊपर उठता और धीरे-धीरे खो जाता। चाँदी की कटोरी में घिसा हुआ चंदन। उसकी भीनी-भीनी खुशबू भी बिखर रही थी।

कमरे में बड़ी सादगी थी। पुराने ढंग के बने हुए मकान का जीर्ण-शीर्ण कमरा था। अपने धूमिल रंग में वह अपने बचपन और यौवन की मधुर कहानी आज अपने बुढ़ापे में कहता प्रतीत हो रहा था।
दीवारों का प्लास्टर जगह-जगह से नीचे गिर रहा था। यत्र-तत्र कीलों के गहरे निशान बने हुए थे। एक-दो किताबों से काट कर कुछ धार्मिक चित्र दीवारों पर चिपकाए गए थे, जो घर के लोगों की कलात्मक रुचि और धार्मिक आस्था को प्रकट कर रहे थे।

कमरे में हवा आने-जाने के लिए रोशनदान नहीं था। फर्श से काफी ऊँचे और छत से नीचे एक झरोखा अवश्य बना था। कमरे के एक कोने में पानी आदि निकलने के लिए छोटी-सी नाली कटी हुई थी।
दीवार से सटी मिसिर जी की ऊँची-सी चारपाई पड़ी थी। चारपाई के दाहिने सिरहाने पर एक पीकदान और बायीं ओर आम की लकड़ी की बनी ऊँची-सी मेज रखी हुई थी। उस मेज पर कुछ दवा की पुड़ियाँ पड़ी हुई थीं। किसी वैद्य की दवा चल रही थी। दरवाजे के पीछे मैले शीशे की लालटेन टंगी हुई थी जो अतीत की याद दिला रही थी।
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