कोई नाम न दो…भाग-8

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महाविद्यालय में पढ़ाई आरंभ हो चुकी थी। मिलने-मिलाने और पढ़ने-पढ़ाने के घंटे बढ़ गए थे। कॉलेज के बाद घंटों अर्चना और अविनाश पुस्तकालय में बैठकर पुस्तकें खंगाला करते और नोट्स बनाया करते थे। क्लास टेस्ट में अविनाश हमेशा अर्चना से बाजी मारता रहा, लेकिन अर्चना को इससे ईर्ष्या नहीं थी।

“सर देखा हमारे विश्वास को। हम कहते थे न आपके लिए कोई विषय कठिन नहीं।”
“अर्चना कुछ पूछो नहीं। बहुत मेहनत करनी पड़ रही है। अपना शोध कार्य भी पूरा करना है और यहाँ भी फेल नहीं होना है। कैसे सब हो पाएगा।”
“हम जो हैं। सब हो जाएगा।” और वह हँस पड़ी।
“घर में सब कैसे हैं? कभी मुझे याद करते हैं?”
“सब ठीक हैं किंतु अब आपको कोई याद नहीं करता। जो करता है वह आपके सामने बैठा है।”
“समझ नहीं आता अर्चना मेरा कसूर क्या था?”
“समझने की जरूरत भी क्या है? समझना ही है तो उनका कसूर समझो। आपने कौन-सा गुनाह किया है?”
“चलो छोड़ो बीती बातें। वक्त कितनी तेजी से बीत गया। परीक्षा के लिए केवल दो महीने बचे हैं। पढ़ाई के नाम पर सब जीरो है।”
“हम बताएं। हमारी तो तैयारी पूरी है। हम एग्जाम देंगे। आप ड्रॉप कर जाइए। अगले वर्ष मैं वरिष्ठ छात्र हो जाऊँगी। कैसा रहेगा?”
“बहुत अच्छा रहेगा। लेकिन मैं ड्रॉप नहीं करूँगा।”
“सर अगर आपने ड्रॉप नहीं किया नहीं किया तो जरूर आप टॉप करेंगे और हम आपकी जय-जयकार करने में भागी होंगे।”
“तुम्हारी कल्पना की उड़ान…
खुदा ही जाने।”
“बस घबरा गए?”
“शेक्सपियर तैयार हो गया?”
“सर शेक्सपियर तो शेक्सपियर, हार्डी और बर्नार्ड शॉ भी तैयार है। आप बताइए आप कहाँ हैं?”
“तैयारी चल रही है।”
“ऐसा न हो कि तैयारी चलती ही रहे और हम आगे निकल जाएँ।”
“तुम्हें तो आगे निकलना ही होगा।”
“सर बस आप ही तो हमारे हितैषी हैं।”
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तीन महीने बाद परीक्षा परिणाम घोषित हुआ। अविनाश ने सचमुच टॉप किया था। अर्चना दूसरे नंबर पर थी। अविनाश के अंक देखकर अर्चना फूली नहीं समा रही थी। लेकिन अविनाश के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी।
“सर क्या हुआ? आप उदास हो गए?”
“अर्चू मुझे तुम्हारा अफसोस है।”
“सर कैसा अफसोस? हम भी आपके पीछे हैं।”
“नहीं, तुम्हें मुझसे आगे होना चाहिए था।”
“कैसी बातें करते हैं सर?”
“चलो अगले वर्ष कुछ किया जाएगा।”
“सर हमें तो आपकी कोई बात समझ नहीं आती।”
“वक्त आने पर समझ आ जाएगी।”
“तो अब दाखिला कब लिया जाए?”
“अरे पागल कॉलेज खुलने तो दो।”
“सर पता नहीं क्यों कॉलेज गए बिना एक दिन भी नहीं कटता।”
“बाबा की क्या प्रतिक्रिया है?”
“बाबा खुश हैं, लेकिन ज्यादा नहीं।”
“ऐसा क्यों?”
“वह नहीं चाहते कि हम पढ़ें। वह तो हमारे लिए सुयोग्य वर ढूँढ़ रहे हैं।”
“कोई मिला?”
“न मिला और न मिलेगा। छी कौन करेगा शादी?”
“और अगर मिल गया तो?”
“तो जैसे एम.ए. किया, आपसे पढ़ा, वैसे ही शादी भी कर डालेंगे।”
“सच?”
“हाँ, लेकिन गंभीर क्यों हो गए?”
“नहीं ऐसे ही।”
“सर एक बात बताएँ। हम शादी कभी नहीं करेंगे।”
“क्या करोगी?”
“पढ़कर नौकरी करेंगे बस। आप क्या करेंगे?”
“मैंने अभी कुछ सोचा नहीं है।”
“शादी करने का विचार है क्या?”
“कहा न अभी कुछ सोचा नहीं है।”
“ठीक है। जब सोच लीजिएगा तो हमें बताइएगा जरूर।”
“अच्छा भाई अभी तो घर चलो।”
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फाइनल ईयर था। अविनाश और अर्चना ने एडमिशन ले लिया था। लेकिन पढ़ाई का समय अभी नहीं बँधा था। कुछ चिंतित स्वर में अविनाश ने अर्चना से कहा, “देखो यह फाइनल ईयर है। तुम पढ़ाई के प्रति कुछ कम गंभीर लगती हो। ऐसा मत करो। खूब ध्यान लगाकर पढ़ो। अच्छी पोजीशन आ गई तो मेरा सपना पूरा हो जाएगा।”
“कैसा सपना?”
“मैंने सपना देखा है कि तुम महाविद्यालय की शिक्षिका बनो। साड़ी का पल्लू लहराती गाड़ी से विद्यालय जाओ।”
“सर और आप?”
“मैं तुम्हें देखूँ और मन ही मन हर्ष का अनुभव करूँ। बस।”
“सर हम क्या कहें…” अर्चना की आँखें भर आई थीं।
“तुम कुछ नहीं कहो। सिर्फ पढ़ो। खूब मन लगाकर पढ़ो। मैंने पता किया है अगले वर्ष डॉक्टर सचान अवकाश लेंगे। उनके स्थान पर नियुक्ति होगी। माइनरटी कॉलेज है। तुम्हें चांस मिल सकता है।”
“सर आपने कितनी दूर तक सोच लिया।”
“जब जीना है तो दूर तक सोचना ही चाहिए।”
“सर आप भी तो चांस ले सकते हैं।”
“हाँ क्यों नहीं? लेकिन जहाँ तुम्हारा चांस बनेगा वहाँ मैं आड़े नहीं आऊँगा। तुम्हें अपने पैरों पर खड़ा होना ज्यादा जरूरी है। मुझे तो नौकरी बदलने की जरूरत है नहीं।”
“सर सोचिए, अगर हम दोनों ही इस कॉलेज में एक साथ पढ़ाने जाएँ? कैसा रहेगा?”
“बहुत अच्छा। लेकिन दो सपने एक साथ पूरे नहीं होते। इसलिए फिलहाल एक सपना जो मैंने देखा है, पूरा करो।”
“ठीक है सर हम पूरी कोशिश करेंगे।”
अर्चना ने अपनी दोनों मुट्ठियों में अविनाश के हाथों को भर लिया था। निर्विवेक भाव से उसे तकती रही।
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समय भाग रहा था। एक-एक महीना ऐसे पीछे छूटता जा रहा था जैसे तेज रफ्तार ट्रेन में बैठे मुसाफिर से हर एक स्टेशन छूटता हो। परीक्षा के लिए तीन महीने ही शेष थे। पुस्तकालय में बैठकर साथ-साथ पढ़ने के अब कुछ ही दिन शेष रह गए थे। यह एहसास दोनों के मन को कचोट देता था। दोनों चाहते थे कि भागते पलों को कस कर पकड़ ले। फिर अगले पल सोचते, कब तक कचोटकर पकड़ते रहेंगे भागते पलों को? पल ठहर भी गए तो क्या होगा? जीवन में ठहराव आ जाएगा और संबंधों में कोई पर्त जम जाएगी। आज जो कल की उम्मीद में सुखद लग रहा है, कलुषित हो जाएगा। शायद इसी सोच में डूबे दोनों आमने-सामने बैठ पृष्ठों पर खिंची काली लकीरों को समझने का असफल प्रयास कर रहे थे।
“अर्चना आज पढ़ने में मन नहीं लग रहा है।”
“सर हमारा भी मन नहीं लग रहा है।”
“चलो कैंटीन चलें।”
“चलिए सर” बड़े गंभीर स्वर में अर्चना ने कहा।
एक-एक कॉफी का आर्डर देकर दोनों सामने पड़े हुए समाचार पत्र को पढ़ने लगे। अर्चना ने खामोशी तोड़ी- “सर संबंधों का पतझड़ आने को है। यह सोचकर पता नहीं मन कैसा हो रहा है?”
“संबंधों का पतझड़?”
“सर एम.ए. फाइनल के बाद हम क्या पढ़ेंगे? आप क्या पढ़ाएँगे?”
“क्या जीवन भर पढ़ती ही रहोगी? अरे जिंदगी के नए आयाम खुलेंगे। कहीं-न-कहीं व्यस्त हो जाओगी।”
“सर हमें तो समझ नहीं आता कि आपके अभाव में हम कैसे रहेंगे?”
“पगली कभी कोई किसी के साथ हमेशा रहा है?”
“पता नहीं।”
“जब पता नहीं तो बेकार के सवालों में क्यों उलझती हो?”
“सर हमारी दुविधा आप नहीं समझोगे। हम अपनी दुविधा आपको बता भी नहीं सकते। दुविधा हमीं ने पैदा की है। हमीं उसका हल ढूँढ़ेंगे।”
“देखो डेढ़ माह बाद कॉलेज में प्रिपरेशन लीव होने को है। समय का सदुपयोग करो। गपशप में उसे मत गँवाओ।”
“सर हमने कभी गपशप नहीं की है और अब तो गपशप की गुंजाइश भी नहीं है।”
“मेरा सुझाव है कि अभी तुम सब भूल जाओ। सिर्फ पढ़ो। अर्जुन की भाँति अपने लक्ष्य पर वार करो। लक्ष्य मिलने पर सब दुविधाएँ स्वतः खत्म हो जाएँगी।”
“ठीक है सर।”
“कल से सिवाए पढ़ाई के कोई दूसरी चर्चा नहीं होगी। ओ.के.?”
“जी बिल्कुल ओ.के.।”
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और सचमुच पूरे डेढ़ महीने तक दोनों के बीच पढ़ाई के अतिरिक्त और कोई बातचीत नहीं हुई। लगभग पूरा कोर्स तैयार हो गया था। कॉलेज में छुट्टियों का नोटिस भी लग गया था।
“अर्चना परसों से पुस्तकालय को अलविदा। किंतु स्टाफ रूम को हार्दिक शुभकामनाएँ।”
“सर मैं समझी नहीं।”
“अर्चना अपने शहर के राजेंद्र सिंह इस महाविद्यालय के प्रबंधक हैं। उनसे मेरी बात हुई थी। कह रहे थे यदि तुम अच्छे अंको से एम.ए. कर लो तो वह रिक्त स्थान पर तुम्हारी नियुक्ति कर सकते हैं।”
“सर यह आप क्या कह रहे हैं? आपके बिना हम नौकरी कैसे करेंगे?”
“पहले नौकरी पकड़ो, तब यह भी सोचा जाएगा।”
“सर बड़ी कठिन परीक्षा है।”
“तुमने सिद्ध कर दिया है, जहाँ चाह वहाँ राह। इसी सिद्धांत को जीवन में उतारो। सफलता चरण चूमती रहेगी।”
“सर” अर्चना रूआँसी हो उठी थी।
“अर्चू अब हम लोग मार्च में मिलेंगे।”
“सर हमारी एक विनती है। आप सुबह-शाम कम-से-कम दो बार बारामदे में अवश्य बैठिएगा।”
“पगली।”
“बोलिए सर प्रॉमिस?”
“हाँ भाई प्रॉमिस।”
दोनों उदास मन से अपनी राहों पर चल दिए।
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अविनाश को क्या करना था, उसने सोच लिया था। अंतिम पर्चे में उसने केवल दो प्रश्न हल किए और परीक्षा छोड़कर बाहर आ गया। अर्चना अंतिम क्षण तक पर्चा हल करती रही। जब बाहर निकली तो स्तब्ध रह गई।
“सर क्या पर्चा कठिन था?”
“हाँ अर्चना, पता नहीं क्यों दो प्रश्न हल करने के बाद अन्य प्रश्नों को हल करने का मन नहीं हुआ, सो बाहर आ गया।”
“सर यह आपने ठीक नहीं किया। मन तो मेरा भी नहीं था। लेकिन आपसे प्रॉमिस किया था इसलिए पूरे मनोयोग से पर्चा हल किया और आपने आखिर ऐसा क्यों किया?”
“वक्त बताएगा।”
“हम समझ गए। आपने हमारी नौकरी के खातिर यह सब किया।”
अविनाश चुप रहा। दोनों खामोश उस मोड़ पर आ गए जहाँ से दोनों घरों के दो अलग-अलग रास्ते थे। दोनों ने रास्ते के मोड़ पर एक-दूसरे का मौन अभिवादन किया और आगे बढ़ गए।
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इस बार ढाई महीने की गर्मियों की छुट्टियाँ अर्चना से काटे नहीं कट रही थीं। वह खुद को बहुत अकेला महसूस कर रही थी। सुबह देर से उठती। अलसाई-सी सारा दिन घर के कामों में लगी रहती। अनायास जब कभी उसकी नजर अविनाश के घर पर टिक जाती तो उसकी मायूसी और बढ़ जाती। न जाने मन में कैसी अज्ञात बेचैनी बढ़ जाती। उसे मालूम था कि अविनाश अपने शोध कार्य को पूरा करने दिल्ली गया है और वह चार माह बाद ही लौटेगा। लेकिन लौटने से भी क्या? अब वह उसके साथ जीवन के अगले पल किस बहाने से बिताएगी? यह विचार उसे कचोटने लगा था। अपनी विवशता की कहानी किसी को सुना भी तो नहीं सकती थी।
इधर बाबा और पापा दोनों ही उसके लिए सुयोग्य वर की तलाश में व्यस्त थे। प्रतिदिन किसी-न-किसी लड़के और उसके खानदान की चर्चा घर में होती। उसकी फोटो लड़के वालों को दी जाती, लेकिन अर्चना अब तक मौन थी। वह जानती थी जब तक उसके पास कोई आधार न हो, वह कोई निर्णय नहीं ले सकती थी। उसकी सारी आशाएँ अविनाश पर केंद्रित थीं। विवाह की बात तो कई जगह चली, लेकिन मामला तय न हो सका।
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परीक्षाफल के दिन निकट थे। अविनाश अभी नहीं लौटा था। उसका वापस न आना अर्चना के लिए परेशानी बन रहा था।
एक दिन सुबह अर्चना ने अखबार में परीक्षाफल प्रकाशित पाया। बड़े मनोयोग से उसने पहले अविनाश का नंबर देखा। वह प्रथम श्रेणी में पास हुआ था। इसके बाद उसने अपना रोल नंबर देखा। वह भी प्रथम श्रेणी में पास हुई थी। सात दिन बाद जब वह अंकतालिका लेने कॉलेज पहुँची तो उसके संगी-साथी और प्रोफेसर बधाइयाँ देते नहीं थक रहे थे। उसने विश्वविद्यालय में सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर टॉप किया था। उसने अविनाश के बारे में पूछा। उसने महाविद्यालय में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए थे।
अर्चना का चेहरा बुझ गया। उसकी खुशी मानो आधी रह गई। शायद अविनाश आज होता तो वह उसको बहुत कुछ भला-बुरा कहती।
घर आकर उसने बाबा को सब कुछ बताया। वह बहुत खुश हुए। लेकिन जब उन्हें पता चला कि अविनाश ने भी उसके साथ एम.ए. किया है तो वह आग-बबूला हो गए। उस दिन उन्होंने अर्चना को जितना हो सकता था, अपमानित किया। यहाँ तक कहा कि “अब तू जा उसी की देहरी पर मर। हम तेरे विवाह में रुचि नहीं लेंगे। तूने हमसे छल किया। हमें धोखा दिया। जरा-सी शर्म हो तो निकल जा घर से।”
दादी ने मामले को शांत किया अन्यथा उस दिन कोई बड़ी अनहोनी होकर ही रहती।
इस घटना के बाद अर्चना ने तय कर लिया था कि वह अपने जीवन को नई दिशा देगी।
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अविनाश अभी भी लौटा नहीं था। अंत में अर्चना महाविद्यालय गई और प्रवक्ता पद के लिए आवेदन दे आई। एक दिन विद्यालय के प्रबंधक श्री सिंह ने उसे बुलाया। “अर्चना पद एक है। मैं चाहता था कि अविनाश उस पद के लिए आवेदन दे। पद विज्ञापित भी हुआ, किंतु उसका आवेदन नहीं आया। हाँ उसका एक पत्र आया है। इसमें उसने तुम्हारे लिए लिखा है कि यदि तुम प्रवक्ता की अर्हताएँ पूरी करती हो तो तुम्हारा सिलेक्शन कर लिया जाए। तुम्हारे आवेदन पत्र से तुम्हारी योग्यता में तो कोई कमी नहीं दिखती। हाँ अध्ययन का अनुभव अवश्य तुम्हें नहीं है, वह भी हो जाएगा।”
“सर जैसा आप ठीक समझे।”
“ठीक है, अगले सप्ताह चयन हेतु साक्षात्कार में तुमको उपस्थित होना है।”
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अविनाश के उपकारों से वह कितना दबती जा रही थी, उसे आज पता चला था। वह अविनाश से मिलकर उसके प्रति अपनी कृतज्ञता दर्शाना चाहती थी। लेकिन वह था बेपरवाह और अलमस्त। आज उसे अविनाश पर खीझ भी आ रही थी। ऐसे शुभ अवसर पर उसका अभाव उसे खटक रहा था। उसे उम्मीद थी कि साक्षात्कार के दिन से पूर्व वह अवश्य आएगा। लेकिन पहली बार उसका विश्वास टूटा। साक्षात्कार हो गया और वह नहीं आया। उसकी मायूसी प्रतिदिन बढ़ने लगी।
घर में उससे किसी को कोई सरोकार नहीं रह गया था कि वह क्या कर रही है, क्या सोच रही है? उसने भी अपने संबंध में किसी को कुछ बताने की आवश्यकता नहीं समझी।
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एक दिन जब डाकिया उसके लिए एक पत्र लेकर आया तो घर वालों के कौतूहल की सीमा न रही। बड़े संयत भाव से अर्चना ने पत्र खोला। महाविद्यालय में उसकी नियुक्ति का पत्र आया था। अर्चना की आँखों से खुशी के आँसू टपकने लगे। दौड़कर गई बाबा को खुशखबरी दी। बाबा ने सिर उठाया। उसे देखा और फिर चादर ढँक कर सो गए।
माँ को अवश्य प्रसन्नता हुई लेकिन ससुर की नाराजगी के आगे वह अपनी खुशी व्यक्त नहीं कर सकी। अर्चना ने कपड़े बदले और पद-भार ग्रहण करने के लिए कॉलेज पहुँच गई। प्रतिपल उसे अविनाश की कमी खटक रही थी। वह चाहती थी कि उसके जीवन की दोनों बड़ी खुशियों में वह उसके साथ होता।
कॉलेज से घर तक रास्ता उसके लिए बधाइयों से भरा था। जो मिलता, वह उसे बधाई दे रहा था। वह सबकी बधाइयाँ स्वीकार कर रही थी, किंतु जिसकी बधाई की वह बाट जोह रही थी वह बधाई अब तक उसे नहीं मिली थी।
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दूसरे दिन वह कॉलेज जाने को तैयार हो रही थी। एक बार के लिए उसकी नजर अविनाश के घर पर पड़ी। उसके हर्ष की सीमा नहीं रही। वह अपना हैंडबैग जमीन पर रखकर दरवाजे पर लटके ताले को खोल रहा था। उसने झटपट कपड़े ठीक किए और तेज कदमों से उसके घर पहुँच गई।
“सर।”
“अरे अर्चना बधाई देने ही आया हूँ तुझे।”
“सर हमने आपकी कितनी प्रतीक्षा की लेकिन आप हमारी खुशी में नहीं आए और आप टॉप करने से पिछड़े क्यों?”
“दो बातों का जवाब एक साथ नहीं दे सकता।”
“तो बताइए हम कैसे टॉप कर सके?”
“तुमने पढ़ा था। पर्चा ढ़ंग से हल किया था। मैं पढ़ नहीं पाया था। पर्चा छूट गया था बस।”
“सर हमें न बहकाइए।”
“अच्छा और रही बात तुम्हारी खुशी में शामिल होने की, वह मैं कब नहीं रहा? आज भी सिर्फ दो दिन के लिए तुमसे मिलने आया हूँ। बधाई देने आया हूँ।”
“सर उसके बाद?”
“उसके बाद फिर दिल्ली चला जाऊँगा।”
“क्यों?”
“अब मेरा यहाँ है ही क्या?”
“क्यों नौकरी जो है? हम जो हैं?”
“मैंने तुम्हें बताया नहीं था। नौकरी तो बहुत पहले ही छोड़नी पड़ गई थी।”
“क्यों?”
“तुम्हारे बाबा को मेरा यहाँ नौकरी करना पसंद नहीं था।”
“सर…।”
“सच है। लेकिन यह सब मैंने तुम्हें नहीं बताया था। अन्यथा तुम असंतुलित हो जाती। मैंने दिल्ली में ही नौकरी ढूँढ़ ली है। मुझे सबसे बड़ी प्रसन्नता यह है कि तुमने मेरा सपना पूरा कर दिया। इससे बढ़कर मेरे लिए दुनिया की कोई खुशी नहीं बची।”
“सर हमें तो कुछ समझ नहीं आ रहा है। हम यहाँ ऐसे कटु लोगों के साथ आपके बिना कैसे रह सकेंगे? हम भी दिल्ली में नौकरी ढूँढ़ेंगे। यहाँ नहीं रहेंगे।”
“नहीं अर्चना, बचकानी बातें नहीं करते। यहाँ रहकर उनको यह समझाओ कि रिश्तों को दुर्भाव के चश्मे से न देखें।”
अर्चना की आँखों से टप-टप आँसू गिर रहे थे। उसके पास आज कोई जवाब नहीं था। वह सिर्फ अविनाश को एकटक देख रही थी। तभी पीछे से किसी ने आवाज दी- “अर्चना।”
“अरे यह तो बाबा की आवाज है।”
“क्या हो रहा है? मर्यादाओं की होली जलाने पर क्यों आमादा हो?”
अर्चना कुछ नहीं बोली। “बोलो” बाबा चीखे।
“बाबा अविनाश भगवान स्वरूप हैं। हमारे संबंधों को गलत न लीजिए।”
“अगर वह तुम्हारे भगवान हैं तो तुम दोनों का इस बस्ती में क्या काम? जाओ कहीं मंदिर बनाओ और बैठो जाकर उसमें।”
“बाबा समझने की कोशिश करिए।”
“मैंने समझ लिया है इसीलिए मैं स्वयं हरिद्वार जा रहा हूँ। प्रायश्चित करने। तुम लोग खुश रहो। कहते-कहते बाबा चले गए थे।
घर लौटने पर अर्चना को पता चला कि उसे लेकर पापा और बाबा में बहुत कहा-सुनी हुई थी और बाबा घर छोड़कर दादी के साथ हरिद्वार प्रवास पर चले गए हैं।
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माँ ने अर्चना को समझाने का बहुत प्रयास किया। माँ ने कहा, “अर्चना तुम्हारी नौकरी से किसी को खुशी नहीं है। कोई नहीं चाहता कि तुम्हारे पैर घर के बाहर पड़ें। तुम अगर एक घरेलू लड़की बनकर रह सकती हो तो आज भी तुम्हें पहले-सा स्नेह मिलेगा। अन्यथा मैं नहीं जानती क्या होगा?”
“माँ तुम परेशान न हो। नौकरी तो अब मैं छोडूँगी नहीं। बाकी जैसा आदेश मिलेगा, पालन करूँगी।”
“तुम घर छोड़कर जा सकोगी?”
“अगर जरूरत पड़ी तो इसमें भी मुझे संकोच नहीं होगा।”
“ठीक है। दोनों विकल्प तुम्हारे पास हैं। जैसा समझ में आए करना” कहते-कहते माँ रूआँसी हो गई थी और रसोईघर में चली गई थी।
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अर्चना एक दोराहे पर खड़ी थी। एक रास्ता वह था जहाँ से वह चली थी। दूसरा वह जिसमें जीवन की अनंत संभावनाएँ व्याप्त थीं। आकांक्षाएँ हिलोरे ले रही थीं और जहाँ वह पहुँच चुकी थी। अन्य कोई मार्ग उसके लिए शेष नहीं था।
लगभग तीन महीनों तक वह रास्तों पर खड़े लोगों को खुश करने का प्रयास करती रही। लेकिन न पापा माने और न ही बाबा लौटकर घर वापस आए। हाँ उसके विवाह संबंध लौट-लौटकर आने लगे थे, जो पहले किसी-न-किसी बात को लेकर बिदकते रहे थे।
माँ ने अर्चना को बहुत समझाया कि वह किसी रिश्ते को कुबूल कर ले। लेकिन हर बार अर्चना ने मौन अस्वीकृति दी। आखिर में माँ ने कहा, “अर्चना इस शहर में तुम्हारी वजह से हमारा रहना मुश्किल हो गया है। पापा ने निर्णय किया है कि हम इस घर को छोड़ दें। अगले हफ्ते हम लोग यहाँ से चले जाएँगे। तुम सोच लो।”
अर्चना कुछ नहीं बोली। घर छोड़ने की तैयारियाँ पूरी जोरों पर शुरू हो गई थीं। सामान बाँधा जा चुका था। मकान मालिक ने अपना हिसाब कर लिया था। बस एक-दो दिन में मकान खाली हो जाना था।
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