कोई नाम न दो…भाग-10

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अर्चना बिना कुछ कहे उठी और दरवाजा बंद करके पुनः अपने एकांकी जीवन की कहानी कहने अपने पलंग पर लेटे-लेटे छत को तकती रही।
इस तरह निढाल पड़े-पड़े वह थक गई थी। पास पड़े अपने ब्रीफकेस को सरकाकर उसे खोला। नया खरीदा लघु उपन्यास पढ़ने लगी।
शालू के जाने के बाद अर्चना ने उपन्यास का पहला पृष्ठ पलटा। उदास स्वर में बुदबुदाने लगी।
“शिः, सर ने आज फिर मेरी भावनाओं को भुना लिया। वह कभी भी नितांत वैयक्तिक भावनाओं और अवैयक्तिक भावनाओं में फासला नहीं कर पाएँगे। कहाँ तक उन्हें समझाऊँ..।” बुदबुदाते हुए अर्चना ने आधा पढ़ा उपन्यास बंद करके रख दिया और आँख बंद किए अतीत में खो गई। जी में आया उपन्यास को फाड़ फेंके। लेकिन पता नहीं क्यों वह ऐसा नहीं कर सकी। उपन्यास के एक-एक सफे को पलटने लगी। शायद अगले पृष्ठ पर उसके पत्र के जवाब में कुछ लिखा था। पढ़ने लगी।
“अर्चना तुम्हें लगेगा, मैंने तुम्हारी भावनाओं को फिर भुना लिया है। तुम जरूर इसे भुनाना कहोगी, लेकिन मेरे लिए यह भुनाना नहीं, आत्मपीड़ा में प्रायश्चित का एक सहज प्रयास रहा है- अपनी अव्यक्त भावना को कविता, कहानी में उड़ेल देना। पात्र जब सजीव हो तो काल्पनिकता का सहारा जितना कम लिया जाए, कथा-वस्तु उतनी ही स्वाभाविक, प्रभावपूर्ण और मार्मिक बन पड़ती है। यही वजह है कि मैं अब तक तुम पर केंद्रित अपने जीवन के समस्त तथ्यों को हू-ब-हू प्रस्तुत करता रहा हूँ। लेकिन तुमने अनायास मेरी इस कमजोरी को भौतिकता के चश्मे के पीछे से झाँककर ही देखा। जबकि ऐसा था नहीं।
मैंने कभी नहीं चाहा कि मैं तुम्हारी भावनाओं पर अपने नाम की महराब खड़ी करूँ। लेकिन अब सफाई देने का वक्त नहीं रह गया है। इतना अवश्य कहूँगा कि पढ़-लिखकर भी यदि तुम जैसा व्यक्तित्व संकीर्ण मानसिकता से नहीं उबर सका तो ऐसे लोगों से क्या अपेक्षा की जा सकती है, जिन्हें व्यक्तित्व विकास के पूर्ण अवसर ही प्राप्त नहीं हुए हों।
याद करो, तुम पूछा करती थी “अब गीत नहीं लिखते?”
“नहीं” मैंने कहा था।
“मगर क्यों?” तुम पूछती थी।
“क्योंकि तुम्हें लगता था कि मैं अपने तुम्हारे पावन संबंधों को भुनाने के लिए गीत रचना करता था। कवि सम्मेलनों में तालियाँ लूटता था। हाँ यह सच है कि कवि सम्मेलन में जब तुम नजर आती थी तो मेरे गीत पहाड़ के स्त्रोत समान निकलने लगते थे बस।”
“तो अब क्या करेंगे?” अर्चना ने मन ही मन प्रश्न किया।
उपन्यास के अगले पृष्ठ पर उत्तर स्वरूप अविनाश ने लिखा था- “अब कुछ नहीं। जब संबंध का सिलसिला किसी निर्णायक मोड़ पर आ जाएगा तो सब कुछ एक छोटे-से उपन्यास में कैद कर दूँगा। वह भी ऐसे कि तुम्हारे सम्मान को ठेस न पहुँचे। यह उपन्यास भी उसी निश्चय का प्रतीक है। प्रथम और अंतिम उपन्यास है। एक दास्तान है। पावन स्नेह और उससे झाँकती मन-पंछी की आवश्यक उड़ानें, कल्पनाओं के झुरमुट और न जाने क्या-क्या है? तुम और हम नहीं समझेंगे। मनोवैज्ञानिकों को इसे समझने के लिए छोड़ दो।
“सच कहें, यह कथा नहीं। उपन्यास नहीं। आत्मकथा भी नहीं। बस वेदना और संवेदना के मध्य, तुम्हारे सानिध्य में और तुमसे दूर रहकर बिताए कुछ क्षणों का लेखा-जोखा है। हमें तुम समझ सकोगी। दूसरा कोई नहीं। मैं चाहता भी नहीं कि कोई दूसरा इसे समझने का प्रयास भी करे। वह समझ कर भी इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पाएगा और तुम इस सत्य को स्वीकार करके कुछ संजीदा हो जाओगी। इसलिए इसे पढ़ना। पढ़ने के लिए। बस। अपने-हमारे रिश्ते को कोई नाम न दें। वही उचित है।

“जो बात मैं तुमसे रू-ब-रू कभी नहीं कह सका उसे इस लिखित दस्तावेज में कैद कर रहा हूँ। सच पूछो तुमसे मिलकर लगा मैं निरंतर मानवीय संबंधों की कोमलतम स्वर लहरियों में खोता जा रहा हूँ। हर तरफ संगीत और गीत की सरसरी-सी फैल गई थी। बरसों से सोई भावना मानो पुनः संचरित हो उठी थी। भावोद्वेग अपनी पराकाष्ठा पर चढ़ने को आतुर हो उठा था।”
“जब कभी लिखने बैठता, ऐसा लगता है कि मेरे चारों ओर संगीत बिखर गया हो और तुम सितार पर रह-रहकर उस बिखरे संगीत को शाश्वत रूप प्रदान करने की चेष्टा में व्यग्र हो उठी हो। अक्सर ऐसा होता कि मैं सपनों के महल बनाने लगता, घंटों सब कुछ भूलकर अनागत के अनदेखे स्वप्नों को साकार होता देखने लगता।”
“हर पल मन चाहता कि तुम्हारे बहुत करीब पहुँच जाऊँ। इतने करीब कि जहाँ से सिवाय तुम्हारे मैं किसी और को न देख सकूँ। सिवाय तुम्हारे किसी को न सुन सकूँ। लेकिन न जाने क्यों ऐसा हो पाएगा, मुझे विश्वास नहीं था। सोच नहीं सकता था कि कभी करीबी की यह सीमा हाथ लगेगी। इसलिए जहाँ भी बैठता, कभी रेखाओं में तो कभी शब्दों में तुम्हें चित्रित करने लग जाता। लेकिन न तो चित्रकार था और न लेखक। फिर अगर यह सब होता भी तो तुम्हारी निश्छलता की थाह पा सकना तो मेरी विवशता ही होती। तुमसे मिलकर मुझे जिस सात्विक और अलौकिक सुख की अनुभूति होती थी, उसका मूल्यांकन करना ही कठिन है। चित्रांकन की तो बात ही छोड़ो।”

“धीरे-धीरे वक्त गुजरता दिया। फासले कुछ कम होने को हुए। मैं उपन्यास पढ़ने का शौकीन था। तुम्हें भी एक-से-एक अच्छे उपन्यास पढ़ा देने की कोशिश मुझमें पैदा हो चुकी थी। मैं चाहता था कि तुम मुझसे कुछ कहो, कुछ माँगो, मगर ऐसा तो तुमने कभी नहीं किया। जो कुछ मैंने ला दिया उसे अस्वीकार भी नहीं किया। लेकिन किसी बात को चाहा भी नहीं। यही कसक बनी रही। कितनी ही बार लाइब्रेरी गया, वहीं पुस्तकें छाँटीं, पढ़ीं और नोट्स बनाए। लौटते समय कभी-कभी किसी रेस्तरां में बैठकर तुम्हारे साथ चाय भी पी, रसमलाई भी खाई, लेकिन अधिकतर लाइब्रेरी या यूनिवर्सिटी से सीधे घर ही लौटा। तुमने मुझे प्यास लगने पर पानी भी नहीं पीने दिया। अकेले मैं पी नहीं सकता था। घर और रेस्तरां दोनों ही जगह तुम चाय पीती, खत्म भी कर लेती मगर मैं तुम्हें बातें सुनाता रहता और पड़े-पड़े चाय ठंडी हो जाती। कितनी बार ऐसे अवसर आए जब छोटे से ड्राइंग रूम में एक ही सोफे पर करीब बैठकर घंटों हम पढ़ते-पढ़ाते रहे।”
“खूब याद है कि एक दिन शाम पढ़ते-पढ़ते ग्यारह बज गए थे और तुम्हारे साथ ही बैठकर मैंने खाना खाया था। चने की दाल, चावल, रोटी, दही। सच पूछो शायद जिंदगी में पहली बार ही चने की दाल मुझे अच्छी लगी थी और उसके बाद से कितनी बार उस दाल को खाया मैंने। वह दिन भी खूब याद है, मैं बहुत थका था। किंतु मैंने वायदा किया था तुम्हारे घर आऊँगा। थकान के कारण तुम्हारे घर जाने का मन नहीं हो रहा था। फिर भी शाम आते-आते रुक नहीं पाया था। तुमने किसी किताब से किसी विषय पर कुछ नोट्स बनाए थे। विषय को समझ न पाने के कारण नोट्स अधूरे रह गए थे। तुमने तो मुझसे कुछ नहीं कहा था। मैंने ही तुम्हारे नोट्स और उनसे संबंधित पुस्तक तुमसे ले ली थी और घर आ गया था। थकान के बावजूद रात भर बैठे तुम्हारे नोट्स बनाता रहा था।”

“दूसरे दिन जब तुम्हें बताया कि तुम्हारे नोट्स के लिए रात भर जागता रहा, पूरी रात लिखता रहा तो तुम ‘अच्छा’ कहकर अनायास ही हँस पड़ी थी। तुम्हारा साथ देने के लिए बिना अर्थ समझे मैं भी हँस दिया था। तो न जाने कैसे विचार मन को घेरते रहे। उस रात फिर नहीं सो सका। पढ़ना चाहा, पढ़ भी नहीं सका। तुम्हारी विभिन्न आकृतियाँ मेरे सामने डोलती रहीं।”
“अज्ञात किंतु बढ़ती बेचैनी से छुटकारा पाने के लिए मैं कुछ दिन के लिए आसाम चला गया था। सोचा था प्रकृति में रहूँगा, लिखूँगा, किंतु शांति वहाँ भी नहीं मिली। रह-रहकर तुम्हारा ख्याल परेशान करता रहा। हर शाम तुम्हारे उसी कमरे में जाकर बैठने की तमन्ना दिन-ब-दिन बलवती होती रही। वहाँ बैठकर तुम्हारे हाथों से चाय पीने की चाहत कचोटती रही।”
“हर पेड़ और पहाड़ में मानो तुम खड़ी मिलती। अजब हालात हो गए थे। एक दिन सोचा कि यहाँ से कश्मीर चला जाऊँ। संभव है पानी में तैरती जिंदगियों को अपनाकर ही सुकून मिल सके। पहाड़ों और चीर के वृक्षों में घिरे प्रकृति के मनोरम स्थल कश्मीर में आ गया था।”

“चारों तरफ छिटकी हरियाली और बिखरी सुंदरता मन मोह लेने के लिए काफी थी। किंतु वहाँ भी मुझे इस कदर अकेलापन लगने लगा कि मन हुआ भाग चलूँ। मन को कितना बहलाया, लेकिन असफल रहा। स्वयं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर किस अव्यक्त भावना को व्यक्त करने के लिए बेचैन रहने लगा था। दिल को टटोलता, कहीं कुछ भी तो नहीं मिलता जिससे यह समझता कि कुछ कहकर हल्का हुआ जा सकता है। बस सबसे उबाहट और तुम्हारी करीबी से लगाव, यही तो रट लग गई थी मन को। नावों और शिकारों की भीड़ में भी हर तरफ न जाने क्यों तुम ही नजर आती थी। प्रकृति भी कितनी निर्मम निष्ठुर बन गई थी। मुझे एक पल के लिए भी शांत चित्त नहीं छोड़ना चाहती थी। इस पूरे समय तुम पर क्या बीत रही थी, नहीं जानता। तुमसे पूछ भी तो नहीं सकता था। पूछता भी तो प्रश्न अधूरा रहता, क्योंकि तुम तो संक्षिप्त-सा उत्तर देकर चुप हो जाती। कुछ भी नहीं या फिर कह देती मैं भी यहाँ बहुत व्यस्त रही थी। क्यों, है न यही?”
“तुम सिद्धांतों और आदर्शों की सीमाओं के उल्लंघन के विरुद्ध थी। संभवतः इसीलिए तुमने घनिष्ठ होते संबंधों को कभी एक शब्द में परिभाषित करना उचित नहीं समझा। मैंने ही तुमसे कहा था कि तुम्हारे प्रति मुझे कितना आत्मिक स्नेह है, लेकिन तब तुम्हें विश्वास नहीं हुआ था।”

“किंतु न जाने क्यों, एक लंबे अरसे के बाद तुमने मित्रवत स्नेह के साथ मुझसे अपनी घनिष्ठता को परिभाषित किया था। मैंने भी प्रतिरोध नहीं किया। तुम्हें मित्रवत ही समझा। एक ऐसा मित्र जिससे बिछुड़ कर नहीं रहा जा सकता। मगर कभी एक साथ रहने की गंभीरता पर विचार भी नहीं किया जा सकता क्योंकि तुमने यह स्पष्ट कर दिया था। मुझे लगने लगा था कि मुझमें जितना बहकाव है तुममें उतना ही ठहराव। मैं झंझावातों से कँपकँपा उठता हूँ और तुम उनके मध्य भी अस्थिर, अडिग खड़ी रहती हो। बस चाहने लगा था कि इसी तरह अडिगता का कुछ अंश मात्र ही तुमसे प्राप्त कर सकूँ।”
“एक रोज कश्मीर में ही एक ज्योतिषी मिला था। हस्तरेखा देखकर बोला था तुम एक बड़े नामी सन्यासी होगे। तुम्हारी पुस्तकें दुनिया में बेजोड़ होंगी। मैं अनायास हँस उठा था। याद है न एक बार मैंने तुमसे कहा था मैं सन्यासी बनूँगा तो बाबा और तुम्हारे पापा खामोश खड़े रहे, तुम ठहाका लगा कर हँस पड़ी थी। मेरे पूछने पर तुमने बताया था, “यह सोचकर हँसी आ रही है कि आप जोगिया वस्त्र पहनकर कैसे लगेंगे।” इसीलिए जब उस ज्योतिषी ने बताया तो तुम्हारी प्रतिमा मेरी आँखों के सामने सजीव हो उठी थी। मुझे भी हँसी आ गई थी।”

“जितने दिन भी कश्मीर रहा, होटल में बैठे-बैठे तुम्हें रोज एक पत्र लिखता। तुम्हारे चित्र बनाता। टूटी-टूटी रेखाओं से तुम्हारी मुद्राओं को बाँधता। लेकिन बाद में फाड़-फाड़ कर वेस्ट पेपर बास्केट में डाल देता। मुझे याद है कि जब होटल से चला था, एक किलो रद्दी फटे चीथड़ों की बेची थी। होटल मैनेजर और बैरा भी साहब की बेवकूफी पर हँस पड़े थे।”
“लौटा तो दूसरे ही दिन तुम्हारे घर गया। तुमने पास होने के लड्डू खिलाए थे। एक पर्चे में आशा की विपरीत तुम्हारे बहुत ही कम नंबर थे। मैं भी तुम्हारे साथ चिंता में पड़ गया था। तुम्हें सब कुछ आता था। तुमने सब पढ़ भी लिया था। फिर भला उसमें इतने कम नंबर कैसे आ सकते थे? मैंने तुम्हें रिवेल्यूशन (पुनर्मूल्यांकन) करवाने की सलाह दी। बाद में तुम्हें बहुत अच्छे नंबर मिले। तुम कितनी प्रसन्न हुई, नहीं ज्ञात है। हाँ मैं बहुत प्रसन्न हुआ था। इस कदर प्रसन्न हुआ था कि बयाँ नहीं कर सकता।”

“एक वर्ष न जाने कितने वैचारिक द्वन्द्वों में कल्पना विहार करते-करते हमने पार किया। पवित्र स्नेह की आँच निरंतर बढ़ती ही रही। मैं तो तुम पर पूरी तरह निर्भर हो गया था। हर महत्वपूर्ण प्रश्न पर मैं तुमसे सलाह करता था। तद्नुसार कार्य करता और तुम, तुम तो लेकिन अभी भी स्नेह की पावनता के समक्ष ठगी-ठगी-सी संकोच और विवशता की विडंबना में थी।”
“तुमने पी.एच.डी. करनी चाही। मुझसे जो मदद हुई, की और एक दिन तुम्हें पी.एच.डी एवार्ड हुई। समारोह पंडाल जिस समय तुम्हारा नाम आते ही तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा था, उस समय मैं अश्रुपूरित धूमिल दृष्टि से अपने चश्मे के पीछे से झाँक-झाँककर तुम्हें देखने का प्रयास कर रहा था। हर्ष और प्रेम की अनुभूति भी पहली और अंतिम बार उसी दिन हुई थी मुझे।”

“तुम स्टेज से नीचे उतर चुकी थी। अभिवादनों को स्वीकार करती तेज कदमों से आगे बढ़ते हुए अपनी सीट पर आकर बैठ गई थी। तुम डॉक्टर हुई थी। सौ कदम आगे बढ़ी थी। मैं इस पूरे अरसे में जिंदगी से पीछे ही पीछे छूटता चला गया था। बेचैनियों ने मुझे इस कदर घेर लिया था कि मैंने सब कुछ छोड़ दिया था।”
“मन अशांत रहने लगा था। तुम्हारे साथ गुजरे पल मुझे मुक्त नहीं कर रहे थे। बहुत मन था शहर छोड़ दूँ, लेकिन अनकही परिस्थितियों के कारण ऐसा कर पाना मेरे लिए संभव नहीं था। क्या करता क्या नहीं…।”
“ऐसा लगने लगा था जैसे अब संसार में कुछ भी न बचा हो। मेरा जीवन ही अर्थहीन हो गया हो। काश तुम न मिली होती तो आज से तीन साल पहले ही मैं बियावान जंगलों के सन्नाटे में कहीं खो गया होता। तब मेरे पास बचा ही क्या था? तुम्हें तो मालूम था कितना कमजोर और बीमार था मैं। लेकिन तुमसे मिलकर ही जैसे मृत शरीर में मेरे पुनः प्राण आ गए थे। कुछ छिपा तो नहीं रहा हूँ। यही तो सच्चाई है। तुम यकीन करोगी। तुमने मुझे जीवन दिया। तमाशा बनकर रह जाने वालों की भीड़ से उठाकर जीवन के फुटपाथ पर लाकर खड़ा किया और आज जब तुम्हीं ने फिर मुझे ज़माने में तमाशा बनकर रह जाने के लिए छोड़ा, अपना मुँह मोड़ लिया तो अब किससे मिला करूँ? गिला और गुस्सा करने का अधिकार भी तो तुम्हारे साथ मेरा हनन हो गया न। कष्ट इसका है कि तुमने बड़ी निष्ठुरता और निर्ममता में शायद यह सोचा था और कह भी दिया था कि आपको तो कोई और अर्चू मिल जाएगी। तुमने जिस सहजता से इसे कहा, मैं तो उस सहजता से इसे नहीं ले सका। बोला तो न तब कुछ था और न अब बोलूँगा। अब एक ही ख्वाहिश है तुम्हारा हर दिन स्नेहमय बंधनों में जकड़ता जाए। स्नेह, सहानुभूति और सुरक्षा तुम्हें इतना सँवारे कि तुम्हें कष्ट छू तक न सके। स्नेह के इस अपार भंडार के मध्य तुम मुझे ही नहीं खुद को भी भूल जाओ। लेकिन कभी भी ऐसा अवसर न आए कि मैं तुम्हारे सामने हूँ और तुम पूछो यह क्या दशा बना रखी है? मैं अपनी दशा से तुम्हें कदापि अवगत नहीं होने दे सकता।”

“धीरे-धीरे मेरे इर्द-गिर्द अकेलापन इस कदर घिर गया, मैं पागल हो उठा। अक्सर खामोश लम्हों में बेबात शून्य को निहार कर हँस उठता था। खूब हँसता था। मगर किसके लिए मुझे खुद नहीं मालूम। इतना जरूर था कि मेरी खामख्वाह की इस हँसी को सुनने वाला था ही कौन? एक तुम ही तो थी जिसके समक्ष मैं अपने समस्त सुख-दु:ख कह डाला करता था, किंतु अब तो तुम भी इतनी दूर हो कि क्या कहूँ? कहूँगा भी तो क्या? संभव है कि तुम भी अब मेरी पगलाहट को गंभीरता से न लो। सब सुनकर मात्र हँस दो।”
“इसीलिए एक दिन बड़ी गंभीरता से निर्णय लिया था शहर छोड़ने का। मगर जाऊँगा तो कहा? यह तो सोचा ही नहीं था। अपना असबाब जरूर सब बेच दिया था। केवल जरूरी सामान ही रखा था। इसी चिंता में एक दिन शाम को घर पर बैठा था। तुम्हारी प्रिय प्रोसेसर आ गईं। मेरी उदासी को घंटों दूर करने का प्रयास करती रहीं। बहुत कुछ मेरी समझ में आ गया था लेकिन जहाँ तुम्हारी धुँधली-सी छाया मेरे जहान पर दस्तक देती, मैं संतुलन खो बैठता। सब कहा-सुना धरा रह जाता। फिर वही धुन सवार हो जाती।”

“बस स्टैंड पहुँचा तो पंडित लालाराम मिल गए। चलते-चलते फिर तुम्हारी याद ताजा कर दी। उन्होंने तो तुम्हारी शादी तय करवाई थी। बताने लगे, “तुम्हें मालूम है अर्चू ने शादी नहीं की।”
“क्यों? जहाँ तक मुझे याद है उसकी सगाई हो गई थी। सात दिन बाद शादी थी।”
“शादी भी आपने तय करवाई थी।”
“हाँ” वह मुस्कुरा उठे। “वह सब ड्रामा था।”
“ड्रामा था! मगर ड्रामा क्यों किया गया?”
“यह मुझे भी नहीं मालूम। न तो मैंने शादी तय करवाई थी। न सगाई हुई थी। न शादी हुई थी। यह सब ड्रामा मुझे अर्चू के लिए करना पड़ा था।”
“मगर क्यों?”
“इसका सही उत्तर तो मुझे भी नहीं मालूम। शायद वह किसी और से शादी करना चाहती थी। शायद तुमसे। तुम उसके टीचर थे। वह तुम्हारी बहुत इज्जत करती थी। वह इस पवित्र संबंध को विवाह में बदलते नहीं देखना चाहती थी। तुम्हें अपने से दूर करने के लिए उसने यह नाटक रचा था। मैं उसका एक मोहरा बना।”
“यह आप क्या कह रहे हैं?” मैंने पूछा।
“सच कह रहा हूँ।”
“अब अर्चू कहाँ है?”
“शायद वही पढ़ा रही है जहाँ तुमने उसके लिए नौकरी छोड़ी थी।”
“अरे! पर अब मैं वहाँ किस मुँह से जाकर उससे मिलूँगा।”
“चाहो तो मिल लो, खुश हो जाएगी।”
“ठीक है। मगर उसने ऐसा क्यों किया?”
“तुम्हारी खुशी के लिए।”
“मेरी खुशी के लिए?”
“हाँ, उसे यह अहसास हो गया था कि शायद तुम उससे विवाह का प्रस्ताव रखोगे। लेकिन उसे यह गँवारा न होता।”
“क्यों?”
“क्योंकि वह अपने आदर्शों के पाले में थी। उसे यह नहीं मंजूर था कि शिक्षक-शिष्या के रिश्ते वैवाहिक संबंध में सिकुड़ जाएँ। वह तुमको अपना आराध्य मानती थी। उसके घर में सबने उस पर शक किया था कि तुम दोनों शादी करोगे। उसने उसका प्रतिकार किया था। लेकिन कहीं-न-कहीं उसे लोगों का शक सच लगने लगा था। अपने आदर्श और दूसरों को दिए गए विश्वास के लिए उसने स्वयं को तुमसे दूर करने की यह युक्ति सोची।”
“काश…!”
“क्या काश?”
“उसने मुझसे बात तो की होती।”
“इतना समय ही कहाँ बचा था? वह तो विद्रोही हो गई थी। घर छोड़ दिया था उसने।”
“बस। अब कुछ न बताएँ। मैं नहीं सुन सकूँगा।”
“और मैं तुमसे मिलने तुम्हारे पुराने घर की ओर चल दिया था। तुम नहीं मिली थी। घर के दरवाजे पर लटकते ताले और बारामदे में पसरी चिड़िया-चिरगुनों की गंदगी बता रही थी कि शायद वहाँ लंबे समय से कोई नहीं आया था। आस-पास कुछ लोगों से पूछा। कोई कुछ नहीं बता पाया था। कोई भी पहचान का चेहरा वहाँ नहीं मिला। बस स्टेशन लौटना पड़ा था। बस स्टेशन पर पहुँचा तो एकाएक किताब हाथ में पकड़े, मृदु मुस्कान बिखेरता तुम्हारा चेहरा मेरे सामने तैरने लगा। ख्यालों की दुनिया से इतनी जल्दी मैं उबर नहीं पा रहा था। यादों में खोकर समय की तश्तरी पर सुनहरे पंख लगाकर उड़ते जा रहे पलों को पकड़ने के लिए अधीर हो रहा था। तमाम उधेड़बुन में मेरी बस निकल गई। मैं जहाँ का तहाँ खड़ा रह गया था।”

“उस दिन पलटकर देखा। कल्पना में झाँका। सड़क पार खण्डहर-सा बना स्टेशन रोता नजर आया। अब कहाँ जाता? साथी बिछड़े, साथ ले जाने वाले बिछड़ गए, तो बचा ही क्या? दूसरे क्षण कल्पना के झरोखों में अचल, अभेद्य पर्वतों की लंबी श्रृंखला दिखाई पड़ी। बस मैंने तय कर लिया। एक बार जी भर के शहर को देखा और पीठ पर लटका हैवर सैक और वाटर बाटल लेकर पहाड़ों के मध्य जाने का निश्चय कर लिया। शायद संन्यास की दिशा में बढ़ चला था…। पर न तो पहाड़ों में खो पाया हूँ, न ही संन्यास ले सका हूँ। नौकरी कर रहा हूँ। शायद करता भी रहूँ। जीवन के लिए जरूरी भी है। एक संन्यासी की तरह निर्विकार भाव से।महत्त्वाकांक्षाओं से दूर रहकर। जीवन के लिए यह जरूरी है न?”
“उफ” भारी मन से अर्चना ने उपन्यास अधूरा छोड़ दिया। उसे बंद कर सिरहाने रख दिया। उसने उसे पूरा कब किया, पता नहीं। अवकाश का समय खत्म होने से पहले ही वह विद्यालय पहुँच गई। दोनों जिंदगियाँ अपनी रफ्तार से अपनी-अपनी दिशाओं में फिर से बढ़ने लगीं। बस।
दोनों में से किसी को भी एक-दूसरे के जीवन की दिशा का पता नहीं था। दोनों अनाम रिश्ते में बँधे जीवन पथ पर कब तक चलें, पता नहीं।
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समाप्त

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