कोई नाम न दो….भाग-9

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अर्चना ने अभी किसी भी विकल्प के विषय में नहीं सोचा था। एक दिन कॉलेज में उसने अपनी समस्या को अपनी एक सहयोगी डॉ. मृदुला शुक्ला के समक्ष रखा। डॉक्टर शुक्ला ने उसे सुझाया कि वह कुछ दिन एक वूमेन्स हॉस्टल में शिफ्ट हो जाए। बाद में किराए का मकान ढूँढ़ा जा सकता है। अर्चना को सुझाव पसंद आ गया। इससे पहले कि वह घर खाली होता देखती, वह स्वयं अपना थोड़ा-सा सामान लेकर शहर के एक हॉस्टल में चली गई। उस दिन पहली बार वह माँ से गले लगकर फूट-फूटकर रोई थी। माँ ने फिर उसे समझाया था, “बेटी पापा की बात रख लो।” लेकिन अर्चना ने मौन अस्वीकृति भर दी थी और अगले पल वह अपने नए नीड़ की ओर चल दी थी।
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नए नीड़ में एडजस्ट होने में अर्चना को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। फिर भी उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। वह परिस्थितियों से जूझती रही। उसका विश्वास था कि यह स्थितियाँ हमेशा ऐसी नहीं रहेगी।
एक दिन कॉलेज में उसे आया ने एक पत्र दिया। अविनाश का था। निर्देशात्मक भाषा में लिखा था।
“अर्चना तुमने क्या किया? घर क्यों छोड़ दिया? इतनी भी नाराजगी क्या ठीक है? तुम जाओ, घर वापस जाओ। सब मान जाएँगे। कुछ समय तो प्रतीक्षा करो। और तुम्हारा अध्यापन कैसा चल रहा है? अधिक-से-अधिक समय अतिरिक्त अध्ययन में बिताओ। बड़ा काम आएगा। एक दिन तुम राष्ट्रीय स्तर की अध्यापिका बन सकोगी। मैं ठीक हूँ। मेरे बारे में फिक्र मत करना। शायद अगले माह आऊँगा, तब मुलाकात होगी।”
अर्चना ने कितनी ही बार पत्र पढ़ा। लेकिन हृदय के उद्गारों को व्यक्त नहीं कर सकी। फ्री पीरियड में बैठकर उसने अविनाश को जवाब लिखा।

“सर आपका पत्र पाकर हम कितने खुश हुए, बता नहीं सकते। बीसियों बार पत्र को पढ़ा। हर बार उसमें नूतन भावों का एहसास मिला। आपके स्नेह-ऋण से हम कभी मुक्त नहीं हो सकेंगे। आपके अभाव में हम बहुत टूट गए हैं। अकेले अधिक चल पाना कठिन है, वापस लौटना भी सरल नहीं और आगे के विषय में कुछ भी सोच पाना कल्पना के बाहर है। कभी-कभी बड़ी बेचैनी रहती है। हफ्तों नींद नहीं आती है। सर क्या करें? इस दशहरे की छुट्टी में संभव हो तो आइए या फिर हम आपके शहर आएँगे। मिलने की तमन्ना है। बाकी बातें मिलने पर ही करेंगे। क्योंकि सब कुछ लिख पाना मेरे लिए संभव नहीं है।”
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अर्चना का पत्र पाकर अविनाश विचलित हो उठा था। दशहरा अभी दूर था। इतने लंबे समय तक रुक पाना उसके लिए कठिन था। उसने दो दिन की छुट्टी की अर्जी दी और अर्चना से मिलने चला आया। वह स्टेशन से सीधे कॉलेज पहुँचा। रास्ते में उसे पुराने कितने ही परिचित मिले। लेकिन दूर से ही अभिवादन करते सब आगे बढ़ते गए। किसी के पास इतना समय नहीं था कि वह कुछ पल ठहरता और बातचीत करता।

कॉलेज पहुँचा तो बूढ़े गेटमैन ने उसे पहचान लिया। “आओ बाबू आओ। कितने दिनों के बाद आए हो? बाबू कहाँ हो? कैसे हो?” ऐसे ही तमाम प्रश्नों की झड़ी लगा दी उसने। इससे पहले कि अविनाश जवाब देता, वह बोला अर्चना दीदी आजकल यहीं पढ़ा रही हैं। अभी क्लास में हैं। बोलकर आता हूँ। आप स्टाफ रूम में बैठें।”

अविनाश ने उस बूढ़े गेटमैन से ऐसी आशा नहीं की थी। उसकी सहृदयता ने अविनाश के मन को छू लिया था। अभी वह भूली-बिसरी यादों में झकझोले खा ही रहा था कि सामने से तेज कदमों से चलती अर्चना आती दिखाई दी।
“अरे सर।”
“अर्चना कितनी कमजोर लग रही हो।”
“सर आपने तो मेरा प्रश्न छीन लिया। हम तो पहले जैसे ही हैं। आप बहुत कमजोर लग रहे हैं। सर आइए कैफे चलें। यह इस वर्ष नया खुला है।”
“अर्चना तुमने बहुत विद्रोही तेवर दिखा दिए। मेरी भी नहीं सुनी।”
“सर छोड़िए सब। जो होना था, सो हो गया। अब जहाँ हैं, वहाँ से हम लौट नहीं सकते।”
कैफे पहुँच कर अर्चना ने पूरी कहानी अविनाश को सुनाई। अविनाश किंकर्तव्यविमूढ़ सब सुनता रहा। यह पहला अवसर था जब उसके पास समस्या का कोई समाधान नहीं था।
“सर खामोश क्यों हो गए?”
“समाधान खोज रहा हूँ।”
“सर एक जगह रहते-रहते मन बहुत उदास हो गया है। हमारा मन है कि इन गर्मियों में आपके साथ पहाड़ों पर जाएँ।”
“मेरे साथ अकेले? लोग क्या कहेंगे?”
“कौन और क्या कहेगा? अब कौन है जिसको मुझसे कोई सरोकार रह गया हो?”
“तुम्हारे छात्र-छात्राओं को, समाज के लोगों को। उन्हें जब पता लगेगा कि तुम एक ऐसे व्यक्ति के साथ, जिससे संबंधों का औपचारिक बंधन है, अकेले पहाड़ पर गई हो तो तुम्हारे प्रति उनकी श्रद्धा घट जाएगी। तुम एक शिक्षिका हो। शिक्षिका के नाते बच्चों के सामने कुछ आदर्श प्रस्तुत करो ताकि वह कच्ची उम्र में भटकने न पाएँ।”
“सर आपने तो हमें बड़ी जिम्मेदारी में बाँध दिया है।”
“यह वही जिम्मेदारी है जिसमें मैं बँधा था। फिर भी तुम्हारे अपनों ने ही हमारे रिश्ते नहीं समझे।”
“सर आप ठीक कह रहे हैं लेकिन हम क्या करें?”
“तुम अकेले जाओ। जीवन के अनुभव लो। संभव हुआ तो मैं एक दिन के लिए आ जाऊँगा।”
“सर यह मंजूर है। अभी आप कहाँ ठहरे हैं?”
“कहीं नहीं। शाम को वापसी का प्रोग्राम है।”
“नहीं सर, यह नहीं होगा। आपको कम-से-कम एक सप्ताह यहाँ रुकना पड़ेगा।”
“अर्चना जिद्द मत करो। मैं पन्द्रह दिन बाद फिर एक दिन के लिए आ जाऊँगा। जब तक तुम सेटल नहीं हो जाती, ऐसे ही आता-जाता रहूँँगा। मेरा यहाँ अधिक दिनों तक रुकना तुम्हारे प्रतिष्ठा के लिए ठीक नहीं होगा।”
“सर हम तो इस प्रतिष्ठा से दुखी हो गए हैं। क्या इंसानी भावनाओं का कोई स्थान नहीं है?”
“शायद नहीं। जीवन समझौता है। समझौता भावनाओं से नहीं सिर्फ विचारों से होता है। इसलिए अगर यह कहा जाए कि जीवन मात्र एक विचार है तो गलत नहीं होगा।”
“ठीक है सर। लेकिन आइए हम लोग यहीं कैफे में खाना खा लें।”
“हाँ, यह मंजूर है।”
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खाना खाने के बाद अविनाश दिल्ली के लिए वापस चला गया। अविनाश से मिलकर अर्चना में एक नई स्फूर्ति आ गई थी। अविनाश के बाद मिसेज शुक्ला उसकी सबसे नजदीक थीं। वह उनसे अपना दुखड़ा रोकर हल्की हो जाया करती थी। आज भी उसने उन्हें जब अविनाश के आने के बारे में बताया तो मिसेज शुक्ला ने उसे समझाया- “अर्चना जब वह तुम्हें इतना चाहते हैं, तुम भी उनको इतना प्रेम करती हो तो उनसे विवाह क्यों नहीं कर लेती?” जवाब में अर्चना हँसी भर थी।
मिसेज शुक्ला के दोबारा पूछने पर उसने कहा, “यह संभव नहीं है।”
“क्यों?” मिसेज शुक्ला ने पूछा।
“मैंने अपनी आराधना में उनको जिस पद पर आसीन किया है वहाँ विवाह का अस्तित्व नहीं। न उनसे विवाह कर सकती हूँ और उनके रहते दूसरे से भी विवाह नहीं कर सकती। विवाह हो भी जाए तो किसी दूसरे से निर्वाह नहीं पाऊँगी। स्वयं अविनाश से विवाह का अर्थ होगा- उनसे निर्मित गैर पारंपरिक संबंधों को कलंकित करना।”
“अर्चना तुम्हारी बातों में एक बहकाव है। ऐसा बहकाव जो न सांसारिक रिश्तों में दिखता है और न ही आध्यात्मिक रिश्तों में। तुम भूल गई हो कि तुम एक इंसान हो और इंसानी फर्जों को निभाना ही सार्थक जीवन का प्रमाण होता है।”
“दीदी क्या करें। हमने तो इन इंसानी फर्जों को आज से कई वर्ष पहले ही तिलांजलि दे दी थी। अब उन्हीं फर्जों को निभा सकूँगी, मैं कल्पना भी नहीं कर सकती।”
“अच्छा काफी देर हो गई है। बैठने का अवसर मिला तो फिर कभी समझाने का प्रयास करूँगी” कहते-कहते मिसेज शुक्ला कमरे से बाहर चली गईं।
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उस दिन से अर्चना को शादी का विचार कचोटने लगा। उसे लगने लगा कि कहीं अविनाश भी तो मिसेज शुक्ला की भाँति उसके संबंध में कोई धारणा नहीं बनाए हैं। जब-जब यह प्रश्न उसके मन में उठता, वह काँप जाती। किंतु अगले पल ही स्वयं को बेवकूफ समझ अकेले में हँस पड़ती थी।
“छी: कैसे छोटे विचार तंग करते हैं” वह स्वयं से कहती और फिर सामान्य हो जाती।
इन विचारों के चलते जब उससे नहीं रह गया तो उसने एक पत्र लिखा- “सर, हमने आपसे एक बार कहा था कि हम बहुत दुविधा में हैं। दुविधा भी हमारी बनाई हुई थी। इस बात को कहे कई वर्ष बीत गए लेकिन वह दुविधा आज भी हमें जीने नहीं दे रही है। अपनी दुविधा का आपके सम्मुख खुलासा करके ही हम सुख से जी सकेंगे। सर शुरू में जब हमने आपको देखा भर था, हमारा दिल हुआ कि हम लोग विवाह करके जीवन व्यतीत करें। लेकिन जब आपने हमें पढ़ाना शुरू किया, हमारे मन में आपक…

एक माह की इंतजारी के बाद अविनाश का पत्र आया। हॉस्टल के कमरे में आकर अर्चना ने पत्र पढ़ा।
“अर्चू,
जो सच है वह यह कि महज संसर्गों को और संपर्कों का प्रतिरूप है जीवन। कभी दिखता नहीं। कभी मिलता नहीं। मिलता है तो निभता नहीं। सामाजिक परिवेश में एक अजूबा बनकर रह जाता है यह जीवन। लोग जो स्वयंभू हैं, झुंड में समाज हैं, बौखलाए हैं। जो कहते हैं वह करते नहीं, जो करते हैं उसे कहते नहीं। मानो कथनी और करनी एक नदी के दो ऐसे किनारे हों जिन पर एक साथ विश्राम कर पाना संभव न हो।
कहते हैं, प्रेम करो। घृणा से प्रेम करो। प्रेम पूजा है, इबादत है, नसीहत है, जीवन है, और न जाने क्या-क्या है..? मगर जब कभी कहीं निश्चल प्रेम का आग़ाज़ होता है तो वही लोग झुंड में भागती हुईं भेड़ों के समान खलबली मचा देते हैं। भुनकर खा़क खो जाते हैं। प्रतिशोध की अग्नि में हाथ सेंकने लगते हैं। प्रवंचना में मानवता को होम कर देते हैं।
ऐसे ही हैं अशक्त लोग। जर्जर सिद्धांतों, परम्पराओं और खानदानी उसूलों को साक्षी बनाकर स्नेह, प्रेम की होली जला खुश होते हैं जहरीले लोग। फिर क्यों न भला हम उन्हें छोड़ कहीं दूर, बहुत दूर चलें। हमेशा, हमेशा के लिए चलें। जहाँ दरख्तों के साए भी छाँह न दे सकें वहाँ कौन ठहरे?
चलो, चलें, गुलिस्ताँ बना डालें। गुलशन बना डालें। इंसानियत की महराब, इंसान से दूर, बहुत दूर बना डालें। मनुष्यत्व पैदा कर डालें। पीछे मुड़कर न देखें। इसी में सबका हित है।”
अविनाश ।
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उसने पत्र कई बार पढ़ा। उसके अर्थ खोजने में ही खुद खो गई। पत्र हाथ में पकड़े-पकड़े उसे झपकी आ गई। वह सो गई। पत्र कब नीचे गिर गया, हवा के झोंके में कहाँ गया, उसे पता नहीं चला। अगले दिन उसने पत्र का जवाब लिखा और उसे पोस्ट कर दिया। इसके बाद वह उसके उत्तर का इंतजार करती रही। इंतजार ही करती रही। उत्तर नहीं आया। न पत्र आया, न अविनाश आया। उसका पता भी नहीं चला। अर्चू ने भी उसका पता लगाने का प्रयास नहीं किया। करती भी तो कैसे? कौन था जो उसे जानता था? जो उसके बारे में कुछ बताता ।
धीरे-धीरे जिंदगी के दस वर्ष बीत गए। अविनाश का कोई पता नहीं मिला। अर्चू भी व्यस्त हो गई। सब कुछ भूल गई। जो नहीं भूल सकी, उसे भूलने का प्रयास करती रही।
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दस वर्षों का लंबा अंतराल। इस अंतराल में स्नेह संबंध विराम तक आ पहुँचते हैं। क्योंकि वह सदा मात्र आशा और प्रत्याशा में विकसित नहीं हो सकते। उन्हें भी कहीं ठौर की जरूरत होती है। वह ठहर जाते हैं। नए सिरे से नई दिशाओं में विकसित होने लगते हैं। यथार्थ के धरातल पर अपने-अपने ढंग से पलने और बढ़ने लगते हैं। यदि ऐसा न हो तो छोटे से जीवन में कोई भी अनगिनत बनते संबंधों और संपर्कों को भला कब तक किसी एक रिश्ते का नाम देकर जीवित रखे और उसके सहारे जीवन जीने की प्रतिबद्धता को अमली जामा पहनाने का ख्वाब देखे।
अर्चना और अविनाश भी संबंधों की इस नियति के अपवाद नहीं थे। दोनों अपने-अपने जीवन में रम गए थे। एक -दूसरे से अलग-थलग हो गए थे।
किंतु यादों के बियाबान में विचारों का कभी जब हाँका होता तो भले ही पल भर के लिए मन के किसी एक कोने में एक मीठी-सी टीस़, एक हल्की-सी चुभन पैदा होती जो अगले पल ही जीवन जीने की नई शर्त की दस्तक पर सहम कर सिमट जाती और वह दोनों कल्पना जगत से वापस लौट आते। जीवन शर्तों के जंगल में फिर दौड़ने लगता। यादों के कोमल प्रसून मुरझा जाते। उनकी खुशबू भी नहीं मिलती।
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एक लंबे अरसे के बाद अर्चना रेल का सफर तय करके अपने शहर पहुँची थी। अपनी सहेली से मिलने। ट्रेन रुक चुकी थी।
प्लेटफार्म पर बहुत गहमा-गहमी थी। निकास द्वार खचाखच भरा हुआ था। उसका साहस नहीं हो रहा था कि वह उस भीड़ में अपने बाहर निकलने के लिए रास्ता बनाए। हल्की-सी अटैची लिए वह प्लेटफार्म के एक कोने में आकर खामोश खड़ी भीड़ के छटने का इंतजार करने लगी।

सुंदर, स्वस्थ शरीर, बड़ी-बड़ी आँखों से झाँकता हुआ खोया-खोयापन, कमर के भी नीचे तक झूलते हुए घने श्यामल केश और फिर हल्के नीले रंग की रेशमी साड़ी का लहराता हुआ नासमझ आँचल, अनायास ही अगल-बगल से गुजरते लोगों की निगाहों को पलभर के लिए अपनी ओर आकर्षित कर लेने की धृष्टता कर बैठता था।
लगातार अनजान नजरों की इस चुभन से उसका मन थक गया। बेचैन ख्यालों का ग़िला वह करती भी तो किससे? अकेली थी। चुपचाप न चाहते हुए भी किताबों की एक दुकान पर जाकर पत्र-पत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगी।
“जी मेम साहब क्या चाहिए?” चश्मे के पीछे से झाँकती हुई दो बूढ़ी आँखों ने प्रश्न किया।
“कोई नया उपन्यास है?”
“जी हाँ” कहते-कहते वह बूढ़ा नीचे झुका और किताबों के ढेर से एक किताब निकाल कर दिखाते हुए बोला, “जी यह नया उपन्यास आया है। बड़ी बिक्री है इसकी। सुनते हैं बहुत अच्छा है।”
“अर्चना” उसने पढ़ा। नाम था उपन्यास का।
कवर पेज पलटा और समर्पण के दो शब्द पढ़ने में खो गई।
“हाँ अर्चू, तुम्हीं को, तुम्हारे लिए जीवन की अमूल्य अमानत कभी जो तुम्हारे हाथ आ सके…देख लेना…पढ़ लेना…और फिर…फिर कुछ नहीं…क्या कहूँ? तुमने तो मुझसे अपना नाम तक न लेने का वायदा लिया था…नहीं लूँगा…मगर तुम्हें भूल भी तो न पाऊँगा। जब तक यह जिंदगी है…कम-से-कम अपनी यादों में तुम्हें सजाए रखने का अधिकार तो मुझे दे ही देना बस…।”
अविनाश
‘अविनाश’ वह बुदबुदाई। “कहाँ है वह?” हृदय विद्रोह कर बैठा। “वह ऐसा नहीं, वह ऐसा नहीं” उसकी भावनाएँ झंकृत हो उठीं।
“आपको अच्छी लगी यह किताब?” उन्हें दो आँखों ने फिर सवाल दिया।
“हाँ” कहते हुए चुपचाप उसने वह पुस्तक अपने बैग में रख ली और मूल्य चुका कर आगे बढ़ गई।
भीड़ छट चुकी थी। निकास द्वार साफ था। पल भर में वह प्लेटफार्म के बाहर उन्मुक्त वातावरण में आ गई। इत्मिनान की एक गहरी साँस ली और सड़क पार करके टैक्सी लेकर आगे चल दी।
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घर आते-आते वह काफी थक चुकी थी। एक तो दो रात का इतना लंबा सफर, वह भी अकेले। तिस पर मिलों की चिमनियों से उठते धुएँ को दूर-दूर आकाश की ऊँचाइयों में जाकर पवन से मिलकर समस्त वातावरण को गंदा करते देखना।
फिर स्टेशन से घर तक के सफर का माहौल। तौबा, तौबा। रेत गर्द के गुबार, सड़क के बगल लगे चूने, मौरंग, बालू के पहाड़, अनियंत्रित यातायात- भला फिर कौन नहीं थक जाता?
वह भी थकी-सी पड़ी थी अपने महीनों से बंद गंदले कमरे के गंदले पलंग पर। नींद की खुमारी नजदीक थी। बाहर दरवाजे पर दस्तक हुई। वह हड़बड़ा कर उठ बैठी। पल्लू को संभालते हुए दरवाजा खोला।
“अरे शालू तू?”
“क्यों चौक गई क्या? कितने दिन हो गए थे खिड़की और दरवाजे बंद देखते-देखते…सवेरा होता था, फिर दुपहरी और गर्म हवाएँ न जाने कहाँ-कहाँ से रेत इकट्ठा कर ले आती थीं और रंग जाती थीं तेरे दरवाजे, खिड़कियाँ, अटाने और बारामदे। संध्या को दुपहरी का तूफान जब शांत हो जाता, तेरे घर की हालत देख हृदय में एक अजब-सी टीस पैदा हो जाती थी। कभी-कभी तो यह भी कहने लगते थे कि कैसा उदास-उदास सा लगता है सब कुछ। मगर अब तू आ गई है। यह उदासी दूर हो जाएगी। फिर वही चहल-पहल हो जाएगी। अच्छा बोल क्या पिएगी, चाय या शरबत?”
“शालू अभी तो कुछ भी मन नहीं कर रहा है। बहुत थकान है। जी घबरा-सा रहा है। कुछ देर आराम करके नहाऊँगी, तभी जब जी हल्का होगा, कुछ खाने-पीने की सोचूँगी। अभी तो सिर्फ तू बातें किए जा।”
“ऐसे नहीं। तुझे कुछ पीना होगा। ठहर मैं अभी आई” कहते-कहते वह तेजी से कमरे के बाहर चली गई। अर्चना उसे बुलाती रही। मगर जब वह न लौटी तो वह फिर से लेट गई और अतीत के धुँधलके में अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से कुछ ढूँढने का, कुछ पाने का प्रयास करने लगी।
“वह भी एक जिंदगी थी” वह बुदबुदाई। “अमलतास की बेल के नीचे हर छुट्टी में एक घरौंदा बनाया करती थी। उसे सजाया करती थी। उसके बाशिंदे गुड्डे-गुड़ियों को दुलराया करती थी। गूदड़ के पुतलों में प्यार और संसार बसाया करती थी और फिर जब स्कूल खुल जाते थे तो सब कुछ भूल जाया करती थी। घरौंदा टूट जाया करता था। वह पुतले…”
“अरे तू ले आई। बड़ी जिद्दी है। कुछ भी नहीं मानती।”
“वह तो है, मगर यह बता क्या सोच रही थी?”
“कुछ भी तो नहीं।”
“तो क्या कह रही थी वह पुतले…और फिर मुझे देखकर चुप हो गई।”
“अरे, जीवन के एकांकीपन को दूर करने के लिए अनायास ही कुछ भी बेमतलब की बातें अपने आप याद याद आ जाती हैं…बस। और कोई खास बात नहीं है।”
“झूठ।”
“झूठ और तुमसे? शालू जीवन के उदास क्षणों में तू ही तो एक सहारा रही है, वरना जिंदगी वक्त के अंधेरे में न जाने कहाँ होती? देखती हो, इंसान क्या सोचता है और क्या हो जाया करता है?” कहते-कहते वह चुप हो गई।
“क्या हो गया?”
“कुछ नहीं बस…।”
“अरे हाँ तुझे एक बात तो बताना ही भूल गई थी।”
“क्या?”
“तेरे जाने के बाद तुझे पूछता-पूछता कोई एक बड़ी अजीबो-गरीब सूरत-शक्ल का इंसान यहाँ आया था। चुपचाप खड़ा अपनी डायरी के पन्नों से कुछ बार-बार मिला रहा था कि उसकी नजर मुझ पर पड़ी। बड़े अदब से उसने मुझे बुलाकर तेरे बारे में पूछा।
“फिर?”
“फिर मैंने सब कुछ बता दिया कि तू अभी छुट्टी पर गई है।”
“क्या नाम बताया था उसने?”
“कुछ नहीं। जब मैंने पूछा तो बोला, “रहने दीजिए। वह मेरा नाम सुनकर खुश नहीं होगी।” इतना कहकर वह चला गया। मैं भी रोकना चाहकर उसे रोक न सकी। लगता था किसी गहरे सदमे का असर था उसके दिलो-दिमाग पर। वह घुट रहा था। मगर खामोश घुट-घुट के सब पी रहा था। बेतरतीबी से छितरे बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी, खोई-खोई सी भारी आँखें, मैले-कुचैले कपड़े- सभी इस बात के साक्षी थे कि वह गम में डूबा कहीं अँधेरों में भटक रहा है। पूरी शक्ति से अँधेरों को रोक रहा है। मगर असहाय था। अँधेरों को रोकना उसकी शक्ति के बाहर की बात लगती थी।”
“उफ बेचारा।”
“क्या तू जानती है उसे?”
“हाँ अच्छी तरह से।”
“कौन है वह?”
“बता दूँगी, लेकिन अभी नहीं।”
“अच्छा बाबा तू बता या न बता। अब मैं पूछूँगी नहीं।”
“अरे तू तो नाराज हो गई शालू। बस इतनी छोटी-सी बात पर। सुन इधर आ।”
“नहीं, अब मैं भी फिर कभी सुनूँगी, आज नहीं। आज तू थकी हुई है। आराम कर ले। कल जी भर के बातें होंगी। सब पूछ लूँगी। देखूँ क्या छिपाएगी और कब तक? ले दरवाजा बंद कर ले, मैं जा रही हूँ।”
शालू चली गई।
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