कोई नाम न दो…भाग-2

43

‘आह!’ एक दीर्घ नि:श्वास छोड़ते हुए मिसिर जी ने अपनी आँखें खोलीं, चारों ओर देखा।
“अरे अविनाश बाबू।”
“हाँ बाबू जी, प्रणाम।”
“तुम आ गए बेटा?”
“जी बाबू जी।”
“मगर जब बुलाया तब नहीं आए। बड़ी इच्छा थी तुम्हारे साथ बैठकर चाय पीने की।”
“वह तो अब भी पी जा सकती है।”
“कल किसने देखा है? आज जो देखा है उसमें तो चाय पीना संभव नहीं।”
“आप कैसी बातें कर रहे हैं? इतनी जल्दी निराशा कैसी?”
“निराशा से बचने के लिए भला कब तक आशा को सँवारा जा सकता है। हर विश्वास की एक सीमा होती है न।”
“बाबू जी जीवन में कभी कटु असत्य को भी सत्य मानना पड़ता है, अन्यथा जीवन दूभर हो जाए। सृष्टि में जीवन का स्वरूप बहुत बिखरा हुआ है। हमें उस बिखरे जीवन को संजोकर रखना पड़ता है। शीशे के कैबिनेटों में कैद करना पड़ता है। भले ही वह एक-एक दीवार को तोड़कर भाग जाने को कितना ही उद्यत क्यों न हो जाए? मौत सत्य है, कटु सत्य है। अपवाद रहित सत्य है। फिर भी प्रतिपल जीवन हँसता हुआ देखने के लिए चेतना को मजबूर किया जाता है।”
“बेटा तुम्हें अपनी उम्र से कहीं अधिक ज्ञान है। कहीं बुजुर्गों की वह कहावत चरितार्थ न हो जाए।”

“कौन-सी कहावत?”
“बचपन में ज्ञानी, तनिक-सी जिंदगानी।”

“बाबा यह आप क्या कह रहे हैं?” एकाएक पास खड़ी अर्चना ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया था।
“बेटी मैंने जो भी कुछ कहा, निरुद्देश्य कहा, किसी बुरी भावना से नहीं कहा। मेरे अंदर भय जागृत हो उठा था। अविनाश बाबू तो साक्षात भगवान हैं। कितनी मधुरता और विश्वास है इनके शब्दों में। कितना पवित्र, निष्कपट और आशामय है इनका मन। देखो न! भगवान नहीं तो और क्या हैं? अविनाश मैं अभी तक निराशा में डूबा हुआ था। जीवन की साँसों को जीवित रखने में असहाय सिद्ध हो रहा था। मगर अब लगता है जैसे मौत, हाँ वह नहीं आएगी, मैं जी सकूँगा। जी सकूँगा क्यों अविनाश?”

“बाबूजी आप धैर्य रखें। निराश मत हों। आप स्वस्थ हो जाएँगे, जरूर स्वस्थ हो जाएँगे।”
“बेटा न जाने तुम्हारे शब्दों ने क्या जादू किया है। मुझे अब अपने ऊपर विश्वास बढ़ता जा रहा है। लगता है अब निराशा पास नहीं फटकेगी। तुम्हारे शब्द कितनी हिम्मत बँधा रहे हैं मुझे?”
“बाबू जी मेरे शब्दों में ऐसा कुछ भी नहीं। आप बड़ों की दुआएँ हैं।”
“बेटा एक प्रार्थना करूँ?”
“बाबू जी यह प्रार्थना शब्द कम-से-कम मेरे लिए प्रयोग मत कीजिए। मुझे तो आदेश दीजिए।”
“बेटा तुम्हारे आने और पास बैठकर बातें करने में बड़ा सुकून मिलता है। तुम समय निकाल कर रोज आया-जाया करो तो बहुत एहसान होगा। डॉक्टरों, वैद्यों और दवाओं की सुनते-सुनते थक गया हूँ। मालूम होता है कि अब तुम्हारे शब्द ही मेरा उचित इलाज कर सकेंगे।”
“आपकी ख़िदमत करने का मुझे सौभाग्य मिला है। मैं अवश्य आऊँगा। जो संभव होगा, करूँगा, आप निश्चिंत रहें।”
“अरे अर्चू।”
“हाँ बाबा।”
“देखो अविनाश बाबू आए हैं। इन्हें नाश्ता तो करवा दो।”
“बाबू जी नाश्ता कर चुका हूँ। जब आया था, आप सो रहे थे, मैं लौट रहा था किंतु श्याम भाई ने खिलाने-पिलाने के लिए रोक लिया। अब फिर कभी आऊँगा।”
“अच्छा ईश्वर तुम्हें दीर्घ आयु दे।” मिसिर जी ने एक पल रुक कर कहा, “अविनाश बाबू यही है मेरी पौत्री अर्चना, इसी को पढ़ाने के लिए आपसे कहा था।”
“जी अच्छा,” सिर नीचा किए अविनाश ने उत्तर दिया।
उसे पता नहीं था कि अर्चना उसके बिल्कुल करीब खड़ी थी, अर्चना ने भी उसे देखा।
“बेटी, यह अविनाश बाबू हैं, बहुत ही नेक, सहृदय, संयमित, तुझे पढ़ाने आ जाया करेंगे।” सामने ही रहते हैं।
“जी, जानती हूँ।”
“तू जानती है?”
“कई बार उस घर में आते-जाते देखा है।” कहते-कहते वह झेंप गई, अपनी भूल का उसे एहसास हो गया था। शीघ्र ही कमरे से बाहर चली गई। अपने कमरे में आकर तकिए से मुँह ढाँप कर बिलख-बिलख कर रोई।
“बाबू जी आज्ञा दें।”
“बेटे तुम बुरा मत मानना, अर्चना बहुत संकोची और शर्मीली है।”
“नहीं, नहीं, भला बुरा मानने की क्या बात? यह पहला अवसर था जब वह एक अजनबी के समक्ष पड़ी थी। पूर्ण स्वाभाविक था, कि वह हिचकिचाहट में ऐसे भाग जाए।”
“अच्छा बेटे।”

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अविनाश घर चला आया था। बहुत बेचैन, परेशान। रह-रह कर अर्चना का प्यारा-सा भोला, गोरा चेहरा, गहरी काली आँखें, लंबी सुदृढ़ नाक, गुलाबी कपोल, रक्तिम होंठ, घने काले केश, दृष्टि की चपलता, वाणी की मधुरता और बाल में स्वच्छंदता की महक उसके इर्द-गिर्द घूमने लगी।
भावुक हृदय की विह्वलता अक्षरों में उतर आई। एक गीत बना, उसका हर अक्षर उसने कितने प्रयास से सँवार-सँवार कर संजोया, जी भर कर उसे गुनगुनाया, एकांत में सपनों को जगाया। अपने दिल को खुद ही बहलाया, जब तक नहीं सोया, गीत गुनगुनाता ही रहा।

●●●

उस दिन के बाद से निरंतर अविनाश मिसिर जी के घर जाने लगा। घंटों उनके साथ बैठता, उन्हें हिम्मत बँधाता, आश्वस्त करता है कि वह निश्चित ही स्वस्थ हो जाएँगे। पन्द्रह-बीस दिन के भीतर ही मिसिर जी काफी स्वस्थ हो गए। वह दिन भी आ गया जब वह अपनी छड़ी के सहारे उठने-बैठने लगे। थोड़ी दूर तक घूमने भी लगे। घर में प्रसन्नता फैल गई। अक्सर ऐसा होने लगा कि मिसिर जी बाहर के बारामदे में आकर धूप में बैठ जाया करते, घंटों बैठे रहते, सो भी जाते। अर्चना ही उनको सहारा देकर अंदर कमरे तक ले जाया करती।
एक दिन मिसिर जी नित्य की भाँति बारामदे में बैठे थे। अविनाश स्कूल से घर वापस आ रहा था। मिसिर जी को बारामदे में बैठा देखा, तो उनके पास ही आ गया। उसे अपनी ओर आता देख मिसिर जी कुर्सी से उठ खड़े हुए।
“आओ बेटा, पता नहीं क्यों आज तुम्हारा बहुत इंतजार कर रहा था।”
“हुक्म कीजिए बाबू जी।”
“बेटा हुक्म नहीं।”
“बेटा आज ऐसे ही दिल में एक तीव्र इच्छा उठी है कि तुमसे कुछ बात करूँ। तुम्हारी बातें मुझे बहुत आनंद देती हैं।”
“बाबू जी आप तो बहुत शर्मिंदा करते हैं।”
“नहीं,नहीं, अच्छा बैठो।” स्वयं अविनाश के लिए कुर्सी को पास करते हुए बोले।
“बेटा तुम्हारे उपकार का बदला मैं कैसे चुकाऊँ।”
“कैसा उपकार बाबू जी?” आश्चर्य से अविनाश ने पूछा।
“अविनाश तुम्हारे उन्मुक्त हृदय से निकले हुए आशा भरे शब्दों के सम्मुख तो इस दुनिया की कोई भी चीज राख के समान है। तुम्हें क्या भेंट दूँ?”
“बाबू जी अपना आशीर्वाद और अपना प्यार। यही मेरे लिए एक बहुत बड़ी अमानत होगी। मुझे इस दुनिया में किसी से कुछ नहीं चाहिए। मैं अपने जीवन को प्रेम, त्याग और सेवा की बेदी पर ही होम कर देना चाहता हूँ। मुझे किसी का प्यार मिले जिसे मैं दूसरों तक बढ़ा सकूँ, यही मेरे जीवन का लक्ष्य है।”
“कितने उत्तम विचार हैं बेटा तुम्हारे।”
“तुम्हारे माता-पिता कहाँ हैं?”
“कोई भी अब शेष नहीं है। कहते-कहते अविनाश गंभीर हो गया।”
“क्यों, कब वे तुम्हें अकेला छोड़ कर चले गए?”
“बाबू जी 30 सितंबर 1993 की बात है। तब हम गुजरात में थे। लातूर जिले में। मैं छोटा था। 13 वर्ष का था। सुखी परिवार था। घर में माँ-बाप, भाई-बहन सभी थे। मगर होनी कब हो जाए कोई नहीं जानता। एक दिन रात में अचानक धरती को एक जोरदार झटका लगा। धरती फट गई। शहर का शहर उसी में समा गया। हजारों लोग मारे गए। मैं और कुछ अन्य भाग्यहीन मलबे में दबकर भी साँसें लेते रहे। जब सहायता कार्य करने वाले आए तो उन्होंने लोगों को मलबे से निकाला, जो मर गए थे उन्हें एक साथ ही आग दे दी और जो बचे थे उन्हें अस्पताल भेज दिया गया था।”

मैं न अस्पताल जाने की अवस्था में था और न चिता पर सवार होने लायक। मैं दूर खड़ा चीख-चीख कर रो रहा था। अपने घर को ढूँढ़ रहा था। अपनी माँ, अपनी बहन और अपने प्यारे पिता को ढूँढ़ रहा था। मगर विकृत चेहरों में मुझे कोई नहीं मिल रहा था। मैं रोता-बिलखता गिरता पड़ता सब तरफ मदद के लिए दौड़ रहा था, किंतु जिस मदद को मैं चाहता था भला वह कौन दे सकता था मुझे। कौन वापस दिला सकता था मुझे मेरी प्यारी माँ, मेरे पिता और मेरे भाई-बहन….. कोई नहीं दिला सकता था। बिलखते-बिलखते मैं थक कर चूर किनारे बैठ गया।
पल भर में एक गाड़ी आई। उसमें सभी लावारिसों को भर दिया गया। इसके बाद उन सभी को एक ऐसे मरघट घाट पर ले जाया गया, जहाँ सचमुच जीवन का कोई प्रकाश नहीं था। एक अजब-सा अँधेरा छाया हुआ था वहाँ पर। सूर्य की प्रसन्न किरणें भी उदास थी वहाँ। मैं भी वहाँ मौजूद था।
वह दिन था कि मुझे मौत का विकराल रूप दिखाई दिया था। मैं एक उजाड़ पेड़ के नीचे मिट्टी के बड़े टीले पर बैठा था। कुछ चिताएँ जल रही थीं। कुछ जलने को तैयार थीं। इसी बीच एक बड़ी-सी चिता तैयार हुई और उसमें एक-एक करके सभी लाई हुई लाशें सुला दी गईं। चिता जल उठी। आकाश लाल हो उठा। पार्थिव शरीर पल भर में अपने अस्तित्व खो बैठे। मैं देखता रहा मौत का काला दैत्य… प्राणों का सौदागर कितनी बेरहमी से खिलवाड़ कर रहा था।
मेरा बालक हृदय सिसक उठा कि अचानक मुझे लगा किसी ने प्यार से मेरे गालों को सहराया और मृदु स्वर में कहा, ‘बेटे वचन दे तू कभी आँसू नहीं बहाएगा।’

‘माँ’ मेरे मुँह से अनायास ही निकल पड़ा और ऐसा लगा कि किसी ने सुबकते हुए मुझे अपने वक्ष से लगा लिया और फिर कानों में एक आवाज पड़ी। ‘मैंने तुझे तेरे हाल पर छोड़ दिया है बेटे, तू जी तो लेगा न।’
“हाँ माँ, जी लूँगा मगर तुमसे… मैं सिसक उठा था, मेरी आवाज थम गई थी। मुझे घबराता देख फिर आवाज आई, “अभी तूने वचन दिया था न, तू रोएगा नहीं, हँसेगा, और सबको खूब हँसाएगा, फिर तू रोने लगा।”
मुझे अपनी भूल मालूम हो गई। मैं उठ बैठा। आवाज देने वाले से चिपट कर यह कहने को बेचैन हो उठा कि “मैं कभी नहीं रोऊँगा। सबको हँसाऊँगा।” मगर जब देखा तो कोई नहीं था। चारों तरफ अँधेरा था। खामोशी थी। जीवन का नाम नहीं था। चिताओं की लपटें आकाश को छूने को लालायित थीं, मगर हार कर फिर वापस लौट पड़तीं और धूल-धूसरित हो जातीं।

रात्रि के वीराने में अनोखे जानवरों की आवाजों के मध्य एक आवाज सुनाई दी- ‘अलविदा ।’ यह भी मेरी माँ की आवाज थी। मैं गुमसुम खड़ा था। न जाने कितनी देर ऐसे ही खड़ा रहा। शायद मेरी अवस्था का ध्यान फिर मेरी माँ को आया और मुझे फिर उन्होंने प्रेरणा दी और मैं चल पड़ा बस्ती की ओर। बाबू जी कह नहीं सकता माँ को कितना प्यार करता था मैं। मगर वह चली गई….

“उनसे अब फिर मेरा मिलना होगा या नहीं, कौन जाने। मगर जो वचन मैंने उन्हें दिए थे, उन्हीं को तब से पूरा करता चला आ रहा हूँ। माँ के ही आशीर्वाद और उन्हीं की प्रेरणा से आज मैं जिंदा हूँ, किसी काम का हूँ वरना मैं कहाँ होता….मुझे खुद नहीं पता।” कहते-कहते वह सुबक उठा था।
“बेटा तुमने बहुत दुख देखे हैं। मगर बड़ी हिम्मत से पार किया है सब कुछ।”
“बाबू जी माता का आशीर्वाद है, जब तक वह रहेगा मुझे विश्वास है कि मैं जिंदा रह सकूँगा और सफल रह सकूँगा।”
“लेकिन तुम्हारे गीत किसकी प्रेरणा हैं अविनाश?”
“जीवन की सत्यता के।”
“बस”
“और मेरी माँ के।”
“माँ के?” आश्चर्य से मिसिर जी ने पूछा।
“जी हाँ, माँ ही मेरे जीवन का सत्य थी, ज्ञान थी, तपस्या और मोक्ष थी। उनसे जितना कुछ मैंने पाया है शायद वह कहीं से मैं नहीं पा सकता था। उनका प्यार, उनकी सहृदयता और स्पष्टवादिता…बाबू जी उनमें क्या नहीं था, मैं आपको बता नहीं सकता। काश! कि वह आज होतीं….”अविनाश की आँखें नम हो गई थीं।
“अविनाश पुरानी बातों को भूल जाना ही अच्छा होता है। पुरानी यादें सिवा इसके कि तुम्हारे भरे हुए जख्मों को कुरेद कर अंतःकरण को पीड़ा से भर दें और कुछ नहीं दे सकतीं। वर्तमान की हर एक बात भविष्य के निर्माण का आधार होती है। भावी सुख और दुख तुम्हारे आज के किए गए कार्यों पर अवलंबित है। इसलिए मेरी राय तो यह है कि तुम अपने मस्तिष्क का विकास और अधिक करो और आगे बढ़ने की सोचो।” कहते-कहते मिसिर जी ने आवाज दी, ‘अर्चू।’
“आई बाबा।”
अविनाश के रोंगटे खड़े हो गए। न जाने क्यों हर बार अर्चू का नाम उसके दिल में हैरानी को जन्म दे देता था।
“बाबू जी अच्छा अब आ…

‘अविनाश’ मौन टूटा।
“जी बाबू जी”
“कहाँ खो गए?”
“प्रकृति ऐसी चीज ही है बाबू जी….इसमें कौन नहीं खो जाता?”
“हूँ, मगर इधर भी तो देखो।”
“अरे यह कब आ गई?”
“तुम्हें पता ही नहीं चल पाया।”
“क्षमा कीजिएगा बाबू जी, बस यूँ ही कुछ सोचने में खो गया था।”
“नहीं-नहीं बेटा, लेखक और कवि हृदय ऐसे ही हुआ करते हैं।”
चाय की प्याली बनाते हुए अर्चना ने चंचल दृष्टि से अविनाश को देखा और मुस्कुरा उठी। अविनाश अर्चना का अपनी ओर देखना तो नहीं देख सका किंतु उसके होठों की मुस्कान पर दृष्टि पड़ी तो वह समझ गया कि अवश्य ही अर्चना को उस पर हँसी आ गई है।
अविनाश ने अपनी झिझक मिटाने के खातिर अपना पहलू बदला और बैठ गया। अर्चना ने एक कप अविनाश को पकड़ाते हुए धीरे से कहा- ‘लीजिए’
“आपको दीजिए।”
“अरे मैं ले लूँगा बेटा, तुम तो पिओ।”
झिझकते-झिझकते अविनाश ने चाय का कप ले लिया और बहुत हिम्मत बटोर कर जाती हुई अर्चना से बोला, “आप भी साथ दीजिए।”
“जी” और स्वीकारोक्ति पाने की गरज से मिसिर जी की ओर देखने लगी।
“हाँ बेटी आओ। प्याला ले आओ, तुम भी हमारे साथ चाय पिओ।”
“आई।”
मन में उछलती किंतु सहमते कदमों से वह अंदर चली गई। कुछ देर बाद ही वह एक खाली कप लेकर बाहर आ गई।
“आओ बेटी बैठो” स्टूल की ओर इशारा करते हुए मिसिर जी बोले। अर्चना धीरे से स्टूल लाकर मिसिर जी के पास बैठ गई।
“अविनाश बाबू यह हमारी बहुत लाडली है। बड़े ही स्वतंत्र विचार हैं इसके। हम लोग कभी भी इसके विचारों के संबंध में कुछ नहीं बोलते। जैसा नाम है वैसे ही गुण हैं इसके। क्यों बेटी हैं ना?”
अर्चना शर्माती हँसी हँसकर थरथराते होंठों को बंद करने का प्रयास करने लगी।
“अर्चना, बड़ा प्यारा नाम है।”
“हाँ बेटा, यह अर्चना का ही परिणाम है। बस इसीलिए इसको अर्चना नाम दे दिया गया है। संगीत में दक्ष और चित्रकला में बहुत ही कुशल है।”
“यही नहीं जिस समय यह भजन गाती है तो अहा। मन एक स्वार्गिक अह्लाद से भर उठता है। लगता है हर पंक्ति, भजन का हर शब्द दुनिया की सच्चाई बता-बता कर आत्मा को कहीं ले जाना चाहता है… स्वयं विचलित मन उस स्थान को ढूंढ़ने लगता है। जिस प्रकार कस्तूरी की खुशबू हिरण को पागल कर वन-वन दौड़ाती है वैसे ही अर्चना की आवाज स्वर्ग की एक ऐसी तस्वीर खींच कर रख देती है कि मन बेचैन हो उठता है, उन्मुक्त हो जाता है।”
“तब तो बाबू जी आज एक भजन भी जरूर हो जाना चाहिए।”
“क्यों नहीं, क्यों नहीं? बेटी सुना तो दे तू कोई भजन।”
“बाबा” शर्माते हुए अर्चना ने अपने झिझक प्रकट की।
“बेटी भजन भगवान की लीला का बखान करते हैं और भगवान की लीला निष्कलंक, निष्पाप और पवित्र होती है। उसको गाने में झिझक कैसी। उसका तो बख़ान जहाँ भी करने का मौका मिले कर देना चाहिए। कभी भी नहीं चूकना चाहिए। जितने अधिक गुण गाओगी, भगवान उतने ही अधिक प्रसन्न होकर तुम्हारा आँचल अपनी दया से भरेंगे। सुनाओ बेटी सुनाओ शर्माने की कोई बात नहीं। वही भजन सुनाओ….”
“हरि बिन लागे कहीं न मनुआ हमार
जब से गए तुम छोड़ हमें ब्रजनंदन
कबहूँ न आई लौट बहार
कौन विधि कर तुम्हें बुलाऊँ
कौन जतन से दर्शन पाऊँ
हम सब निर्बल लाचार।”
अविनाश अभी तक भजनों के भावों में खोया गुमसुम बैठा था। कितने सुंदर भाव थे और कहीं सचमुच इन्हीं भावों को लेकर इसे गाया गया तो निसंदेह मिसिर जी की कही बात अक्षरशः
सत्य हो जाएगी। यही सोचते हुए अविनाश ने अपना पहलू बदला और एकाग्रचित्त होकर बैठ गया।
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