भाव से भावना

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G.P. Varma

भावना मनुष्य के सर्वांगीण विकास की धुरी है। विचारों की जनक है। चरित्र की निर्मात्री है। भावना मानव मन की अतल गहराई में पुष्पित और पल्लवित होती है, फिर भी वह व्यक्ति के वाह्य परिवेश से अप्रभावित नहीं रहती। जन्मतः भावना निश्छल होती है। सद्गुण युक्त कल्याणमयी होती है, किन्तु इसका स्वरूप व्यक्तित्व पर पड़ने वाले वाह्य प्रभावों के फलस्वरूप शनैः-शनैः प्रदूषित हो जाता है। विस्तार के स्थान पर भावना में संकुचन का प्रसार होता है।

भावना स्वार्थसिद्धियों का माध्यम बन जाती है। यहीं से उसके दूसरे स्वरूप और दुर्भावना का जन्म होता है। व्यक्तित्व सद और दुर्भावना के दो तटों में बंट जाता है। दोनों तटों की दूरी इतनी अधिक हो जाती है कि चाहकर भी व्यक्ति उसे पाट नहीं पाता। कालांतर में सदभावना और दुर्भावना में जीते हुए तनावपूर्ण स्थितियों का सृजन करते रहना व्यक्ति की नियति हो जाती है। यह तनाव उसे कहीं का नहीं रहने देता। वह स्वजनों, समाज व स्वयं से भी कट जाता है और अनेक शारीरिक, मानसिक एवं संवेदनात्मक व्याधियों का शिकार हो जाता है। इसीलिए ज्ञानियों ने भावना और विचार के समुचित सामंजस्य और संतुलन को प्रमुखता दी है।

हृदय यदि सागर है तो मस्तिष्क सागर में स्थापित जलद्वीप गृह है, जो व्यक्ति के शरीर रूपी जहाज को दिशा दिखाता है, उसे जीवन की वक्रताओं का अनुभव कराता है। उसके सफल जीवन की यात्रा हेतु सुगम पथ का निर्माण करता है। व्यक्ति इस सहज प्रक्रिया को स्वीकार नहीं कर पाता है। हृदय और मस्तिष्क में श्रेष्ठता का द्वन्द्व प्रारंभ हो जाता है। तनाव का एक और कारण पैदा हो जाता है। भावों का जनक हृदय यह स्वीकार नहीं कर पाता की मस्तिष्क जलद्वीप गृह का कार्य कर सकता है। वह भावना की प्रचंड लहरों को ही जीवन की नैया का खेवनहार मान बैठता है। विचारों के गर्भ में भी वह भावना को समाहित पाता है। कभी भावनाएँ अपनी रुचि के अनुसार गलत को सही साबित कर देती हैं। यह स्थिति भयावह होती है। व्यक्ति सही निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है। सफलता के लिए आवश्यक है कि भाव और भावना में सामंजस्य हो। दोनों का लक्ष्य जगत कल्याण और आराध्य की प्राप्ति हो। इससे विरत कोई लक्ष्य जीवन में हताशा, निराशा और कुंठा को जन्म देता है।

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