जब नेत्र शून्य हों

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जब नेत्र शून्य हों
अंतरात्मा विलीन हो
तुम मद्धिम से मन को टटोलना
चंद बातें तसल्ली भरी खोजना
किसी विगत चंचल क्षण की गांठें खोलना
भीतर उठते ज्वार को स्वाति बूंद से तोलना
नितांत ही कोई पथ मिलेगा
आशाओं का नवहर्षित सूर्य खिलेगा….

जब नेत्र शून्य हों
अंतरात्मा विलीन हो
तुम मद्धिम से मन को टटोलना
किसी अनभिज्ञ राह की बांह पकड़ना
जन समाज का सब भय तजना
हृदय की संकल्प शक्ति परखना
बाधाओं से अविचलित रहना
नितांत ही कोई पथ मिलेगा
शह का अनिलध्वज फिर फहरेगा…

आज भय से ही तो द्वंद है
उस युद्ध का ही तो आनंद है
जब सहपक्षी में ही प्रतिद्वंद है
अनिश्चितता के तुम आबंध खोलना
जब नेत्र शून्य हों
अंतरात्मा विलीन हो
तुम मद्धिम से मन को टटोलना
अवश्य ही कोई पुंज दिखेगा
मन का तमस सारा हर लेगा
आशाओं का नवहर्षित सूर्य खिलेगा
शह का अनिलध्वज फिर फहरेगा…

@महिमा पाण्डेय

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