जीना है मुझको जीना है

184

Vibha Pathak
जीना है मुझको जीना है
जीवन गरल विष पीना है
मन रन से मनयुद्ध जीतना है
फटे हाल हर नातों को सीना है
रूठें रूठें से है अरमान उन्हें मनाना हैं
फीके पड़े चाव पकवान पकाना है
मिले तुष्टि और पुष्टि ऐसी भूख जगाना है
बोझिल है ममता के कंधे उनकी ओट बनना है
मंद हुए क़दमताल जिनके उनमें दम ओज भरना है
नहीं कहना कि चलना नहीं अब
अभी तो चलना सीखना है
रुक कर किसी को क्या मिला है
चलकर ही तो कुछ पाया है
कहतें हैं सब तोड़ो मोह को पर
मोह ने ही तो सब कुछ जुड़वाया है
माना साथ नहीं जाना है कुछ पर
फ़क़ीर बन कहाँ रह पाना है
बनने को तो बन जाओ मस्त मौला
पर बिन दानापानी जुगाड़ के रातों की नींद भी उड़ाना है
है सांस तभी तो आस है पर इस आस के लिए
एक उजाले का अथक दीया जलाना है
ढलती है सांझ क्योंकि अगली सुबह को बुलाना है
जीना है मुझको जीना है
जीवन गरल विष पीना है

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here