संगम की रेती

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डॉ आरके सिंह, वन्य जीव विशेषज्ञ, कवि एवम स्तम्भकार
बहुत याद आती है, वो संगम की रेती।।

वो श्यामल सी यमुना, वो धौली सी गंगा।
वो अमरुद की खुशबू, चन्द्रशेखर की धरती।
विश्वविद्यालय की लव लेन, कटरा की गलियां।
हाई कोर्ट के बाटी चोखे, सिविल लाइंस की कॉफ़ी।
सीएमपी के ग़ुलाब जामुन, लोकनाथ के समोसे।
वो कंपनी बाग़ की सैर, नेता चौराहे की मस्ती।
न जाने कहाँ खो गए कशमकश में।।

बहुत याद आती है, वो संगम की रेती।।

वो सूरज का ढलना, वो संगम पे खिलखिलाना।
वो त्रिवेणी के पानी में, चांद का टिमटिमाना।
वो संगम की रेती पे दौड़ लगाना।
महादेवी की जननी, जहाँ बसते थे निराला।
गवाह बनी तू, जब बच्चन ने रची मधुशाला।
ध्यानचंद की जननी, तीर्थराज की धरती।
वो सरस्वती की धारा, वो कुम्भ मेले की धरती।।

बहुत याद आती है, वो संगम की रेती।।

वो संगम की रेती पे धूमी रमाना।
निहारे कौतूहल से जिसको ज़माना।
भारद्वाज की तपोभूमि, वो नागाओं की धरती।
बुध-इला की धरा, वो पुरुरवा की धरती।
वो धरती रही जो, सदा चन्द्रवंश की जननी।
हर जनम में रहे, वो हमारी भी जननी।
प्रतिष्ठानपुर की भूमि, वो प्रयाग की धरती।।

बहुत याद आती है, वो संगम की रेती।।

–डॉ आरके सिंह, वन्य जीव विशेषज्ञ, कवि एवम स्तम्भकार

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