जब तक नमी हैं…

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Vibha Pathak
जब तक नमी हैं
कैसे कहूँ
पानी नहीं हैं
हवाएं जब तक
बहती हैं
कैसे कहूँ
साँसे ज़िंदा नहीं हैं
मर चुकी है भूख
पर माँ ने हाथों से
ठोक रोटी सेंकी है
कैसे कहूँ
अब भूख नहीं है
ढूंढता है चाँद चाँदनी को
सूरज की लाल बिंदी में
कैसे कहूँ
श्रींगार नहीं है
देखा है पीठ पे लदे बच्चों को
मेले में खुशियाँ बटोरते
कैसे कहूँ
फर्ज़ की स्तम्भ नहीं है
साँझ ढले खेल कर
धूल धुरषित थक
माँ से लिपट जाते बच्चे
कैसे कहूँ
ममता की डाली नहीं है
कितना भी छुपाऊं
हर सुख दुख की गट्ठर को
माथे पर पड़े हर सिलवटों को
अपने जान जाते हैं
कैसे कहूँ
प्रणय का दर्पण नहीं हैं

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