एक अभिशापित की प्रार्थना

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Mousam Rajput

१ : एक अभिशापित की प्रार्थना

मैं अपनी सारी प्रत्युषाएं तुम्हे देता हूं
इस अप्रिय अंधकार को अपने स्वभाव की उन्मादी
दीवारों में लगाते हुए
किसी तस्वीर की भांति
जाओ
सप्तरंग आकाश से अपनी कल्पनाएं भरो

यही आवेग तुम्हारा धर्म हो
फिर कभी कोई तुम्हारे पथ का अवरोध न बने

जाओ , देवकन्या !
नए इतिहास रचो
इंद्र के आसन तक पहुंचने में
फिर किसी स्त्री को कभी कोई संकोच न हो

मेरे पौरुष का अहम भी तुम्हें
और ऊंचा और ऊंचा उठते देखना चाहेगा
मुझसे भी अनंत ऊंचा

उस ऊंचाई तक जाओ, जिसे देखकर कभी मैं
स्वयं को तुम्हारे योग्य न समझकर
एक पीड़ादाई संतोष के सांचे में ढाल लूं

जाओ !
तुम्हारे ऊंचे रहने के स्वप्न दीर्घायु हों।
मेरी भांति (तुम्हारे लिए तुम्हारी प्राप्ति के यज्ञ को भी अधूरा छोड़कर)
सब तुम्हारे लिए
अपना सर्वस्व त्यागने को तत्पर हों

तुम्हारी स्मृति की पीड़ा में जीवन हेतु
सन्यास की उभरती आकांक्षा त्यागने को भी।

२: तुम प्रेम किए जाने योग्य हो

इसलिए
मैं तुमसे प्रतिस्पर्धा नहीं करता

मेरा अंतिम वाक्य
समाज के उत्थान पर होगा तो भी
तुम्हारी चर्चित हंसी की खुश्बू से बंधा हुआ

अपने पूर्वाग्रहों के जाल
और मेरे असौंदर्य के अंधेरे को तोड़कर
मेरा प्रणाम स्वीकारो

किसी प्रेमी का बिना किसी शर्त पर
मौन के गहरे अवसाद के बावजूद
किसी की आवाज को प्रणाम करना
सदी की सबसे बड़ी क्रांतिकारी घटना है।।।

तुम्हारी उपेक्षा में भी
तुम्हारे उन्नयन को उत्सुक

अपनी भौतिक आकांक्षाओं की हत्या करता हुआ

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