*मेरी दोस्त, मेरी सहेली*

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सोचा तुम पर कुछ लिखने को
शब्द मुझको पर मिलते ही नहीं,
तुम बिन मेरा जीवन कुछ ऐसा
जैसे सूरज बिन कुछ फूल खिलते ही नहीं…

क्या सोचूं, क्या बोलूं
क्या याद करूँ, मैं क्या भूलूँ
कौन से पल मैं लिख डालूँ,
पल कौन कौन से संजो डालूँ…

वो सालों के सिलसिले स्कूल में
एक बेंच पे साथ बैठने के,
यूँही बेमतलब की गप्पें हों,
या पल वो हँसने रूठने के…

वो रोज़ रोज़ की मुलाकातें
बातों की झाड़ियां शामों की ,
बातें वो स्कूल के बच्चों की,
या थोड़ी सी चुग़ली मैमों की..

कभी यूँही टहलना सड़कों पर,
या खो-खो की वो तैयारियां हों..
बातें अड़ोस या पड़ोस की,
या मनचलों की दुश्वारियां हों…

कितना भी डर हो दुनिया का,
हमदोनों का फिर भी जीते जाना..
थे दोनों को दर्द बहुत सारे,पर
ख़ुशी ख़ुशी उन्हें पीते जाना..

मेरा जब तब का रो देना,
गुस्से से तुम्हारा वो समझाना,
तुम्हारी सारी ही बातों में,
फिक्र और प्यार का झलकाना…

और तुम्हारी कुछ परेशानी में
वो मेरा फ़िक्रमंद हो जाना,
छोटी छोटी सी चिंताओं में,
गहरी सी बहस में खो जाना…

साथ साथ कॉलेज जाते थे,
मिलकर दोनों का नोट्स बनाना,
बातें तो तब चालू रहती थी
जब हो फेयरवेल के क़ोट्स बनाना…

अपनी अपनी लंबी सी लिस्ट लिए,
वो बाज़ार के सारे कामों का करना,
लौट के वापस घर पर अपने,
वो घंटों फिर हिसाब में उलझे रहना..

रेडियो पे आते गानों पर,
तुम लिए मुझे थिरकती थी,
कई बार कहा नहीं मैँने, फिर भी
मेरी हर बात समझती थी…

छत की सीढ़ियों वाली गप्पें,
और साथ में चाय की चुस्कियां,
वो ठहाकों पे मम्मी का चौंकना
कभी कभी धीमी सी सिसकियाँ…

आज यहाँ जाना है मुझको
क्या पहनूँ, क्या ना पहनूँ,
अब तक भी तो यही करती हूँ
धन्यवाद मैं इसका कैसे बोलूं…

तुम दोस्त हो मेरी पक्की वाली,
तुम्हें, तुमसे बढ़कर जाना है,
नज़र किसी की कभी न लगे
तुम्हें हर रिश्ते से बढ़कर माना है…

मेरे हर भावों की ज्ञाता हो,
हर वक़्त का है जो साथ तुम्हारा,
शब्दों में कहना बहुत मुश्किल है,
हाँ, सच ..
शब्दों में कहना नामुमकिन है
साथ ये मेरा और तुम्हारा….

~ अनीता राय ~

 

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