मजबूरियों के बंधन ….

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बड़े मजबूत होते हैं, ये मजबूरियों के बंधन….
लोग वहां भी बंधे रहते है, जहाँ इजाजत नहीं देता है अंतर्मन ।
मनुष्य परिस्थियों का दास है, ये साबित करती हैं मजबूरियाँ;
अनचाहे लोगों को पास लाती है, करवाती है अपनों से दूरियाँ ।
पेट की आग में कोई भिखारी बनने को मजबूर है,
अपनों की खातिर कोई हो गया अपनों से दूर है ।

बड़े मजबूत होते हैं, ये मजबूरियों के बंधन…
रोशन है; बदनाम गलियां कई, मजबूरियों के चिराग़ से;
बिक रहा है तन, और जल रहा है मन, बेबसी की आग से ।
मसली जातीं हैं हर रोज़, अनगिनत कलियां यहाँ पर;
मजबूरियां बिकती है कैसे, ये देख लो यहाँ आकर ।

बड़े मजबूत होते हैं ये मजबूरियों के बंधन…
देखकर बच्चों का मुँह, ‘वो’ कुछ न कहते हैं;
दूरियाँ हैं मन में, पर दो तन साथ रहते हैं,
देखना नहीं चाहते हैं ‘वो’ एक दूसरे की सूरत;
फिर भी जोड़े है दोनों को एक दूसरे की जरूरत ।

बड़े मजबूत होते हैं, ये मजबूरियों के बंधन….
विवशता में हाथ बाँधे, फिर दूर कोई जनक खड़ा;
हाय ! जानकी का है पाला राम से है फिर पड़ा,
किसका हाथ थामेगी सीता, कर्त्तव्य या अधिकार ?
संतान की खातिर; मैथिलि ने, ‘परित्यक्ता’ होना किया स्वीकार ।

बड़े मजबूत होते हैं, ये मजबूरियों के बंधन….
मजबूर है ‘लौ’ जलने को, जो बुझ गयी तो तम गहरायेगा;
और न बुझी तो, पतंगा बेमौत मारा जायेगा,
पतंगे की भी है अपनी मज़बूरी,
मृत्यु तो स्वीकार्य है पर न हो लौ से दूरी ।

बड़े मजबूत होते हैं ये मजबूरियों के बंधन….
चल रही हैं साँसे कि ह्रदय में स्पंदन है;
शरीर में कैद है आत्मा कि मोह का बंधन है,
हर क्षण जीवन जी रहे हैं, हर पल मौत आ रही है;
हर श्वाश जीवन दे रही है, हर श्वास मृत्यु पा रही है ।
बड़े मजबूत होते हैं ये मजबूरियों के बंधन….

  1.       ~ गीतांजलि शुक्ल ~

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