ख़ुद से

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एक बार फिर मैं आज खुद से मिल रही हूँ…
न ही कोई कशमकश, न ही कोई बेचैनी ,
न ही कोई तनहाई, न ही कोई रुसवाई;
एक बार फिर मैं आज खुद से मोहब्बत कर रही हूँ…
न ही कोई शिकवा, न ही कोई शिकायत,
न हीं कोई उलझन, न हीं कोई शोर;
आखिरकार मिल ही गई मुझे अपनी मंजिल की डोर…
जिस को पाने के लिए मन में एक शोर था,
एक कशिश थी एक समझौता था ;
एक बार फिर मैं उसी खामोशी में मिल रही हूँ;
आखिरकार एक बार फिर मैं आज खुद से मिल रही हूँ…
कितनी मुद्दत के बाद आज एक सुकून सा है,
मन में है एक उमंग एक जुनून सा है ;
ये कैसा इत्तेफाक है कि वही खामोशी है वही मंजर है ,
वहीं रातें हैं और वही समंदर है ;
और उन ही खामोश रातों को गुलज़ार कर ,
एक बार फिर मैं आज खुद से मिल रही हूँ …
एक बार फिर मैं आज खुद से मोहब्बत कर रही हूँ…

 

———प्राची द्विवेदी————

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