हर आदमी!

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Mousam Rajput

हर आदमी बैठा है
अदृश्य स्पर्धा की सीमा पर,
अपने प्रति ‘अपरिचय’ की हत्या की ताक में,
हर आदमी चल रहा है
दूसरे आदमी का बेगुनाह पैर काटते हुए

हर क्षण साक्षी है
कि खून खरीदा जा रहा है
युद्ध की आत्मा की शांति के लिए

तुम्हारे छल के प्रतिबिंब मुझे प्यारे हैं
हर आदमी की तरह तुमने सीख लिया
सूर्य का गला घोंटना
हर सुबह, उषा को उल्लासित मछलियों पर
जाल डालना

हर आदमी की तरह
हर आदमी के कुर्ते पर दाग ढूंढ़ना
अपनी जड़ों के स्त्रोत पर संजीदगी से
घृणा के एसिड का छिड़काव करने की कला!

बहुत पहले तुम्हें बताया जाना चाहिए था
चेहरे जो एसिड सह लेते हैं
नहीं सह पाते
अपनी ही घर की दीवारों पर अपने ही हाथों लिखा वह वाक्य
जो स्वयं को दोषी सिद्ध करता हो
हर उपेक्षा के काले दाग को चौराहे पर उकेरे जाने का!

हर आदमी कि आँख अब
उस चौराहे पर है जो
जो तुम्‍हारी नफ़रातों को सलीका दे रहा है
कि सलीके से काटना चाहिए हर उड़ती पतंग
हर आदमी के पैर
हर मासूमियत के नव अंकुरित पेड़!

अपनी अपनी पीड़ा का परिमार्जन आवश्यक
और स्मृति का उन्मूलन अनिवार्य
इससे पहले कि आत्मा का संक्रमण
गेंग्रीन हो जाए…

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