गज़ल

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Mousam Rajput

तुम्हारी तलाश में हद से गुजर रहा हूँ मैं
खुद से ख़फा भी हूँ कि ये क्या कर रहा हूँ मैं .

तुम्हारे शब्द थे, कि लगता था जिंदगी, जिंदा है
तुम्हारी ख़ामोशी है कि लगता है मर रहा हूँ मैं

अनछुए ख्वाबों के मोती समेट सको तो आ जाओ
भूखी भीड़ के चौराहे पर देखो, बिखर रहा हूँ मैं

मैं नदी हूँ ,प्यासे होठों को तलाश है मेरी
ये तेरा इंतज़ार है कि दरिया के जैसे ठहरा हूँ मैं
……

गज़ल

जितना छिपाओ मुफलिसी से नकाब गिर जाते हैं
खौफजदा आँखों से हमेशा ख्वाब गिर जाते हैं

मिरि ख्वाब ए गज़ल कभी मुकम्मल नहीं हो पाती
जज्बात सम्हलते हैं तो अल्फाज गिर जाते हैं

जिन्दगी का कागज़ हर बार मैला हो जाता है,
लिखते लिखते हर बार कलम के आंसू गिर जाते हैं।

शेर…
1
तेरा ठहरना जायज़ नहीं,तेरे जाने में मुश्किल भी है
तू किसी का रास्ता भी है, तू किसी की मंजिल भी है ।

2
बहुत इत्मिनान से ख्वाहिश रखना अफसर बनने की ,
आसां नहीं शबे हिज्र को किताबों से काटना।

  • मौसम

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