फ़ेल न होना … भाग – 8

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रितेश का एक ही शौक था- यायावरी। उसके लिए न तो साधन थे और न स्वीकृति। शौक को पूरा करने के लिए वह पिताजी के ऑफिस जाते ही घर छोड़ देता था। पूरा दिन वह नहर के किनारे बने बगीचों और गाँवों में घूमता रहता। पुरानी यादों को ताज़ा करता, जहाँ बैठ जाता- माउथ ऑर्गन पर संगीत लहरी छोड़ देता। संगीत सुनकर गाँव के तमाम बच्चे, बूढ़े उसको घेर लेते। घंटों उसके पास जमावड़ा रहता। वह उनके साथ गप्प किया करता। उन्हीं के साथ कंचे खेलता, गुट्टे खेलता और पिताजी के आने के पूर्व वह घर पहुँच जाता था। पिताजी को उससे जो कुछ कहना होता माँ के माध्यम से कहला देते थे। वह उससे बात नहीं करते थे।

जून के अंतिम सप्ताह में परीक्षाफल घोषित हुआ। वह सेकण्ड डिवीज़न में पास हो गया था। पिछले पांच वर्षों में यह पहला अवसर था कि वह पास हुआ था। घर में ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। माँ ख़ुश थी। बहुत ख़ुश थी। रह-रहकर उनकी आँखें ख़ुशी से डबडबा रही थीं। शाम को पिताजी आए। ज़माने बाद उनके चेहरे पर भी मुस्कुराहट थी। उन्होंने रितेश को गले लगा लिया। बोले “मालिक की दया है, तू पास हो गया। मैं तो तेरे बारे में सोचकर बहुत परेशान रहता था। जा मिठाई ला। पाठ कर और मालिक को प्रसाद चढ़ा।“
रितेश बाजार गया। मनपसंद मिठाई लाया। बहुत निष्ठा से पूजा की और अगल बगल सभी पड़ोसियों को प्रसाद बांटा।
परीक्षाफल में विजया का नाम मेरिट लिस्ट में था। दद्दू और विजय थर्ड डिवीज़न में पास हो गए थे। सुशील प्रथम श्रेणी में पास हुआ था। सब दूर थे। कौन किसको बधाई देता। टेलीफोन सुविधा थी नहीं जो बात हो सकती। शाम को सुशील घर पर आया था।
“अमाँ रितेश तू घर पर कैसे? पास तो हो गया।“ आते ही सुशील ने पूछा।
“मुझे मालूम था तू हमदर्दी दिखाने आएगा।“
“क्या हुआ लटक गया?”
“अबे लटके तेरे दुश्मन। यहाँ तो दो विकेट मिलें हैं। वह भी अनेक वर्षों बाद। अभी तक तो विकेट के स्टंप ही उड़ा करते थे।“
“साला सही-सही नहीं बताता कि सेकण्ड डिवीज़न पास हो गया।“
“बड़ी देर में समझ आया।“ लेकिन इसका पूरा श्रेय विजया को है।
“सो तो है। उसने मुझे मैथ्स न पढ़ाई होती तो बेटा मैं हाईस्कूल पास नहीं कर सकता था और अब भी लग रहा है कि अगले जनम में विजया न हुई तो मैं मैथ्स में कैसे पास होऊँगा।“
“बकवास छोड़। यह बता एडमिशन कहाँ लेगा।“
“अमाँ यह भी कोई सवाल है।“ चाह कर भी कहीं और नहीं जा सकूंगा। यहीं पढ़ना होगा। डेढ़ साल बाद पिताजी रिटायर हो जाएंगे। हमें यहाँ से जाना भी होगा, तेरा इकलौता साथ भी छूटेगा।“
“दद्दू और विजय नहीं पढ़ेंगे?“
“मुश्किल लगता है। दद्दू को अपना व्यापार देखना है। विजय तो पहले ही निश्चय कर चुका था कि तकनीकी ट्रेनिंग लेकर वह भी अपना काम शुरू करेगा।“
“और विजया।“
“उसका तो सब कुछ अनिश्चित सा है। पता नहीं कहाँ रहेगी और कहाँ पढ़ेगी।“
“सात जुलाई तक एडमिशन लेना है।“
“तो चल, दो तारीख़ को चला जाए। फॉर्म ले आएं। देखें कौन पुराने यार दोस्त मिलते हैं।“
“तू सीधे कॉलेज आ जाना। मैं वहीँ मिलूंगा।“

दो जुलाई को रितेश माँ के पैर छूकर स्कूल गया। सुशील पहले से उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। अनेक पुराने छात्र-छात्राएँ मिले। सभी एडमिशन के लिए आये थे। लेकिन वह चंद लोग नहीं आए जिनकी रितेश को ज़रूरत थी। रितेश बातों में व्यस्त था तभी राठौर सर ने उसे देखा-
“रितेश”
“हड़बड़ा के रितेश उनके पास गया। पैर छूकर उसने बताया कि वह पास हो गया है और इसी स्कूल से इंटरमीडिएट करेगा।“
“बहुत अच्छा। तुमने मेरी नाक ऊँची कर दी।“
“सर इस बार भी मैं आपकी क्लास में रहूँगा।“
“बेटा अब मैं कोई क्लास नहीं लूँगा। मैं रिटायर हो गया हूँ। आज अपने व्यक्तिगत कार्य से आया हूँ।“
“सर।“ वह उन्हें एकटक देखता रहा। वह कुछ नहीं बोला। जैसे उसके शब्द खो गये।
“क्या हुआ रितेश?”
“सर मेरा क्या होगा। आपने मेरे जीवन को दिशा दी है।“
“बेटा गुरु का धर्म है दिशा देना। मैं नहीं अब कोई और तुम्हें दिशा देगा।“
“सर संभव नहीं” ,कहते कहते वह फ़फ़क कर रोने लगा।
“रितेश कमज़ोर मत बनो। तुम सचमुच मुझे सम्मान देते हो तो मन लगाकर पढ़ो। सबका नाम रोशन करो। मैं इलाहाबाद सेटल हो गया हूँ। जब कभी इलाहबाद आना, मिलना अवश्य।“
“जी सर।“
राठौर सर ने उसे अपना पता दिया और कहा, “जाओ नए दोस्तों के साथ ज़िन्दगी जीकर देखो।“ वह चले गए। रितेश उन्हें अपलक देखता रहा।

इसबार रितेश ने स्कूल में इंटरमीडिएट फर्स्ट ईयर के रेगुलर छात्र के रूप में प्रवेश लिया। प्रवेश के समय स्कूल के प्राचार्य ठाकुर राम सिंह ने उससे पूछा, “रितेश पढ़ने में मन लगेगा?”
“जी सर।“
“एक बात का ध्यान रखना। अनुशासित रहना। अनुशासनहीन छात्रों का मैं दुश्मन हूँ। पिछले वर्ष तक तुम स्कूल के नियमित छात्र नहीं थे। इसलिए तुम्हारी अनुशासनहीनता पर मैंने कोई लगाम नहीं लगाई। किन्तु अब तुम स्कूल के नियमित छात्र हो। स्कूल का अनुशासन मानना ही होगा।“
“सर आपको शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।“
“दैट्स गुड। जाओ फीस जमा करो। दस से कक्षाएं प्रारम्भ हो जाएंगी।“
“जी सर, थैंक यू।“
वह फीस जमा करने स्कूल के कार्यालय पहुँचा। फीस जमा करने वालों की एक लंबी कतार लगी थी। रितेश की नज़रें विजय, दद्दू और विजया को ढूंढ रही थी। यद्यपि उसे मालूम था कि इन तीनों में से कोई भी यहाँ पढ़ने नहीं आएगा। फिर भी न जाने क्यों वह छात्र-छात्राओं की लंबी कतार में उन्हें खोजता रहा।
एक घंटे बाद वह फीस जमा कर लौटा। मन बहुत उदास था। माँ ने उसकी उदासी को भांप लिया।
“रितेश क्या बात है? कोई पुराना दोस्त नहीं मिला?”
“नहीं।“
“अब फिर तेरा मन पढ़ाई से उचटेगा?”
“नहीं माँ, अब ऐसा नहीं होगा।“
“चल, देखते हैं।“ माँ ने बड़े अनमने भाव से कहा।
“माँ शाम को सुशील आएगा। उसके साथ किताबें लेने जाना है। चार दिन बाद पढ़ाई शुरू हो जाएगी। मैं सोचता हूँ कि इस बार शुरू से ही पढ़ता रहूँ।“
“तू ठीक सोचता है। जा शाम को किताबें ले आना।“

माँ रितेश में आए परिवर्तन से बहुत ख़ुश थी। वह आस पास पड़ोसियों से बात बात में अपनी प्रसन्नता को व्यक्त कर देती थी। एकदिन स्वयं रितेश ने भी सुना। माँ पड़ोस में रहने वाली मिसेज शर्मा से कह रही थी, “मुझे यकीन नहीं था कि रितेश कभी पढ़ सकेगा। एक अच्छा व्यक्ति बन सकेगा। इसकी शैतानियों पर नकेल लगाने के लिए क्या नहीं किया? रिश्तेदारों की बैठकें होती थी। घर के मुंह लगे नौकर उसे सुधारने की ट्रिक्स बताते थे। एक बार तो एक नौकर ने मेरे कहने पर इसको रस्सी से बाँधने का प्रयास किया तो इसने लाल मिर्च भरा डिब्बा उसकी आँखों में झोंक दिया। एक सप्ताह तक वह देखने योग्य नहीं रह गया था। वह दिन था कि हम लोगों ने इसे सुधारने के सभी मंसूबे छोड़ दिए थे। लेकिन आज जो इसमें परिवर्तन आया है वह ईश्वरीय कृपा ही है।“
माँ के इन शब्दों को उसने सुना और अपने कमरे में अकेले बैठा ठहाके लगाकर हँसता रहा।

इंटरमीडिएट के प्रथम वर्ष में रितेश की उश्रंखलता संजीदगी में बदल गयी थी। वह अध्ययन के प्रति गंभीर हो गया था। पूरी निष्ठा के साथ वह क्लास में जाता, पढ़ाई करता। उसके व्यवहार में आए इस अप्रत्याशित बदलाव से उसके पुराने मित्र और सगे संबंधी सभी सकते में थे। उसकी गिनती स्कूल के प्रतिभाशाली छात्रों में होने लगी थी। प्रत्येक अध्यापक उसके नाम को फक्र के साथ लेता और कहता वह उनका छात्र है। लेकिन उस एक वर्ष में न तो गोवर्धन प्रसाद ने उसकी कभी प्रशंसा की और न रितेश ने उन्हें प्रणाम किया। किसी ने उन दोनों के बीच उपजी खाई को पाटने का प्रयास भी नहीं किया। राठौर साहब होते तो शायद छात्र और अध्यापक के रिश्ते सुधर जाते।
एक वर्ष कैसे बीत गया, पता नहीं। माँ की सौम्य चितवन, राठौर सर से वायदा और विजया के चंद शब्दों ने रितेश के जीवन को एक नयी दिशा दी थी। पुराने सहपाठियों से नाता लगभग टूट गया था। एकदिन जब वह घर लौटा तो माँ ने बताया उसका एक पत्र आया है। रितेश बहुत ख़ुश हुआ था। पत्र किसी और का नहीं, दद्दू का था। सिलीगुड़ी से आया था। रितेश ने माँ से पत्र लिया और पढ़ने बैठ गया। लिखा था “गुरु कैसे हो? कॉलेज के क्या हाल हैं। तुम्हारी विजया टीचर कहाँ हैं? मिले कि नहीं? यार अब हम तो वहाँ आकर नहीं पढ़ सकते। पिताजी बीमार रहते हैं। उन्हें मेरी शादी की धुन सवार है। कहतें हैं, व्यापार देखो। क्या करोगे पढ़-लिख कर। अकेला बेटा होने का दण्ड भुगत रहा हूँ। एक भाई और होता तो व्यापार उसे थमाकर पढ़ने आ जाता। अब यह सब संभव नहीं है और ‘हमारी’ की खबर देते रहना। बस यूँ ही। बाकी तो हम दोनों बहुत दूर हो गए हैं। विजय से भेंट हो तो मेरा आदाब कह देना। उसने अपना पता भी नहीं दिया। कभी तन्हाई में उसे कुछ लिखकर मन हल्का कर लेता। अब जो भी हो तुम हो। तुम्हीं को लिखूंगा। तुम्हीं से कुछ सुना करूंगा। तुम क्या करोगे? नौकरी मत करना। बकवास है। व्यापार में आना हो तो बताना। दोनों मिलकर वुड का काम करेंगे। अच्छा धंधा है। बस और तो कुछ है नहीं। तुम जवाब जरूर देना।“
पत्र पढ़कर रितेश की आँखों के सामने से मानो एक युग गुज़र गया। वह यादों के बियावान में खो गया।
“दूध ठंडा हो रहा है।“ माँ ने आवाज़ दी।
“आया।“ कहते हुए वह रसोई घर में पहुँच गया।
“किसका पत्र था?” माँ ने पूछा।
“दद्दू का।“
“क्या लिखा है?”
“कुछ नहीं वह पढ़ने यहाँ नहीं आएगा।“
“क्यों?”
“उसके पिताजी चाहते हैं, वह व्यापार देखे और शादी करके घर बसाये। पढ़ कर क्या करेगा?”
“अच्छा”, माँ ने कहा।
रितेश दूध खत्म करके सीधे अपने कमरे में चला गया। कुछ देर बैठने के बाद उसने दद्दू को छोटा सा पत्र लिखा। “दद्दू भाई मैंने तो फर्स्ट ईयर में दाखिला ले लिया है। पढ़ाई का एक वर्ष खत्म भी हो रहा है। लेकिन तुम्हारे, विजय और विजया के बिना यहाँ मन नहीं लगता। फीस जमा करते समय हर पल मैं यही ढूंढ़ रहा था कि तीनों में से कोई एक तो मुझे दिख जाओ। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केवल मैं ही अकेला था। बाकी सभी मेरे लिए अंजान थे। आज भी वह उतने ही अंजान है जितने वह पहले दिन थे। मैं किसी से बातचीत नहीं करता। घर से कॉलेज और कॉलेज से घर। जितना भी समय मिलता है, पढ़ाई करता हूँ। सुशील अभी साथ है। वहीँ एक दोस्त है। शाम को उसी के साथ घूम लेता हूँ। लेकिन तुम जानते हो वह संत है। उसे पुजारी ही बनना है। उसकी दिलचस्पी दीन दुनिया में कम है।
और दोस्त कॉलेज के मैदान में लगे अब फूलों के पेड़ों में वैसे गंधयुक्त फूल नहीं खिलते हैं-जो हमारे समय में खिलते थे। पेड़ में पत्तियाँ हैं लेकिन उनमें बसंत नहीं, पतझड़ नज़र आता है। चिड़ियों की चहचाहट मन में तीर सी खटकती है। यहाँ अब जाड़ों की धूप और बरसात की हवा में वह लालित्य नहीं बचा जो तब था-जब हम चार साथ थे। यह पूरी कॉलोनी बेगानी सी लगती है। एक अपना छोटा सा घर, जिसमें पिताजी बीमार रहते हैं- वहीँ अच्छा लगता है। बस किसी तरह से पास होता जाऊँ, घर के काम आ सकूं, यही एक महत्वकांक्षा बची है। ऐसे ही कभी कभी लिखते रहना।“
पत्र पूरा कर वह पोस्ट ऑफिस गया और पत्र को पेटी के हवाले कर दिया। उसे उम्मीद थी की दद्दू जवाब देगा। कम से कम उसके साथ पत्र व्यवहार बना रहेगा। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। दद्दू का दोबारा कोई पत्र नहीं आया। रितेश ने भी पुराने दोस्तों से मोह छोड़ दिया।

वार्षिक परीक्षा में रितेश अपनी कक्षा में तीसरे नंबर पर था। उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। इधर जिसदिन उसका रिज़ल्ट निकला, उसी दिन शाम को उसका चयन मसूरी में लगने वाले एन.सी.सी. कैंप में हो गया था। कैंप में जाने से पूर्व उसे लगभग बीस दिन की ट्रेनिंग करनी थी। ट्रेनिंग ग्राउंड घर से दस किलोमीटर दूर था। बड़ी मुश्किल से पिताजी ने उसे साईकिल खरीदकर दी थी। एकदिन उसके पेट में तेज़ दर्द था। शाम को बारिश भी हो रही थी। उसका मन नहीं था कि वो ट्रेनिंग पर जाए। जब यह बात पिताजी को पता चली तो उन्होंने समझाया “रितेश पेटदर्द की दवा ले लो। बारिश से मत परेशान हो। व्यक्ति को अपनी ड्यूटी के प्रति सजग रहना चाहिए। फिर एन. सी.सी. ट्रेनिंग का लक्ष्य ही है कि वह तुमको दृढ़ निश्चयी और कठोर परिश्रमी बनाए। तुम जाओ।“
पिताजी के आदेश की अवज्ञा वह नही कर सका। वह दवा लेकर ट्रेनिंग के लिए गया। वर्षा के कारण कोई भी छात्र ग्राउंड पर नहीं पहुँचा था। हाँ इंस्ट्रक्टर जिन्हें गुरूजी कहा जाता था, अवश्य वहां मौजूद थे। उसदिन की हाजिरी में अकेला रितेश ही था।
अगले दिन गुरूजी ने परेड के समय रितेश की बहुत प्रंशसा की। उन्होंने कहा “रितेश ही केवल ऐसा कैडेट है जिसने सिद्ध कर दिया कि ज़िम्मेदारी क्या होती है? यद्यपि रितेश मार्च पास्ट में अव्वल नहीं है लेकिन उसकी निष्ठा ने मुझे इतना प्रभावित किया है कि मैंने मसूरी कैंप के लिए उसका चुनाव अंतिम रूप से कर लिया है।“
गुरूजी के इस प्रोत्साहन से रितेश बहुत खुश था। पिताजी और माँ भी उसकी प्रशंसा सुनकर हर्ष विभोर हो उठे।
पंद्रह दिन का मसूरी कैंप रितेश के लिए नितांत एक नया अनुभव था। टेंट हाउस में छः कैडेट्स के साथ रहना। ज़मीन पर बिस्तर लगाकर सोना। नाश्ता खाने के लिए अपनी थाली लेकर कतार में लगना। सैनिकों की भाँति जल्दी खाना ख़त्म करके परेड के लिए भागना। दोपहर के तीन घंटे तक श्रमदान करना। देर रात तक टेंट हाउस में हंसी मज़ाक करना। सभी कुछ उसके लिए नया था।
एक अनुशासित और परिश्रमी कैडेट के रूप में वह पूरे कैंप में लोकप्रिय हो गया था। एक रात लगभग बारह बजे तूफ़ान आया। हवा की तेज़ी में टेंट उखड़ गए। उड़कर दूर जा गिरे। मूसलाधार पानी में भीगे सभी काँप रहे थे। कहीं सिर छिपाने की जगह नहीं थी। कंपनी कमांडर्स ने कैडेट्स से कहा कि वह अपने सामान को उखड़े हुए तिरपाल से ढँक दें। तूफ़ान की समाप्ति पर सुबह पुनः टेंट खड़े करके परेड में शामिल हो जाएँ।
तेज़ हवाएं पूरे शबाब पर थीं। बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। कैडेट्स टेंट के तिरपाल के नीचे स्वयं को भीगने से बचाने की कोशिश में थे। रितेश ने अपने टेंट में रहने वालों के सहयोग से तेज़ बरसात और हवा की परवाह न करते हुए उखड़े टेंट को खड़ा करना शुरू कर दिया। सुबह तीन बजे एक टेंट लग गया और वह सभी टेंट के नीचे सो गए।
प्रातः जब दूसरे कैडेट अपने-अपने उखड़े टेंट को लगाने में जुटे तब रितेश और उसके साथी चैन की नींद सो रहे थे। कंपनी कमांडेंट कैडेट्स को टेंट लगाने का ढंग बता रहे थे। जब वह रितेश के टेंट के पास पहुँचे तो वह हतप्रद रह गए। उन्होंने बाहर से आवाज़ दी। किसी ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने टेंट के अंदर झाँका और तेज़ आवाज़ में रितेश को पुकारा।
रितेश हड़बड़ा कर उठ बैठा।
‘सर’
“अरे जब सब टेंट ठीक कर रहे हैं तो तुमलोग सो रहे हो? क्या तुम्हारा टेंट तूफ़ान में नहीं उखड़ा?”
“सर टेंट उखड़ गया था।“
“फिर यह दोबारा तन कैसे गया।“
“सर जब रात में आपने आदेश दिया था कि कैडेट्स टेंट के तिरपाल से स्वयं और सामान को ढँक कर बैठें। तूफ़ान ख़त्म होने के बाद सुबह तक टेंट लगा लें, तो हम लोगों ने अँधेरी रात में ही टॉर्च की रोशनी में, हवा की परवाह किये बगैर तीन बजे सुबह तक टेंट खड़ा कर दिया। उसके बाद हम सो गए सर।“
“अरे तुमलोगों ने तो कमाल कर दिया। तुमने अपने अंदर सच्चे सैनिक का स्वरुप साकार कर दिखाया है।“
रितेश की पीठ ठोंकते हुए वह आगे बढ़ गए। उनके जाने के बाद रितेश टेंट में दाखिल हुआ। किसी ने पूछा, ‘क्या था बे?”
“कंपनी कमांडर सर आए थे।“
“क्या कह रहे थे?”
“हम सबकी हिम्मत की प्रशंसा कर रहे थे।“
‘बस’
‘तो और क्या।‘
“अबे और क्या? कम से कम यह तो कहते कि बहादुरी के लिए विशेष पुरूस्कार दिया जाएगा।“
“अबे क्या बक बक कर रहा है। सोने दो। हम मज़े में सो रहे हैं, इससे बड़ा और क्या पुरूस्कार हो सकता है।“
“अमाँ भाई कर्म में विश्वास रखो। फल में नहीं। वह तो मिलेगा ही। रितेश ने कहा।“
“अच्छा शोर मत मचाओ। सोने दो। जब मिलेगा, तब मिलेगा, अभी से हवाई किले क्यों बना रहे हो।“
“लेकिन यार मुझे नींद नहीं आ रही है। तुमलोग आराम करो। मैं औरों की स्थिति देखने जा रहा हूँ।“ रितेश एक शॉल ओढ़कर बाहर का नज़ारा देखने चल दिया। वह जिस भी टेंट के पास पहुँचता उसमें रहने वाले कैडेट्स उसको घेर लेते। उसके प्रयासों की प्रंशसा करते। उखड़े टेंट को लगाने में उसकी मदद लेते।
सात बजे चुके थे। प्रातः परेड का समय आठ बजे तक था। अनेक कैडेट्स के टेंट अभी तक नहीं लग पाए थे। कंपनी कमांडर ने ऐसे अनेक कैडेट्स को सुबह की परेड से मुक्त कर दिया था जिनके टेंट पूरी तरह से नहीं लग पाए थे।
रात में गिनती परेड के समय कैंप कमांडर ने रितेश और उसके साथ टेंट में रहने वाले अन्य पांच कैडेट को बुलाया। उनके हौसलों की बढ़ चढ़कर तारीफ की। साथ ही ऐलान किया कि उन सभी को उनकी हिम्मत के लिए विशेष रूप से पुरुस्कृत किया जाएगा। कैंप में आए दो हज़ार से भी अधिक कैडेट्स ने जोरदार तालियों से रितेश और उसके साथियों का स्वागत किया। वह दो रातें रितेश पर अपनी अमिट छाप छोड़ गईं।
दो महीने की गर्मी की छुट्टी के बाद जब स्कूल खुला तो उस पर नई ज़िम्मेदारी आ गयी। उसे स्कूल में एन. सी.सी. की कंपनी का कमांडर बना दिया गया। वह कैडेट्स को परेड कराता। राईफल चलाना सिखाता। प्रत्येक महत्वपूर्ण अवसर पर वह विशेष परेड में भाग लेता। उसकी कक्षा के ही नहीं अपितु पूरे स्कूल के छात्र व छात्राएँ उसके दीवाने हो गए।

एकदिन कक्षा की सबसे स्मार्ट लड़की मीरा ने रितेश से कहा “तुम इस ड्रेस में बहुत जमते हो। तुम आर्मी या पुलिस में जाना।“
उसकी बात सुनकर रितेश अपनी हंसी को नहीं रोक पाया। “मैं पुलिस वुलिस में नहीं जाने वाला। यह तो बिल्ली के भाग्य से शिकारा टूट पड़ा है। मैं तो कंपनी कमांडर बनने योग्य भी नहीं हूँ।“
“ऐसा क्यों सोचते हो?”
“यह तो नहीं मालूम कि मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ। इतना अवश्य जानता हूँ कि मैं शारीरिक और मानसिक रूप से इस कॅरियर के योग्य नहीं हूँ। कॅरियर चुनाव के समय व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का आकलन अवश्य करना चाहिए। क्षमता के अनुसार कॅरियर का चुनाव ही सफलता की कुंजी है।“
“लेकिन मैं जानती हूँ कि व्यक्ति किसी भी कॅरियर में सफलता हासिल कर सकता है। आवश्यकता है लगन की। सच्ची लगन को काँटों की भी परवाह नहीं होती। मुझे यकीन है कि लगन के तुम धनी हो।“
“अच्छा।“
“हाँ मैंने पढ़ा है कि मानव जीवन में लगन का बड़ा महत्त्व है। जिसमें लगन है वह बूढ़ा भी जवान है। जिसमें लगन नहीं वह जवान भी मृतक समान है।“
“थैंक यू फॉर योर ब्रिलियंट अडवाइस। सोचूंगा।
“सोचना क्या? दोस्त की सलाह है। मानोगे तो फायदा होगा।“
“क्या बात है? बात भी सच है। मैं हाईस्कूल पास कर सका दोस्त के कारण। शायद कुछ बन सकूं तुम्हारे कारण।“
“थैंक यू।“
“चलो प्रार्थना शुरू होने जा रही है। मुझे सबको सावधान, विश्राम और प्रार्थना का कमांड देना है।“

ऐसे ही ज़िम्मेदारियों के बीच दिन गुज़र रहे थे। रितेश स्कूल का मॉनिटर बना दिया गया था। स्कूल में अनुशासन बनाये रखने, फ्री पीरियड में बच्चों को क्लास वर्क देने और सभा गोष्ठियों का आयोजन करने संबंधी अनेक ज़िम्मेदारियाँ उस पर डाल दी गई थी। इन सबके बाद अपनी पढ़ाई में भी अव्वल रहने की नैतिक जिम्मेदारी उसकी अपनी थी।
ढेर सारी ज़िम्मेदारियों को निभाते निभाते कब जुलाई से फिर मार्च आ गया पता ही नहीं चला। फाइनल परीक्षाओं का समय था। डिग्री कोर्स करने के लिए सभी को अलग-अलग कॉलेज में जाना होगा, दो वर्ष में बने मित्र फिर से जुदा हो जाएँगे। यह पीड़ा सभी के मन में थी।
जूनियर्स ने फेयरवेल पार्टी का आयोजन किया था। सभी छात्र-छात्राओं ने फेयरवेल पार्टी को एक यादगार पार्टी बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। गीत-संगीत, कविता और बढ़िया नाश्ता। इस अवसर पर रितेश ने अपने सभी जूनियर्स और अपने साथियों को संबोधित किया था।
“दोस्तों आज यह हमारे बिछड़ने का दिन है। आज के बाद हम एक दूसरे से बहुत दूर हो जाएंगे। कब किससे मिल पाएंगे, किसी को नहीं पता। हमारा यह बिछड़ना फिजिकल रूप से हो सकता है। वैचारिक रूप से तो हम सब एक दुसरे के समीप अपनी अंतिम साँसों तक रहेंगे। प्रत्येक अवसर पर हम एक दूसरे को अपने सामने हँसते, बोलते, रूठते, मनाते, और झगड़ते पाएंगे। यही सब यादें हमारे जीवन की संबल होंगी। खुशियां और दुखों में हमारी सहभागी होंगी। और यह स्कूल भवन, इसके एक एक कोने और वृक्षों में बसी हमारी शैतानियाँ और चुहुलबाजियाँ हमारे उदास मन को ख़ुशी से नहलाती रहेंगी। हम इनसे नहीं बिछड़ सकते। कितना भी चाहे, हम इन्हें नहीं भुला सकेंगे। फिर इन दो वर्षों में हम अपने जिन अध्यापकों और मित्रों से भावनात्मक रूप से जुड़ चुके हैं- क्या वह हमें इन बीते वर्षों से बिछड़ने देंगे? नहीं। हम बिछड़ कर भी बिछड़ेंगे नहीं, हम कहीं भी हो तुमको भूलेंगे नहीं- स्कूल की इमारत हो, अध्यापकों का परिश्रम हो या फिर सहपाठियों का स्नेह हो।“
रितेश के छोटे से वक्तव्य ने छात्र-छात्राओं को मोह लिया। पार्टी खत्म होने के बाद कितने ही छात्र-छात्राओं ने रितेश से उसके संबोधन की प्रशंसा की थी।

तीन दिन बाद परीक्षाएं शुरू हो गईं और बीस दिन में समाप्त भी हो गईं। उसके बाद फिर वही मायूसी का माहौल। रितेश और उसके साथ पढ़ने वाले छात्र चाहते थे कि वह सभी एक कॉलेज में दाखिला लें। लेकिन सभी की पारिवारिक स्थितियां समान नहीं थीं। अधिकाँश छात्र छात्राएँ दिल्ली और मुंबई जाकर डिग्री कोर्स करने की तैयारी कर रहे थे। कुछ प्राइवेट छात्र के रूप में बी.ए. करने की सोच रहे थे। एकदिन जब सुशील रितेश से मिलने आया तो रितेश ने पूछा “सुशील तू बी.ए. कहाँ से करेगा?”
“मैं तो वी एस एस डी ज्वाइन करूँगा। घर के पास है और तू?”
“यार कुछ पता नहीं। पिताजी रिटायर हो गए हैं। सरकारी घर छोड़ना है। किराये का घर ढूँढ रहे हैं। लेकिन घर की आर्थिक स्थिति डांवाडोल है। इसलिए पिताजी चाहते हैं कि रिश्ते की एक मौसी हैं, उनका अपना घर है, वह अकेली है। उन्हीं के साथ रह लिया जाए तो उनको भी सहारा हो जाएगा। हम प्रतिमाह किराए की मार से बच जाएंगे।
मगर यार तेरे पिताजी तो बड़े अधिकारी थे। अच्छी तनख्वाह रही होगी। अवकाश ग्रहण पर मोटी रकम भी मिली होगी? सुशील ने पूछा।
“हाँ अधिकारी तो बड़े थे। उनकी उदार प्रवृत्ति ने उन्हें आर्थिक रूप से खोखला कर दिया है। कोई भी उनसे आर्थिक मदद के लिए आया, वह खाली हाथ नहीं लौटा। पिछले एक वर्ष से मैंने देखा कि ऐसे भी अवसर आये जब दूसरों को आर्थिक मदद देने के लिए उन्होंने माँ के गहने भी बेच दिए। इसी बात को लेकर अक्सर दोनों में तनातनी भी होती थी। लेकिन जीत पिताजी की होती थी। माँ उनका अधिक विरोध नहीं कर पाती थी।“
“लेकिन रिटायरमेंट बेनिफिट्स भी तो मिले होंगे?”
“माँ कहती है कि पिताजी की नौकरी स्थायी नहीं थी। जब कभी उन्हें तीर्थस्थल जाने का मन होता था वह चले जाते थे। वह इस बात की प्रतीक्षा नहीं करते थे कि उनकी छुट्टी स्वीकार की जाएगी या नहीं। इस कारण उनकी नौकरी कभी स्थायी नहीं रही। रिटायरमेंट पर उन्हें कुछ भी आर्थिक लाभ नहीं मिल पाया। घर की जमा पूँजी उनकी लंबी बीमारी में व्यय होती रही। आज आर्थिक रूप से वह बहुत कमजोर हैं। मेरा, निधि और नीलेश का पढ़ाई का खर्च भी बढ़ रहा है।“
“यार तब तो किराये का मकान लेना कठिन हो जाएगा।“
“हाँ लेकिन माँ अपनी बहन के घर नहीं रहना चाहती है।“
“फिर?”
“फिर क्या? मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा है, देखो क्या होता है।“
“सब ठीक हो जाएगा रितेश। याद रख, जय उन्हीं की होती है जो अपने को संकट में डालकर कार्य करते हैं। कायरों की जय कभी नहीं होती।“
“यह तेरे उपदेश हैं?”
“नहीं। मैंने इस वाक्य को पंडित जवाहर लाल नेहरू के एक लेख में पढ़ा था। मुझे इससे बहुत शक्ति मिलती है। ऐसे ही मैंने कहीं पढ़ा था कि जीवन में लगन बड़े महत्त्व की चीज़ है। जिसमें लगन है वह बूढ़ा भी जवान है। जिसमें लगन नहीं वह जवान भी मृत के समान है। सच्ची लगन वालों को काँटों की परवाह नहीं होती। तू पढ़ाई से लगन लगा ले। देखना रास्ते निकलते चले जाएंगे। किसी भी कीमत पर पढ़ाई नहीं छोड़ना। पढ़ाई के साथ कुछ काम मिल सके तो उसको कर लेना।“
“आइडिया अच्छा है। यार मुझे क्या काम मिलेगा।“
“यह तो मैं नहीं बता सकता। तू पिताजी के स्थान पर नौकरी पा सकता है?”
“यार अभी विशेष क्वालिफिकेशन तो है नहीं। पिताजी कह रहे थे कि ‘सी’ ग्रेड कर्मचारी के रूप में भर्ती हो सकता है।“
“तो क्या हुआ?”
“पिताजी को मंजूर नहीं है। वह कहते हैं जिस फैक्ट्री से वो मेनेजर पद से रिटायर हुए हैं वहाँ उनका बेटा सी ग्रेड कर्मचारी बनकर काम करे। लेकिन घर खर्च चलाने के लिए कुछ करूँगा जरूर।“
“तू सही सोच रहा है। मुझे कुछ समझ में आता है तो बताऊँगा। हिम्मत रख। तू सफल होगा।“

उसी शाम सुशील के जाने के बाद रितेश फैक्ट्री एरिया में काम की तलाश के लिए निकला। अनुभव के अभाव में उसे कहीं कोई काम नहीं मिला। एक फैक्ट्री में ब्लोइंग विभाग में काम मिला। गर्म रबर शीट को ब्लो करके उसे स्पंजी बनाना होता था। शाम को चार घंटे का काम था। डेढ़ रुपए घंटे पगार थी। रितेश ने बिना कुछ सोचे समझे काम पकड़ लिया। दो माह में साढ़े तीन सौ रुपए मिले। वह ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था। जब यह पैसे उसने माँ को दिए तो उनकी आँखें नम हो गईं।
“बेटा यह पैसा कहाँ से लाया?”
“माँ मेहनत की थी।“
“कहाँ?”
“रितेश ने स्पष्ट बता दिया।“
माँ अपने आँसू नहीं रोक पायी, “इतने बड़े अधिकारी पिता का बेटा मज़दूरी करेगा? कुछ अच्छा काम मिले तो करना।“
“माँ काम तो चोरी का बुरा होता है। बाकी अच्छे बुरे काम में क्या अंतर है? मैंने बेईमान नहीं की, चोरी नहीं की, मेहनत की और पगार पायी। आगे और मेहनत करूंगा, बड़ी पगार मिलेगी। कम से कम घर तो चलेगा। उधार तो नहीं लेना पड़ेगा।“
“बेटा तू इतना समझदार हो जाएगा मैंने सोचा नहीं था।“
“माँ जो कुछ हूँ तेरे आत्मविश्वास का परिणाम हूँ। वर्ना तो मेरे प्रति सबका विश्वास डगमगा चुका था।“
“रितेश किराए के मकान की समस्या आ रही है और तुम्हारे पिताजी कहते हैं कि नौकरी के अभाव में कोई मकान किराए पर नहीं देगा। उनका कहना है कि किसी रिश्तेदार के साथ रह लिया जाए। दोनों को सहारा मिलेगा। लेकिन मैं वहाँ नहीं रहना चाहतीं हूँ। पर वह नहीं मान रहे हैं। इस बारे में वह मेरी नहीं सुनेंगे। मेरी बात को वह अपना अपमान समझेंगे। आग बबूला हो जाएंगे।“
“जैसा वह कहते हैं मान जाओ। बाकी तुम्हें पैसे की कमी नहीं होगी। तुम्हें किसी से उधार नहीं लेना पड़ेगा।“
“ठीक है। अगर तू भी यही सोचता है तो जून अंत तक हम लोगों को वहाँ शिफ्ट हो जाना है।“

आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न रिश्तेदारियों के बीच रहना कितना कष्टकर और अपमानजनक होता है रितेश को चंद महीनों में समझ आ गया था। सबसे अधिक अपमान और तनाव जो माँ को सहना पड़ा उसे देखकर उसका मन सभी नातेदारों से उखड़ गया। उसने मन ही मन सबसे नाता तोड़ लिया लेकिन जल में रहकर मगर से बैर भी नहीं किया जा सकता। यही सोचकर वह घुटता रहा। समझौता करता रहा।
धनाभाव के कारण छोटे भाई नीलेश और बहन निधि को नैनीताल के स्कूल से निकाल लिया गया था। उनका दाखिला घर से तीन किलोमीटर दूर एक स्कूल में करवा दिया गया था। वह बस या रिक्शा से नहीं पैदल ही स्कूल जाते थे। रितेश का एडमिशन बी.ए. प्रथम वर्ष हो गया था। पिताजी नौकरी की तलाश में आगरा गए थे। सोचा था अपने बड़े भाई के घर में रहकर नौकरी तलाशेंगे और संभव हुआ तो उन्हीं के साथ रह भी लेंगे। लेकिन मुफ़लिसी ने संबंधों को पनपने नहीं दिया। उनके एक पुराने व्यवसायी मित्र अनंतराम जी यदा कदा उनको आर्थिक मदद देते रहे। उनके बहुत समझाने पर भी वह आगरा से वापस नहीं आए।
कुछ समय में उनकी हालत बहुत ख़राब हो गयी। अनंतराम जी ने रितेश को संदेशा दिया कि वह पिताजी को आगरा से वापस ले आये। उन्हें लीवर कैंसर हो गया है। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है, वह अब अधिक दिनों के मेहमान नहीं हैं। किसी तरह से रितेश आगरा पहुँचा और पिताजी के मित्र अनंतराम जी की आर्थिक मदद से वह उन्हें कानपुर वापस ले आए।
घर की आर्थिक स्थिति दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी। आमदनी का कोई विशेष जरिया नहीं था। ट्यूशन ही एक सहारा था। उसमें भी मिलता ही क्या था? उस पर लीवर कैंसर से पीड़ित पिता का इलाज। अपनी और दो छोटे भाई बहनों की पढ़ाई, घर का खर्च सभी समस्याएँ सत्रह वर्षीय रितेश के समक्ष बड़ी चुनौतियाँ थीं।
सख़्त बीमार होने के बाद भी पिताजी रितेश से कहते “बेटा तू पढ़। मैं काम नहीं कर सकता। भीख मांग सकता हूँ। तेरे लिए भीख मांग लूँगा। तू छोटे-छोटे काम कर के अपनी पढ़ाई डिस्टर्ब मत कर। गया समय वापस नहीं आता है। तू अच्छे नम्बरों से पास नहीं हो सका तो तेरा सम्पूर्ण जीवन बर्बाद हो जाएगा।“
“नहीं पिता जी। ऐसा नहीं होगा। आप को ईश्वर पर विश्वास है। आपका विश्वास निष्फल सिद्ध नहीं होगा। भगवान् हमारी परीक्षा ले रहा है। आपके सद्कर्म हमें इस परीक्षा में सफल बनाएंगे। हम आपका नाम रोशन करेंगे। मैं जितनी कठिन मेहनत करूँगा, उतना लाभ मिलेगा। एक शेर है न पिताजी रात जितनी भी संगीन होगी, सुबह उतनी ही रंगीन होगी। आशीर्वाद दीजिये हमारे कल की सुबह रंगीन हो।“
“ठीक है।“, वह बुदबुदाए।
“पिताजी आप सो जाइए, मैं काम पर जाता हूँ।“
पिताजी ने कोई जवाब नहीं दिया। सोने वाली दवा का असर हो चुका था।
रात को जब रितेश लौटा तो खुश था।
“बेटा एक पंडितजी से पूछा था। कहते थे परिवार पर बुरे ग्रहों का प्रकोप पांच साल तक रहेगा।“
“माँ तुम ज्योतिष में कब से विश्वास करने लगी। तुमने तो आजतक कर्म करने की शिक्षा ही दी है। फल प्राप्ति की नहीं। तुम इनसब भविष्यवाणियों के चक्कर में मत पड़ो। ख़राब समय पांच साल का हो या पच्चीस साल का, हम अपनी मेहनत से उसे पराजित कर लेंगे।“
“ठीक है बेटा।“, माँ रसोई घर में चली गयी।
रितेश को जितनी भी पगार मिलती वह माँ के हाथ में रख देता। माँ एक कुशल एकाउटेंट की तरह कम पैसे में घर चलाती। कुछ बचत भी कर लेती। इस बचत से जुलाई में रितेश, नीलेश और निधि का दाखिला संभव हो सका। “रितेश तूने सबका दाखिला करा दिया। जो काम मुझे करना चाहिए वह तू छोटी सी उम्र में कर रहा है। मैं कितना नकारा रहा। मैं तुमलोगों के लिए कुछ नहीं कर सका।“ यह कहते कहते पिताजी फ़फ़क पड़े।
“पिताजी आप रोते क्यों हैं? आपके तीन हीरे हैं। यकीन रखिए जगमगाएंगे। आज नहीं, कल।“ वह कुछ नहीं बोले। दवा के प्रभाव में सो गए। फिर वह अगले दिन सुबह नहीं उठे। पड़ोस में रहने वाले डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनकी मृत्यु पर रोने वाले चार थे- माँ, रितेश, नीलेश और निधि। रोना तो दूर कोई सगा देखने तक नहीं आया। रिश्ते के एक भाई थे। बड़े अफसर। दो क्षण आये अफ़सोस किया, चले गए।
घर में कफ़न के लिए भी पैसा नहीं था। रितेश अभी इस उलझन में था कि पिताजी का दाह संस्कार कैसे कर सकेगा। उसे कुछ नहीं सूझा। वह ईश्वर की प्रतिमा के नीचे ख़ामोश खड़ा हो गया। किसी के आने की आहट पाकर वह दरवाज़े तक गया। कोई और नहीं, पिताजी के पुराने मित्र खन्ना साहब थे। लोग उन्हें डिप्टी साहब के नाम से जानते थे।
“बेटा दुखी मत हो। आदमी चला जाता है, ईश्वर नहीं। वह हमेशा सबके साथ है और रहेगा। तुम निश्चिंत रहो। वह तुम्हारे पिता थे, हम सबके भाई थे। पूरी व्यवस्था के साथ तुम्हारे पिताजी के मित्र आ रहे हैं। दाह संस्कार हमलोग करेंगे।“
“चाचा जी।“, रितेश के आँसू ढरक गये थे।
कुछ ही देर में अनेक पुराने मित्र इकट्ठा हो गए और मिस्टर आनंद का दाह संस्कार धर्मानुसार कर दिया गया।

उसके बाद कितना समय बीत गया किसी भी नज़दीकी सगे संबंधी ने उनकी कोई ख़बर नहीं ली। घर से कुछ दूर एक प्रोफेसर रहती थी, डॉ. कान्ति। वो अविवाहित थी। रितेश को पिछले कुछ महीनों से जानने लगी थीं। वह उम्र में बहुत बड़ी थीं। वह उन्हें दीदी कहता था। जब उन्हें रितेश के पिताजी की मृत्यु की जानकारी हुई तो वह पहली महिला थीं जो घर पर आईं। माँ को ढाँढ़स बंधाया। यहाँ तक कहा कि जब कोई आवश्यकता हो तो बेहिचक उन्हें बताए। वह दीदी की हैसियत से अपना फ़र्ज़ पूरा करेंगी और अपने जीवन के अंत समय तक वह अपना वचन निभाती रहीं। रितेश के लिए वह दीदी नहीं साक्षात देवी थीं। लेकिन आज रितेश को एक ही दुःख है कि वह उनके उपकार को चुका नहीं पाया। कारण जब वह इस योग्य हुआ कि उनके लिए कुछ करता तो वह दस वर्ष तक कोमा में चली गयी। बस उनकी साँसें चलती रहीं। कैसे यह किसी को नही मालूम। दुनिया में किसी भी वस्तु की उन्हें आवश्यकता नहीं रह गयी। वह चाह कर भी कान्ति दीदी की सेवा करने नहीं जा पाता था। इसका दुःख उसे सताता रहा। सेवा न कर पाने का मूल कारण था उसकी व्यस्तता।
वह बहुत व्यस्त हो चुका था। सुबह से देर रात तक उसका समय अपनी पढ़ाई करने और घर का खर्च जुटाने में चला जाता था। उसके लिए सबसे बड़ा संतोष था कि निधि और नीलेश की पढ़ाई अच्छी चल रही थी। दोनों ही पढ़ाई में अव्वल थे। उसकी अपनी पढ़ाई भी सामान्य रूप से चल रही थी।
कॉलेज खुलने के दो महीने बाद अंग्रेजी साहित्य का क्लास टेस्ट हुआ। उसे क्लास टेस्ट में अंग्रेजी में तीनों सेक्शन में सबसे अधिक अंक मिले थे। नंबर देखकर अंग्रेजी के प्रोफेसर डॉ. गुप्त ने रितेश से कहा “पीरियड ख़त्म होने के बाद डिपार्टमेन्ट में आना।
डिपार्टमेन्ट में पहुँचते ही डॉ. गुप्ता ने एक कागज पर अपने घर का पता लिख कर उसे दिया और कहा “शाम को घर आना। कुछ बात करनी है।“ रितेश कुछ समझ नहीं सका। वह निश्चित समय पर प्रोफेसर के घर पहुँच गया।
“आओ बैठो बेटा। यह मेरी बेटी सरला है, इस वर्ष इण्टर फाइनल में है। तुम्हें इसकी अंग्रेजी ठीक करनी है। इसे पढ़ाना शुरू कर दो। समय तुम दोनों तय कर लो।“
“जी सर।“
“मास्टर जी आइए। बगल वाला कमरा मेरा है”, सरला ने कहा।
रितेश उसके साथ चला गया। छोटा सा कमरा, उसमें एक छोटी मेज़ और दो कुर्सियां पड़ी थीं। इससे पहले कि रितेश बैठता, सरला ने कुर्सी खींची और बैठ गई। अगले पल अपनी गलती का एहसास कर के वह उठ खड़ी हुई “सॉरी मास्टर साहब। प्लीज बैठिये।“
“ओ के।“ रितेश दूसरी कुर्सी पर बैठ गया। सरला खड़ी रही। “आप भी बैठें।“ रितेश ने कहा।
“जब तक आप नहीं कहते, मैं कैसे बैठती। अभद्रता होती ना ।“
“ठीक है।“
“एक बात कहूँ।“
“कहो।“
“मुझे आपको मास्टर साहब कहना अच्छा नहीं लगता। मैं और आप बराबर के हैं।“
“तो क्या कहोगी?”
“पापा के सामने मास्टर साहब। वैसे कुछ भी नहीं। आप भी नहीं बोलूंगी। तुम बोलूंगी।“
रितेश कुछ नहीं बोला।
“ठीक है मैं समझ गई। तुम कहना अच्छा नहीं लगेगा। मैं आप कहूँगी। लेकिन सबके समक्ष आप अध्यापक और मैं आपकी शिष्या हूँ। वैसे पढ़ते समय मित्र। ठीक ? और किताबी ज्ञान अधिक मत दीजियेगा। बचपन से किताबी ज्ञान से लदी हुई हूँ।
“तो क्या पढ़ाना क्या होगा?”
“वह तो मुझे सब आता है। मुझे बतियाना है।“
“परीक्षा में नंबर कम आये तो?”
“मेरी गारंटी है नंबर कम नहीं होंगे। मुझे सब कंठस्थ है। पर पापा को विश्वास नहीं होता। वह सोचते हैं बिना मास्टर के मैं पास नहीं हो सकूंगी। आज क्या बतियाएंगे?”
“अंग्रेजी ग्रामर पढ़ाऊँगा।“
“अरे नहीं। यह बताइए जब आपको क्लास टेस्ट में तीनों सेक्शन में सबसे अधिक नंबर मिले तो आपको कैसा लगा?”
“अच्छा लगा। आत्म विश्वास जगा।“
“बस?”
“और क्या।“
“ऐसा नहीं लगा कि कोई लड़की आपको मुबारक़बाद दे?
“नहीं।“
“छि। यह भी कोई बात हुई?”
“अच्छा बताओ मैं पढ़ाने कब आऊँ? कॉलेज से घर तीन बजे तक आता हूँ। उसके बाद आ सकता हूँ।“
“पांच बजे आईये। पापा तब तक ट्यूशन पढ़ाने चले जाते हैं।“
“उससे क्या?”
“बहुत कुछ। वह पढ़ाई के बीच में टोका टाकी नहीं करेंगे। जब तक वह आयेंगे आप चले जाओगे। ठीक?”
“ठीक।“
इसके बाद रितेश नियम से सरला को पढ़ाने जाता रहा।

दिन में वह फ्री पीरियड में कॉलेज के सामने वाले बड़े डाक घर पर खड़ा हो जाता। गरीब व अनपढ़ व्यक्तियों के पत्र लिख दिया करता। एक पत्र लिखाई के दस से पंद्रह पैसे तक उसे मिल जाते। घंटे भर में उसके पास दो रुपये तक हो जाते। अनेक बार वह असहाय व्यक्तियों के पत्र मुफ्त में लिख दिया करता था। उसकी सहृदयता ने उसे लोकप्रिय कर दिया था। वहाँ बैठे व्यावसायिक पत्र लेखक उसे दुश्मनी मानने लगे। उन्होंने उसे धमकाया कि वह पत्र लेखन का काम बंद कर दे अन्यथा बुरा होगा। रितेश मान गया। उसके विद्रोही मन ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया। अब वह पहले वाला रितेश नहीं था जो ईंट का जवाब पत्थर से देता। उसने डाक घर पर खड़े होकर पत्र लिखना बंद कर दिया।
जब रितेश के साथियों को इस धमकी का पता चला तो वह आग बबूला हो गए। दूसरे ही दिन वह लाठियों से लैस होकर डाक घर पहुंचे और व्यावसायिक लेखकों को चेतावनी दी कि यदि रितेश को किसी ने पत्र लिखने से रोका तो उसका हश्र ठीक नहीं होगा। उस दिन के बाद से किसी ने वहाँ रितेश का विरोध नहीं किया। शाम को ट्यूशन पढ़ाने के बाद वह फैक्ट्री में ड्यूटी करने जाता। जो कुछ भी थोड़ा बहुत मिलता उससे माँ बड़े हिसाब से घर का खर्च चलाती। उन्होंने रितेश को कभी इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि खर्च के लिए और पैसों की ज़रूरत है।
ट्यूशन पढ़ाते एक महीना हो गया था। प्रोफेसर साहब ने पैसे का कोई ज़िक्र नहीं किया। रितेश से भी कुछ कहा नहीं गया। इधर वह अपनी कक्षा में अंग्रेजी साहित्य के छात्रों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गया। वह सब उसकी अंग्रेजी भाषा का लोहा मानते थे। वह फ्री पीरियड में कॉलेज की लाइब्रेरी में अंग्रेजी साहित्य की पुस्तकों को खंगाला करता। धीरे-धीरे छात्र- छात्राओं बड़ा वर्ग उसके साथ लाइब्रेरी जाने लगा। वह पढ़ता, नोट्स बनाता। दूसरे छात्र-छात्राओं को भी समझाता और उन्हें भी अपने नोट्स बांटता। यह क्रम प्रतिदिन चलता। वह कॉलेज में मिनी प्रोफेसर के नाम से मशहूर हो गया। उसके साथी उसे रितेश न बुलाकर ‘प्रोफ़ेसर’ के नाम से ही संबोधित करते थे।
रितेश अपने बहुआयामी जीवन पर मन में खिलखिला कर हँसता था- फैक्ट्री का मज़दूर, पत्र लेखक, घरेलू मास्टर, मिनी प्रोफेसर और न जाने कितने और स्वांग उसे जीवन की गाड़ी को खींचने के लिए करने थे। लेकिन हारना और चुनौतियों से घबराना उसे क़ुबूल नहीं था। उसे याद था तीन साल पहले उसने दीवान सिंह से चुनौती भरे स्वर में कहा था कि वह जीवन में कभी थमेगा नहीं। जीवन जैसा भी चुनौतीपूर्ण हो वह तिनके सा तिरता रहेगा, बढ़ता रहेगा। कभी तो किनारा मिलेगा। ठहराव आएगा। वह आज भी अपने इसी विश्वास पर कायम था, मस्त था।

अगले सप्ताह कॉलेज से एन. सी.सी कैंप जाना था। घर में राशन पानी नहीं था। चाय और सूखी रोटी
के लिए भी पैसा नहीं बचा था। उस पर फैक्ट्री की पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर कैंप में जाना रितेश के लिए एक समस्या थी। तब माँ ने कहा “रितेश तू जा, मैं पड़ोस में मिसेज मित्रा से पचास रुपए उधार ले लूंगी। बाद में जब मुझे पैसा मिलेगा मैं उन्हें दे दूँगी। तुम कैंप मत छोड़ो।“
रितेश कैंप के लिए रवाना हो गया। वह कॉलेज ग्राउंड में बस की प्रतीक्षा कर रहा था, तभी उसने देखा प्रोफेसर गुप्ता हाँफते हुए उसके पास आये और कहा “अरे रितेश मैंने तुम्हें फीस नही दी। तुम्हे कैंप में खर्च की ज़रूरत होगी। यह लो सौ रुपए।“
रितेश की आँख भर आयी थी। उसे पिताजी की कही बात याद आई कि “सच्चे मन और निश्छल भाव से की गयी प्रार्थना बेकार नहीं जाती। ईश्वर ऐसी प्रार्थना को जरूर सुनते हैं।“ वह दौड़कर पोस्ट ऑफिस गया और घर के लिए मनी आर्डर कर दिया। माँ को अपने दोस्त के घर से संदेशा भी भिजवा दिया कि उसने मनी आर्डर कर दिया है।
मनी आर्डर करने के बाद रितेश निश्चिन्त हो सका था। घर में उसके भाई बहन और माँ को भूखा नहीं रहना पड़ेगा।
किन्तु यह कैंप उतना रोमांचक नहीं था, जितना कि दो साल पहले वाला कैंप। सबसे बड़ा अंतर यह था कि दो साल पहले जब वह इंटरमीडिएट में था तो कैंप पहाड़ी स्थल मसूरी में लगा था और यह कैंप शहर से लगभग बीस किलोमीटर दूर एक खुले मैदान में लगा था। फिर इसबार रितेश के ऊपर जिम्मेदारियां थीं तब ज़िम्मेदारियों का भार पिताजी पर था।
इसबार वह ज़िम्मेदारियों के कारण कैंप में नहीं जाना चाहता था। यदि विश्वविद्यालयों के नियमों के अनुसार कैंप अटेंड करना ज़रूरी नहीं होता तो वह हरगिज़ कैंप में नहीं जाता। यह पंद्रह दिन उसके लिए बहुत बोझिल थे। एक सुबह शुरू होती थी कि वह शाम का बेताबी से इंतज़ार करने लगता था। कैसे एक एक दिन काटा जाए वह समझ नहीं पा रहा था।
उसके दो ख़ास दोस्त शंकर और मुख़्तार भी बड़े अनमने से परेड में भाग लेते थे। कितनी ही बार तीनों बिमारी का बहाना बनाकर परेड से छुटकारा पाते। एकदिन तीनों ने कैंप इंस्ट्रक्टर से शिकायत की।
“गुरु जी हमें तेज़ जुकाम, बदन दर्द और खाँसी है। परेड नहीं कर पाएँगे।“
“अच्छा। यह तो बुरी और बड़ी बीमारी है।“
“जी।“
“लेकिन सैनिकों के पास इसका बड़ा सरल इलाज़ है। अभी ठीक हो जाओगे।“
“जी।“
“ऐसा करो तुम तीनों इस मैदान के दो चक्कर लगाकर आओ, यह बीमारियाँ पलक झपकते दूर हो जाएंगी।“
“गुरु जी।“
“अरे गुरु जी, गुरु जी क्या करते हो। जाओ जल्दी दौड़ लगाकर आओ। उसके बाद तुमलोग परेड में भाग मत लेना। परेड के समय में हल्का-फुल्का श्रमदान करना। बिलकुल चुस्त हो जाओगे। चलो दौड़ों।“
मरता क्या न करता। सब परेड कर रहे थे यह तीनों लंबे चौड़े मैदान का चक्कर लगाकर मैदान को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली पगडंडी को समतल कर रहे थे।
पूरे दिन श्रमदान करने के बाद तीनों ने फैसला लिया कि अब परेड से मुँह नहीं चुराएंगे।
क्रमशः ….

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