फेल न होना … भाग – 7

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विजय खुश था। उसका मिशन पूरा हुआ था। सबसे बड़ी खुशी यह थी कि उसे रितेश का गुप्त ठिकाना पता चल गया था। वह भी कभी क्लास गोल करके वहाँ बैठ कर पढ़ सकता था। किंतु उसे राठौर सर के समझाने पर पूरा विश्वास था। वह जानता था, राठौर सर की बात रितेश कभी नहीं टालेगा।
राठौर सर से मिलने जब रितेश स्कूल आया तो उसका सामना गोवर्धन प्रसाद से हो गया। दोनों ने एक दूसरे को देखा। न रितेश ने नमस्ते की और न गोवर्धन प्रसाद ने ही उससे कुछ पूछा।
रितेश सीधे राठौर सर के कमरे में चला गया।
“आओ रितेश बैठो।“ सामने पड़ी कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए राठौर सर ने पूछा, “कहाँ थे बेटा?”
“सर।“ इसके आगे वह कुछ नहीं बोल पाया।
“देखो विजय मुझे सब कुछ बता चुका है। इतनी छोटी छोटी बातों को न तो गाँठ में बांधते हैं और न उससे विचलित हुआ जाता है।“
“सर।“
“अगर ऐसे ही गाँठ बांधना होता तो मुझे तो तुमसे बहुत सख़्त नाराज़ हो जाना चाहिए था?”
“पर क्यों सर?”
“तुम मेरा सुझाव आज तक अमल में नहीं ला पाए हो। तुमने सामूहिक पढ़ाई का वायदा किया था, क्या हुआ? मैंने तो तुमसे कोई शिकायत नहीं की।
“बोलो?”
“जी सर।“
“वह भी तुम्हारे अध्यापक हैं। बुज़ुर्ग हैं। अस्वस्थ रहते हैं। उनकी बात का इतना बुरा मानना ठीक नहीं है। जाओ कल से स्कूल आओ और ठीक से पढ़ाई करो।“
“सर मैं बिना स्कूल आये पढ़ लूँगा।“
“मैंने जो प्रस्ताव रखा था उसे भी पूरा करो। पढ़ाई भी करो। तभी नेक इंसान बन पाओगे। जाओ।“
रितेश ने प्रतिवाद करना उचित नहीं समझा। वह स्टाफ रूम से बाहर आ गया। सामने विजय खड़ा था। “क्या हुआ बे?”
“सर कह रहे थे क्लास में आया करो।“
“क्या सोचा?”
“समझ नहीं आ रहा है। मुझे क्लास अटेंड करने में कोई परहेज नहीं है। लेकिन मैं खूसट की क्लास में नहीं जाऊँगा।“
“न जाना।“
“फिर क्या करूँगा। स्कूल में न तो पुस्तकालय है, न वाचनालय। मैं पैंतालीस मिनट कैसे काटूँगा?”
“हाँ यह तो समस्या है। अगर तू उनकी क्लास में बैठ भी जायेगा तो तुझे क्या परेशानी होगी। वह अकेले तुझे तो पढ़ाएंगे नहीं। तू चुप बैठे रहना। लेक्चर भी न सुनना। सबसे अच्छा तो यह होगा कि तू उनके पीरियड में हेड डाउन करके सोते रहना।“
“अगर खूसट ने पूछ लिया कि ऐसे क्यों बैठा हूँ?”
“तब कह देंगे तेरी तबियत ठीक नहीं है।“
“अबे साले तबियत उन्हीं के पीरियड में पूरे साल खराब रहेगी?”
“दूर की मत सोच।“
“ठीक है अब आज तो मैं क्लास नहीं अटेंड करूँगा। कल से देखूँगा।“
अगले दिन रितेश सभी पीरियड में हाज़िर रहा। गोवर्धन प्रसाद के पीरियड में वह कुछ देर बैठा। बीच में पानी पीने की छुट्टी लेकर जो गया तो फिर कक्षा में नहीं आया। गोवर्धन प्रसाद ने भी उसके सम्बन्ध में किसी से कुछ नहीं पूछा। रितेश प्रतिदिन गोवर्धन प्रसाद के पीरियड से भागता रहा।

स्कूल में छमाही परीक्षा शुरू हो गयी थी। रितेश स्कूल का नियमित छात्र नहीं था इसलिए परीक्षा देना उसके लिए अनिवार्य नहीं था। किंतु माँ और राठौर सर के कहने पर वह परीक्षा देने को राजी हो गया। उसे मालूम था कि क्लास के दूसरे बच्चों की भाँति इसे रिजल्ट कार्ड नहीं दिया जाएगा। केवल उसे प्रत्येक विषय में मिले नम्बरों को बता दिया जाएगा। यह सोचकर उसे कुछ ग्लानि का अनुभव हुआ। वह सोच में पड़ गया। घर जाकर उसने बताया कि वह छमाही परीक्षा नहीं देना चाहता है। उसका निर्णय घर में जैसे भूचाल ले आया हो। पिताजी ने आव देखा न ताव अपनी छड़ी उठाकर बोले, “कम्बख़्त तूने स्कूल जाने का निर्णय ही क्यों लिया? हो गयी तेरी पढ़ाई। खबरदार जो कल से स्कूल गया। घर में बैठ और झल्ली ढोने की तैयारी कर।“
“क्या कह रहे हैं आप? माँ ने टोका। “उसका मन टूट जाएगा। यह तो पूछा होता कि वह परीक्षा में क्यों नहीं बैठना चाहता?”
“अरे इसमें पूछने की क्या बात है। कम्बख़्त ने पढ़ाई ही नहीं की होगी। यहाँ भी आवराओं से दोस्ती होगी। यह कुछ नहीं करेगा। निकाल दो साले को घर से।“
“अच्छा आप शांत रहे। आप समझिये आपके लिए यह घर छोड़ गया है। जिस पल मुझे लगेगा कि यह अब नहीं पढ़ेगा मैं उससे मजदूरी करने को कह दूँगी। लेकिन अभी कुछ धैर्य रखिये।“, माँ ने कहा।
“क्या धैर्य रखूँ? कबतक धैर्य रखूँ? अट्ठारह साल हो गए। नालायक नहीं सुधरा, अब क्या सुधरेगा? नाक कटा रहा है। कहीं का नहीं छोड़ा। देखो दूसरों के बच्चे कितने अच्छे नम्बरों से पास होते हैं? एक यह है लूमट कि तरह से सुबह से उठकर शाम तक छैला बना घूमता है।“, कहते-कहते पिताजी अपने कमरे में चले गए।
“बेटा क्या बात है? परीक्षा क्यों नहीं देना चाहता है?”
“माँ मैं परीक्षा देना चाहता हूँ। लेकिन जानती हो मुझे रिजल्ट कार्ड नहीं दिया जाएगा। सिर्फ नंबर बता दिए जायेंगे। मैं यदि घर में वो नंबर बताऊँगा तो कोई विश्वास नहीं करेगा। मैं कैसे विश्वास दिलाऊँगा कि मैंने पेपर अच्छा किया है? मैं पास हुआ हूँ? मुझे अच्छे मार्क्स मिले हैं? इसलिए सोचता हूँ परीक्षा में न बैठूं। मन लगाकर पढूं और फाइनल परीक्षा में पास होकर दिखाऊँ।“
“बेटा मुझे पता है कि जो भी नंबर तू बताएगा सच बताएगा। मुझसे झूठ नहीं बोलेगा। वैसे यदि तू अपने सभी टीचर से कह दे कि वह एक दिन के लिए तेरी आंसर बुक तुझे दे दे, तो मैं देख सकूंगी कि तूने कहाँ गलती की है, तेरे नंबर क्यों कम आते हैं। मुझे विश्वास है कि कोई भी टीचर तुझे मना नहीं करेगा।“
“माँ अगर किसी ने मना किया तो?”
“तू कह कर देख फिर बताना। अभी से इतनी आगे की क्या सोचता है।“
“ठीक है माँ। तुम कहती हो तो मैं परीक्षा में बैठूंगा और पास भी होऊँगा।“
“जा बेटा दूध पी ले। पढ़ाई कर।“

रितेश दो दिन स्कूल नहीं गया। पढ़ाई में व्यस्त रहा। परीक्षा शुरू होने के एक दिन पहले स्कूल गया। क्लास में अपनी सीट पर खामोश जाकर बैठ गया। धीरे-धीरे अन्य छात्र-छात्राएं भी आने लगे। उसे अकेला बैठा देख विजय क्लास में प्रवेश करते ही चिल्लाया “अबे देवदास आ गया।“
“विजय।“, रितेश लगभग चीख उठा।
“क्या है बे? रो क्यों रहा है? कल्लू माई ने दिया दिखा दिया क्या? या “उसी ने लतिया दिया?”
“नॉनसेंस”, रितेश चीखा।
“तो तू बता क्या है कॉमनसेंस? कहाँ था तू?”
“मैं पढ़ रहा था।“
“विजया को पढ़ाने के लिए?”
“अबे नहीं। ख़ुद पास होने के लिए।“
“ले, अबे तुझे क्या पास-फेल से। तू तो सबसे ऊपर है। खटिया तो हम लोगों की खड़ी होगी।“
“ऐसा नहीं है।“
“समझ गया साले पास होकर विजया पर अपने ज्ञान का रुतबा गाजिब करना चाहता है। वरना अब तक क्यों सोया रहा? क्यों नहीं पढ़ा?”
“सुन तू कुछ भी कह ले। मुझे पढ़ना है, पास होना है। समझा? बे सिर पैर की बकवास कम किया कर। साला पागल।“
“अबे करले मैं क्या तेरे लिए तो अब सब पागल होंगे क्योंकि तू प्यार में पागल है।“, रितेश कुछ नहीं बोला। गोवर्धन प्रसाद के पीरियड को छोड़कर वह सभी पीरियड में हाजिर रहा।

धीरे-धीरे कैसे समय सुनहरे पंखों पर सवार होकर उड़ गया पता भी नहीं चला। छमाही परीक्षाएं समाप्त हो गईं। अब नंबर बताए जाने का समय आ गया। रितेश ने सभी अध्यापकों से कहा था कि वे एक दिन के लिए उत्तर पुस्तिकाएं उसे घर ले जाने के लिए दे दें ताकि वह माता-पिता को नंबर दिखा सके। लगभग सभी अध्यापकों ने उसकी बात मान ली। उसके जीवन में यह पहला अवसर था कि वह प्रत्येक विषय में पास था और उसे पचपन प्रतिशत से अधिक अंक मिले थे। गणित में तमाम प्रयासों के बाद भी उसे तैंतीस नंबर ही मिले थे।
गोवर्धन प्रसाद के विषय में भी अव्वल नंबर थे। लेकिन वह अड़ गए थे कि वह उत्तर पुस्तिका घर ले जाने नहीं देंगे। रितेश ने उनसे बहुत अनुरोध किया। वह अपने निश्चय पर अड़े रहे।
“सर आप कुछ भी कहो, माँ ने उत्तर पुस्तिका देखने को मांगी है। मैं लेकर जाऊँगा। आप जो चाहो कर लेना।“ यह कहते-कहते वह उत्तर पुस्तिका लेकर कक्षा से बाहर चला गया।
गोवर्धन सर उसे रोकने के लिए आगे बढ़े थे। उसने उनका हाथ झटक दिया, और क्लास के बाहर हो गया। जाते जाते उसने यह जरूर सुना।
“बेशर्म, बदतमीज़”, गोवर्धन प्रसाद ने कहा।
“इम्पर्टीनेन्ट”, विजया ने कहा।
“हाय राम”, शालिनी ने कहा।

अगले दिन वह उत्तर पुस्तिका लेकर स्टाफ रूम में गोवर्धन प्रसाद को लौटाने गया। वह आग बबूला हो उठे। उन्होंने ढेर सारे अपशब्द के साथ उसके मुंह पर चार चांटे मार दिए। वह कुछ नहीं बोला। सामने बैठे राठौर सर ने रितेश का पक्ष लिया।
“अरे पंडित जी यह तो बहुत तमीज़दार लड़का है।“
“सर तमीज़दार है। ऐसे नालायक दो चार और क्लास में आ जाएँ तो स्कूल का भट्टा बैठ जाएगा।“ उनका पूरा शरीर गुस्से से कांप रहा था। आँखों में खून छलक रहा था। बुढ़ापा उनकी कमजोरी थी अन्यथा उसकी अच्छी पिटाई कर देते।
उसदिन रितेश स्कूल से लौट गया। नहर किनारे बैठा रहा। माउथ ऑर्गन बजाता रहा। कब सो गया उसे पता नहीं। शाम को जब छः बजे घर पहुँचा, पिताजी घर आ चुके थे। उन्होंने उससे कुछ नहीं पूछा। माँ ने रसोई में काम करते हुए जरूर पूछा “रितेश बहुत देर कर दी?”
“माँ बाद में बताऊँगा। अभी घूमने जा रहा हूँ।“, कहकर रितेश घर से चला गया।
रात में जब लौटा तब उसने विस्तार से माँ को घटना बताई। माँ ने मात्र इतना कहा, “अब तूने जो कर दिया ठीक है बेटा। लेकिन गुरुजनों की बात सदा माननी चाहिए। तू मुझे नंबर बता देता तो मैं सब मान लेती। मैं तुझ पर अविश्वास नहीं करती। जा कल उनसे माफ़ी मांग लेना।“
“माँ मैं माफ़ी नहीं मागूंगा। यह मत पूछना क्यों।“
माँ ने कुछ नहीं कहा।
अगले दिन वह क्लास देर से पहुंचा। राठौर सर अटेंडेंस रजिस्टर हाथ में लिए आ रहे थे। जैसे ही रितेश ने क्लास में पैर रखा, विजय चिल्ला उठा, “हाय राम, बेशर्म, इम्पर्टीनेन्ट आ गया तू।“
“क्यों न आता बे?” रितेश ने भी ऊँचे स्वर में जवाब दिया।
तब तक राठौर सर भी आ गए थे।
“क्या हुआ रितेश किस पर बरस रहे हो?”
“सर विजय कह रहा था हाय राम, इम्पर्टीनेन्ट; आ गया तू। उसी को जवाब दे रहा था।“
“यह शब्द किसने कहे थे।“
“सर एक वाक्य गोवर्धन सर का था, दूसरा वाक्य शालिनी का, तीसरा विजया का था।“
रितेश ने राठौर सर को पूरी घटना भी बता दी। राठौर सर ने सब सुना, मुस्कुराए, कोई टिप्पणी नहीं की। हाजिरी रजिस्टर लेकर चले गए। उनके जाते ही रितेश भी क्लास से बाहर चला गया। कहाँ गया, किसी को नहीं पता। वह सात दिन तक स्कूल नहीं आया।

एकदिन शाम को स्कूल के पास वाली स्टेशनरी शॉप पर उसकी मुलाकात विजया से हो गयी थी।
“अरे रितेश।“, विजया ने पूछा, “क्लास नहीं आए? रोज़ राठौर सर तुम्हारे सम्बन्ध में पूछते थे। किसी को कुछ पता नहीं था तुम्हारा।“
“बस एक राठौर सर ही तो हैं जो मेरे लिए चिंतित रहते हैं। चाहते हैं कि मैं एक अच्छा छात्र बनूं। बाकी किसी को मुझसे कोई सरोकार नहीं। कोई मुझे इम्पर्टीनेन्ट कहता है, कोई बदतमीज़ तो कोई नालायक कहता है। पिताजी मुझसे उम्मीद छोड़ चुके हैं। क्या करूँ क्लास आ कर? करनी मजदूरी है तो क्यों पढ़ूँ?”
“रितेश जब तुम इम्पर्टिनेंस करोगे तो इम्पर्टीनेन्ट कहे जाओगे। चाहे मैं कहूँ या कोई और कहे। तुमने उसदिन गोवर्धन सर के साथ जो सलूक किया वह ठीक नहीं था। उसके लिए तुम्हें जितना धिक्कारा जाए वह कम होगा। आफ्टर ऑल वह सीनियर टीचर हैं। उनकी इज़्ज़त करना हमारा फर्ज़ बनता है।“
“सीनियर नहीं बड़ा दुष्ट टीचर है। पॉलिटिक्स सिखाता है। इससे बात मत करना, उससे बात मत करना। आखिर उससे पूछो की कोई क्या करे? आँखें ज़मीन में गड़ाए और जीभ हाथों में दबाये सारा दिन उस खूसट का स्मरण करे। किताबो पर नज़र दौड़ाये? यह मुझसे नहीं होगा।“
“अच्छा वह पढ़ने-पढ़ाने का क्या हुआ? चार महीने बाद बोर्ड की परीक्षाएँ हैं। पढ़ाई नहीं की तो समझो तुम फेल और मैं मेरिट लिस्ट से बाहर।“
“तो मैं क्या करूँ?”
“जो राठौर सर ने कहा था।“
“वह तो ठीक है लेकिन कब पढ़ें और कहाँ पढ़ें?”
“इंटरवल में और फ्री पीरियड में।“
“अगल बगल से लंगूर देखेंगे।“
“अपने लंगूरों की तुम जानो, मेरे साथ जो बैठेगा गंभीरता से पढ़ेगा।“
रितेश ने विजया के प्रस्ताव को मान लिया।

अगले दिन वह स्कूल पहुँचा तो विजय और दद्दू की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। जब उन्हें पढ़ने पढ़ाने कीबात पता चली तो दोनों के चेहरे उतर गए।
“अबे साले तुम गए।“, विजय बोला।
“हाँ गुरु अब हम कहाँ? अब हमें कहाँ लिफ्ट मिलेगी?”
“अबे कैसी बातें करते हो? एक दो घंटे की ही तो कवायत है। तुम लोग भी बैठ लेना।“
“न बाबा न। कबाब में हड्डी क्या हमें ही बनना है?
“रितेश।“ विजया ने पास आकर आवाज़ दी। “पहला पीरियड फ्री है, चलो पढ़ें।“
“हाँ बे जा। हम तो चले मस्ती करने।“ कहते- कहते विजय और दद्दू वहाँ से खिसक लिए।
पहले दिन पढ़ने-पढ़ाने के सिलसिले की शुरुआत अच्छी हुई। रितेश ने उसदिन अंग्रेजी गद्यांशों का हिंदी में अनुवाद करना सिखाया। अंग्रेजी व्याकरण सीखने के महत्वपूर्ण टिप्स भी दिए। सभी को उसके पढ़ाने की शैली बहुत भा गयी। अब फ्री पीरियड और इंटरवल में यह कक्षा नियमित रूप से लगने लगी।

पढ़ने-पढ़ाने का यह सिलसिला जैसे-जैसे आगे बढ़ा, रितेश अपने में सिमटता गया। स्कूल के बाद भी कुछ ही समय दोस्तों में बिताता। रात में भी एक बजे तक पढ़ता। कई बार माँ कहती भी कि इतनी देर तक मत पढ़ा करे। लेकिन उसके सिर पर पढ़ाई का जैसे जूनून सवार हो गया था। वह पढ़ाई में इतना खो गया कि पता ही नहीं चला कि सर्दियों के चार महीने कैसे बीत गए। मार्च का महीना, परीक्षाओं का महीना सर पर सवार था।
एक दिन रितेश ने देखा विजया क्लास के बाहर अकेले खड़ी थी। मानो किसी की प्रतीक्षा में हो। रितेश ने पास आकर पूछा, “तुम अकेले कैसे खड़ी हो।“
“बस किसी का इंतज़ार कर रही थी।“
“किसका इंतज़ार था?”
“तुम्हारा”
“मेरा।“
“हाँ, तुम्हारा।“
“सब खैरियत तो है?”
“वही नहीं है।“
“क्या हुआ है?”
“रितेश कल मालूम है क्या दिन है?”, विजया ने पूछा।
“मंगलवार।“
“नहीं।“
“फिर?”
“कल स्कूल का अंतिम दिन है।“
“वह कैसे?”
“कल से पंद्रह दिन की प्रिपरेशन लीव हो जाएगी। हम स्कूल नहीं आएँगे। बस प्रवेश पत्र लेने आएँगे। उसके बाद तीन मार्च से बोर्ड की परीक्षाएँ शुरू हो जाएंगी।“
“फिर?”
“परीक्षाओं के बाद मैं चली जाऊँगी।“
“क्यों इंटरमीडिएट नहीं करोगी?”
“पता नहीं। भैया, भाभी कहेंगे तो करुँगी। यह भी नही पता है कि कहाँ से करूँगी?”
“तुम्हारे पिताजी कहाँ हैं?”
“वह यहीं फैक्ट्री में थे। जब मैं नाइन्थ में थी वे नहीं रहे। उनकी मृत्यु हो गयी। हाई स्कूल करने के लिए मैं यहाँ पापा के एक मित्र के घर पर रह रही हूँ। भैया पंजाब में हैं। माँ छोटे भाई के साथ दिल्ली में है। इसलिए पता नहीं इंटरमीडिएट करूँगी तो कहाँ से और करूंगी भी या नहीं। अभी सब कुछ अनिश्चित सा है।
“सो सैड तुम्हारे जाने के बाद मैं यहाँ कैसे पढ़ सकूँगा। यहाँ मन ही नहीं लगेगा। राठौर सर अगले वर्ष रिटायर हो जाएंगे, तुम भी चली जाओगी, यहाँ बचेगा कौन? साला वह खूसट गोवर्धन, लंबू विजय और ठिगना दद्दू?”
“बस तुम्हारे पास बकवास के सिवाय कुछ नहीं है। छोड़ो यह बताओ प्रिपरेशन लीव में कैसे पढ़ेंगे?”
“देखो मैं तो प्रतिदिन सुबह से शाम तक पूरे पंद्रह दिन नहर के किनारे पढ़ता मिलूंगा। तुम चाहो तो आ जाना।“
“बहुत मुश्किल है।“
“मत आना।“
“कुछ पूछना होगा तो?”
“तो तुम मेरी तस्वीर से पूछ लेना, मैं तुम्हारी तस्वीर से पूछ लूँगा।“
“मुझे पढ़ाई की चिंता है, तुम्हे मसखरी सूझ रही है।“
“और मुझे जैसे कुछ है ही नहीं? मुझे पढ़ाई से ज्यादा कॅरियर की चिंता है। क्या करूँगा?
“साइकिल पर सब्ज़ी और अंडे बेचना।“
दोनों खिलखिला कर हँस पड़े थे। कुछ पल हँसते ही रहे।
राठौर सर ने क्लास में प्रवेश किया ही था। दोनों को इस कदर हंसता देखकर बोले, “क्या हुआ रितेश?”
“सर कुछ नहीं। यह बहुत शैतान है। पढ़ाते-पढ़ाते कहती है मेरा कॅरियर साइकिल पर लादकर सब्ज़ी और अंडे बेचना होगा। इसी पर हँसी छूट गयी।“
“नहीं विजया। तुम्हें नहीं मालूम, रितेश बहुत गुणी है, इंटेलीजेंट है। शायद इसका कॅरियर देखने के लिए मैं जीवित न बचूं किन्तु इतना यकीन है कि वह या तो एक अच्छा प्रोफेसर होगा या फिर पत्रकार । वह जीनियस है, सेंसिटिव है। इसलिए जल्दी हर्ट भी हो जाता है और निराशा में डूब जाता है बस यही कमी है।“
“सर।“ डबडबायी आँखों से जीवन में पहली बार रितेश ने राठौर सर के पैर छू लिए। उसे लगा मानो वह उसके भीतर बैठे थे। उसको भली प्रकार समझ चुके थे।

प्रिपरेशन लीव हो गयी थी। विजया कई बार घर के पीछे बहती नहर के किनारे बूढ़े खजूर के पेड़ के नीचे बैठे रितेश के साथ पढ़ने आती रही। पढ़ाई भी होती। भविष्य के अधकचरे सपने भी बुने जाते। हर बार स्वप्न के अंत में विजया कहती, “रितेश यह सिर्फ स्वप्न है, दिवा स्वप्न। इन्हें हम देख रहे हैं। लेकिन यह मरुस्थल में पानी पीने के असफल प्रयास मात्र ही हैं। मैं तुम्हारी सफलता के लिए जीवन भर प्रार्थना करती रहूँगी। मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ। मुझे ईश्वर में आस्था है। मुझे यकीन है तुम ज़रूर सफल होगे।“
“मैं क्या कहूँ? मैं भी यही कामना करूँगा कि तुम जहाँ रहो खुश रहो। जितना साथ लिखा था, हमने उसे निभा लिया। अच्छी तरह निभा लिया। आगे भगवान् की इच्छा।“
“हाँ एक बात और कहूँगा।“
“क्या?”
“यह कि जीवन में हमें एक दूसरे का अता पता मिल सके तो मिलने की कोशिश पूरी हो सकेगी। स्थितियों ने साथ दिया तो जीवन भर साथ भी रह सकेंगे?”
“जीवन भर?” और यह कह कर वह खिलखिलाकर हँस पड़ी थी। कितना सिरफिरा प्रस्ताव था। बेवकूफी से भरी कल्पना थी।
“तुम हँसी क्यों?”
“अभी भी हँस रही हूँ।“
“आँखें नम क्यों हैं?”, गंभीर होते हुए रितेश ने पूछा था।
“कुछ ख़ुशी है। कुछ मज़बूरी का एहसास। तुम न समझो तो ठीक है। बस इतना समझो कि परीक्षाओं के बाद अलविदा। न तुम मुझे मिल सकोगे न मैं तुम्हें। अपनी-अपनी अलग मंज़िल होगी। दोनों को एक दूसरे के अभाव में मंज़िलें पानी होंगी। न ही नहर का किनारा होगा, न यह खजूर का वृक्ष और न हम दोनों के बीच फैली ये किताब कॉपियाँ और कलम। तुम तुम होगे। मैं, मैं होंगी। अलग जहाँ होगा। बिलकुल अलग। न तुम साथ होगे न मैं। साथ होगा तो वक़्त और बीती यादें।“
“यार तुम मन भारी कर देती हो। यह क्यों नहीं सोचती कि दुनिया गोल है। कहीं तो मिल सकते हैं। पहचान सकते हैं। एक दूसरे के काम आ सकते हैं।“
“हो सकता है। चलो। लेट अस पार्ट। तीस मार्च से परीक्षाएं होंगी। अगले दिन मैं चली जाऊँगी। बीच में अब मिलने की संभावना नहीं है। सो अलविदा।“
“ठीक है। मैं तुमसे तुम्हारा पता नहीं मागूंगा। अपना पता दे रहा हूँ। कभी यादों के मंज़र घने हो चले तो पंक्तियाँ लिखकर पोस्ट कर देना। भले ही अपना पता न लिखना। मैं तुम्हें पत्र नहीं लिखूंगा। कम से कम तुम्हारी खैरियत जानकर खुश तो हो सकूंगा।“
“यह संभव नहीं। मैं ख़त नहीं लिखूंगी। कभी जो मेरा पत्र तुम्हारे मम्मी डैडी को मिल गया तो तूफ़ान खड़ा हो जाएगा। सपनों में ख़त लिखूंगी, सपने में ही तुम जवाब देना। समाज कुटिल है। उससे जितना बचे रहो, उचित होगा। ओ के?”
“ओ के। लेकिन कल तो पढ़ने आओगी न?”
“हाँ अभी तो आऊँगी। यहाँ आना तो परीक्षाओं के तीन दिन पहले ही बंद होगा।“
“चलो जितना वक़्त साथ गुज़रे, उतना ही अच्छा है। बाद में तो साहिर की जुबां में कहना पड़ेगा चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों।“
“अजनबी तो न कहो। मिले तो क्या पहचानोगे भी नहीं?”
“वक़्त को कोई देख नहीं पाया है। हॉस्टल के मेरे तमाम अज़ीज़ दोस्त अब अजनबी हो गए हैं। किसी को किसी की ख़बर की ज़रुरत नहीं। सब अपने में मस्त हो गए हैं। कहाँ दम भरा करते थे हम एक दूसरे को जीवन भर नहीं भूलेंगे। लेकिन वह वायदे क्या हुए कोई सोचता भी नहीं।“
“तुम नॉस्टैल्जिक हो रहे हो। बस करो। शाम बहुत हो गयी है। घर चलो।“

अगले दिन दोनों उसी खजूर के पेड़ के नीचे मिले थे। विजया कुछ खुश दिख रही थी।
“आज कुछ अधिक प्रसन्न हो?”, रितेश ने पूछा।
“हाँ।“
“क्यों?”
“क्योंकि आंटी तुमसे मिलना चाहती हैं।“
“आखिर क्यों?”
“यह तो मुझे भी नहीं मालूम। कल कह रही थी तुम दोनों का अकेले नहर के किनारे बैठकर पढ़ना ठीक नहीं। कोई देखेगा तो क्या कहेगा?”
“तुमने क्या कहा?”
“मैंने कुछ नहीं कहा। तब उन्होंने कहा कि तुम्हें घर लेकर आऊँ।“
“कब?”
“आज और अभी।“
“चलो।“
वह विजया की आंटी के बंगले पहुँच गया। वह बाहर खड़ा रहा। विजया अंदर चली गयी। कुछ देर बाद विजया अपनी आंटी के साथ बाहर आई। आंटी हँसमुख थी।
“आओ बेटा।“
“नमस्ते आंटी।“
“विजया तुम्हारी अंग्रेजी की बहुत प्रशंसा करती है। तुम्हारे बारे में सब कुछ बता चुकी है।“, सोफे पर बैठते हुए आंटी ने कहा।
“जी।“
“अरे खड़े क्यों हो? बैठो। विजया जाओ कुछ नाश्ता ले आओ।“
“जी” कहकर विजया अंदर चली गयी।
“बेटा”, आंटी ने कहा, “यह अच्छा है कि तुम एक दूसरे को पढ़ाओ। पर अच्छा होगा कि तुम घर आ जाया करो। यहीं बैठकर पढ़ा करो। समाज बहुत खराब है। राई का पहाड़ बनाता है।“
“जी।“
“तुम्हें घर आकर पढ़ने में कोई कठिनाई होगी?”
“नहीं आंटी।“
“तो कल से तुम यहाँ आओ। जितनी देर चाहो पढ़ो। हमें कोई दिक्कत नहीं होगी।“
“ठीक है आंटी।“
इतने में विजया कुछ नाश्ता ले आई थी।
“तुम दोनों नाश्ता करो और पढ़ो। मैं चलूं घर के काम देखूं।“
आंटी चली गयी। विजया और रितेश पढ़ने बैठ गए।
“विजया यहाँ पढ़ सकोगी?”
“यह क्यों पूछा?”
“क्योंकि दरख़तों की छाँव में मखमली घास पर बैठ कर जल की किलकारी और पक्षियों की चहकन के बीच पढ़ने-पढ़ाने का जो सुख है वह यहाँ कहाँ?”
“तुम्हें मास्टरी करनी है या शायरी?”
“दोनों।“, दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े थे। एक क्षण हँसते ही रहे।
“और सुनो।“, विजया ने कहा, “मुझे वहाँ पढ़ना अटपटा लगता था।“
“अच्छा। तो माउथ ऑर्गन सुनना क्यों पसंद करती थी? यहाँ कैसे सुनोगी?”
“सो तो है।“
“फिर?”
“फिर कुछ नहीं। चलो पढ़ो पढ़ाओ। बताओ कल जो प्रॉब्लम दी थी, सॉल्व कर पाए कि नहीं?”
“देख लो।“
“अरे वाह। एकदम सही।“
“थैंक यू।“
“एक बात बताओ तुम फेल क्यों होते रहे?”
“क्योंकि तुम्हारी तरह का कोई टीचर नहीं मिला था।“
“यह कहो कि तुम मक्कार थे। दोष टीचर में नहीं होता। कोई शिक्षक यह नहीं चाहता कि उसका छात्र फेल हो।“
“तुम ऐसा सोच सकती हो, मैं नहीं। खैर छोड़ो पुरानी बातें। कहीं अब फिर फेल हो गया हो तो कहीं का नहीं रहूँगा।“
“ऐसा नहीं होगा। पढ़ाई में तुम फेल हो या पास, जीवन में सदा पास होते रहोगे।“
“ओह तुम पण्डिताई भी करने लगी?”
“इसमें पण्डिताई की क्या बात है?”
“किसी का भविष्य बताना ही पण्डिताई है। ज्ञानी और पहुँचे हुए लोग ही भविष्य में झाँक सकते हैं। सब नहीं।“
“अच्छा चलो, अब बंद करो भाषण । सात बज रहा है। पढ़ाई खत्म, घर भागो।“
रितेश उठकर चल दिया। विजया उसे मुख्य द्वार तक छोड़ने आई। जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गया वह वहीँ खड़ी रही।
“विजया।“, आंटी ने आवाज़ दी।
“आई आंटी।“ हड़बड़ा कर विजया किचन में पहुंची।
“चला गया रितेश?”
“जी।“
“सीधा लड़का है। सज्जन लगता है।“
“जी बहुत गंभीर स्वभाव का है। इसके दो ही शौक हैं। घूमना और माउथ ऑर्गन बजाना। बहुत अच्छा बजाता है।“
“अरे तो उससे कहना जाते समय कभी-कभी कुछ गीत सुना दिया करे। तुम्हें तो मालूम है कि मुझे वाद्यों से कितना लगाव है। शादी के पहले का सितार और गिटार आज भी मेरे कमरे में सहेज कर रखा हुआ है।“
“मैं कह दूँगी।“
“अगर वह मुझे सिखा सके तो मैं माउथ ऑर्गन सीखना भी चाहूंगी।“
“यह मैं नही कह सकती कि वह सिखा पाएगा या नहीं। पूछ लूंगी।“
निश्चित समय पर जब अगले दिन रितेश आया तो उसका चेहरा उदास था।
“चेहरे पर उदासी क्यों छाई है?”
“इसलिए कि बंद कमरे में पढ़ने का मन नहीं करता।“
“अभी एक बात बोलूंगी उदासी फुर्र हो जाएगी।“
“बोलो।“
“आंटी कह रही थी कि तुम उन्हें माउथ ऑर्गन बजा कर सुनाओ। हो सके तो उन्हें भी सिखा दो।“
“शिट।“
“इसमें शिट की क्या बात है?”
“उन्हें कैसे पता चला कि मैं माउथ ऑर्गन बजा लेता हूँ?”
“लो। अरे मैंने बताया। और कैसे पता चलेगा?”
“पागल हो गयी हो क्या?”
“क्यों किसी के गुणों की प्रशंसा करना पागलपन है?”
“नहीं। वह क्या सोचेंगी? आवारा समझेंगी।“
इससे पहले कि विजया कुछ कहती आंटी कमरे में आ गयी
“अरे रितेश तुम तो बहुत गुणी हो। विजया ने बताया कि तुम माउथ ऑर्गन प्ले कर लेते हो। ज़रा सुनाओ।“
“आंटी ऐसा कुछ नहीं है। शौकिया बजा लेता हूँ, बस।“
“शौकिया ही बजा कर सुना दो।“
रितेश ने उनके कहने पर एक नहीं चार गाने माउथ ऑर्गन पर उन्हें सुनाये।
वह मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनती रही।
“तुम माउथ ऑर्गन बजाना मुझे सिखा सकते हो?”
“आंटी मैं तो बस ऐसे ही गाने निकाल लेता हूँ। मैंने इसे सीखा नहीं है। आप भी एक माउथ ऑर्गन ले लीजिए। गाने को सुन सुन कर उनको इस पर निकालने का प्रयास कीजिये। बस।“
“ठीक है। मैं कल माउथ ऑर्गन ले आऊँगी। जब तुम बजाओगे उसकी कॉपी मैं करती जाउँगी। मैंने सितार सीखा है। गिटार भी बजा लेती हूँ। शायद माउथ ऑर्गन बजाना भी आ जाए।“
“जी ज़रूर आ जाएगा।“
“चलो तुम लोग पढ़ो। मैं चाय लाती हूँ।“
रितेश उन्हें देखता ही रह गया। उसे कभी उम्मीद नहीं थी कि उसका माउथ ऑर्गन आंटी को अपना मुरीद बना लेगा।
“अब ठीक है न? मैं भी सुन सकूंगी तुम्हारा वाद्य। माउथ ऑर्गन न बजा पाने की कसक भी तुम्हारे दिल में नहीं रह जाएगी।“
“कसक ज़रूर रह जाएगी। मगर जहाँ तक मैं सोचता हूँ संगीत एकांत का साथी है या फिर अपने साथी के साथ का साथी है।“
“इसका क्या मतलब?”
“सीधा सा मतलब है। जब दो हम संगीत को एकांत में सुनते हैं तो उसमें कुछ और रस प्राप्त होता है। तीसरे के मध्य संगीत कला का प्रदर्शन भर होता है। उसमें आनंद नहीं मिलता।“
“तुम्हारी इन गूढ़ बातों को नहीं समझ सकती।“
“तुम समझो भी नहीं।“
“क्यों?”
“क्योंकि तुम मित्र हो साथी नहीं।“
“तुम बहुत शैतान हो। तुमने ठीक ही समझा। फिर भला मुझे क्यों सुनाते थे?”
“बस ऐसे ही। हमेशा किसी कार्य के पीछे कोई कारण नहीं होता। अकारण भी कुछ किया जाता है।“
“अकारण?”
“हाँ मुझे नहीं मालूम कि मैं तुम्हें माउथ ऑर्गन पर गीत क्यों सुनाता था? क्यों तुम सुनती थी? बस यह समझ लो सुनाना मेरी मज़बूरी और सुनना तुम्हारी मज़बूरी थी क्योंकि तुम अच्छी मित्र हो। मैं कल्पनाओं में उड़ान भरता निश्छल मन।“
“कुछ ही दिनों में बहुत दूर की उड़ान पर है जनाब।“
“उड़ान भर है। मकाम नहीं। न होगा। यह भी पता है फिर भी उड़ने से मन को क्यों वंचित करूँ।“
“नहीं नहीं खूब उड़ो। मना नहीं करती। लेकिन पढ़ाई को न उड़ा देना। वरना कल्पना चूर चूर हो जाएगी।“
“वह तो वैसे भी होनी है।“
“क्या पता?”
“सच?”
“और क्या। भविष्य किसने देखा है?”

दोनों किन्हीं विचारों में खोये आकाश में झांकते रहे। आंटी ने आवाज़ दी, “रितेश पढ़ाई ख़त्म हो गयी?”
“आंटी अभी कुछ समय शेष है।“
“अच्छा बता देना गाना सुनने आऊँगी।“
“जी आंटी।“
पढ़ाई ख़त्म होने के बाद रितेश काफी देर तक माउथ ऑर्गन पर आंटी को गीत सुनाता रहा। वह मंत्रमुग्ध होकर सुनती रहीं। बीच बीच में उसकी प्रशंसा भी करती रही।
अब लगभग रोज़ ही ऐसा होने लगा। पढ़ाई ख़त्म होने के बाद रितेश को रुकना पड़ता था। आंटी को उनके मनपसंद गाने सुनाने पड़ते थे।
“रितेश मुझे डर है कि गाना सुनाने के चक्कर में तुम्हारी पढ़ाई प्रभावित न हो।“
“नहीं। इसी बहाने तुम्हारे सामने तो रहता हूँ।“
“वैसे आंटी तुम्हारी भूरि भूरि प्रंशसा करती हैं। जब बात चलती है अंकल से कहती हैं रितेश बहुत गुणी, समझदार, सद्चरित्र और अच्छा लड़का है।“
“अच्छा है। कुछ साख बने। अभी तक इम्पर्टीनेन्ट ही था।“
“ओफ्फो। एक शब्द को पकड़ कर बैठ जाते हो।“
“कल जानते हो-मैंने अंग्रेजी के तीन निबंध लिखें हैं। ठीक से चेक करना। अपनी कॉपी दो। मैं तुम्हारी ज्योमेट्री की प्रॉब्लम चेक करती हूँ।“
“मैं कल प्रॉब्लम सॉल्व नहीं कर सका।“
“क्यों?”
“पता नही। पागलपन ही कह लो। खाली बैठे न जाने क्या क्या सोचता रहा। सारा समय बिना किसी काम के बीत गया।“
“दिस इज़ बैड। मैं तुमसे बात नहीं करती। आज कोई पढ़ाई नहीं होगी। तुम जाओ मैं अकेले पढूंगी।“
“यह क्या कह रही हो?”
“वही जो तुमने सुना है।“
कहते कहते विजया अपनी किताबें समेट कर कमरे से बाहर चली गई।
“पढ़ाई ख़त्म हो गयी?”, आंटी ने पूछा।
“हाँ आज विशेष नहीं पढ़ना था।“
“रितेश चला गया?”
“पता नहीं।“
“लगता है झगड़ा हुआ है।“
विजया कुछ बोली नहीं।
रितेश कमरे से बाहर आकर बोला “नहीं आंटी झगड़ा नहीं हुआ। आज मैंने प्रॉब्लम सॉल्व नहीं की थी इसलिए उसने कहा पढ़ेंगे क्या? पहले काम पूरा करो तब आना।“
“अरे विजया ऐसा नहीं बोला करते।“, कहते कहते वह विजया के कमरे में चली गयी।
इस बीच रितेश चला गया। आंटी दुखी थी। वह उसका गाना नहीं सुन सकीं। विजया भी बहुत ख़ुश नहीं थी। उसका भी मन पढ़ने में नहीं लग रहा था। गेट के बाहर जाकर उसने नहर के किनारे नज़र दौड़ाई। कान में माउथ ऑर्गन की सुरीली आवाज अटक गयी। उससे रहा नहीं गया। वह कुछ कॉपी किताबें लेकर रितेश के पास चल दी। कुछ देर जाने के बाद देखा रितेश आँखें बंद किए माउथ ऑर्गन बजा रहा था। किताब के पन्ने तेज़ हवा में उड़ रहे थे। वह थोड़ी देर वहाँ खड़ी रही और फिर लौट आई।
इसके बाद कई दिन तक रितेश विजया के साथ पढ़ने नहीं आया। आंटी प्रतिदिन विजया से रितेश के विषय में पूछती। विजया का एक ही जवाब होता, “पता नहीं क्यों नहीं आ रहा है।“
“ज़रूर वह बुरा मान गया होगा।“
“मैंने तो ऐसा कुछ भी नही कहा था।, “विजया ने जवाब दिया।
“ठीक है मैं आज रामू को उसके घर भेजती हूँ, उसे आने के लिए कहती हूँ।“
“जी।“

आंटी का संदेशा पाकर रितेश शाम को घर आया। उसके हाथ में किताबों का बण्डल नहीं था। विजया ने दरवाज़ा खोला। उसे ऊपर से नीचे तक देखा। कुछ नहीं बोली।
“आंटी कहाँ हैं?”, रितेश ने पूछा।
“बैठो बुला रही हूँ।“
विजया उसे ड्राइंग रूम में बैठने को कहकर आंटी को रितेश के आने की सूचना देकर अंदर चली गयी। कुछ देर में आंटी आ गयी।
“अरे रितेश तुम विजया से नाराज़ थे मुझसे तो नाराज़ नहीं थे? क्यों नहीं आए?
“आंटी की पढ़ाई की धुन थी। पास होना है।“
“अरे वह तो तुम हो ही जाओगे। आज कोई अच्छा सा गीत सुना दो।“
रितेश उनके अनुरोध को अस्वीकार नहीं कर सका। वह गाना सुनाता रहा। विजया भी कमरे में खामोश बैठी रही। आधे घंटे बाद आंटी ने कहा, “चलो अब तुमलोग पढ़ाई करो, मैं नाश्ता भेजती हूँ।“ कहते कहते वह ड्राइंग रूम से उठकर चली गयी।
दोनों ही कुछ पल एक दूसरे के सामने खामोश बैठे रहे। कुछ देर बाद रितेश ने ख़ामोशी तोड़ी।
“चलूँ?”
“किताब तो लाये नहीं हो।“
“घर जाने के लिए किताबों की क्या जरूरत है?”
“ज्यादा बनो मत। चलो पढ़ाई करो। जानते हो मैं भी तीन दिन से कुछ नहीं पढ़ पायी हूँ।“
“गलती किसकी है?”
“तुम्हारी।“
“क्यों?”
“क्योंकि जिस सम्बन्ध की अपेक्षा में तुम कल्पना में खो गए और पढ़ाई का कीमती वक़्त बर्बाद कर दिया वह ठीक नहीं था।“
“क्या यह सब मेरे वश में था?”
“वश में था या नहीं, वश में करना था। अपने को मज़बूत करना था।“
“बस?”
“और क्या। तुम स्नेह बंधन को प्रेम में बदलने का स्वप्न देखने लगे। मित्र को पत्नी के रूप में देखने लगे। कल्पना करने लगे। पढ़ाई छोड़ दी। वक़्त गवां दिया। यह तुम्हारे जैसे समझदार युवक को शोभा नहीं देता। ज़रा सोचो आज हम विवाह बंधन में बंध जाएँ तो क्या हम उस बंधन को निभा पाएंगे? अभी हम किसी भी कॅरियर में नहीं है। किस पर आश्रित होंगे हम? बोलो? या तो बंधन टूट जाएगा या फिर हमारा जीवन टूट जाएगा। पहले कॅरियर बने फिर कुछ सोचा जाए। अल्हड़ उम्र के फैसले धोख़ा देते हैं। पैर धरती पर जमा कर चलो। धरती के ऊपर चलने का प्रयास करोगे तो औंधे मुंह गिर पड़ोगे। चलो पढ़ाई शुरू करो। यह लो मेरे निबंध चेक करो पहले।“, कहते कहते विजया ने रितेश के सामने अपनी कॉपी रख दी।
रितेश यंत्रवत निबंध पढ़ने लगा। उनमें कहीं कोई व्याकरण की त्रुटि नहीं थी।
“वेरी गुड। बहुत अच्छा लिखा है। एक भी मिस्टेक नहीं है।“
“थैंक्स, और सुनो। तुम हो बहुत चालाक। कॉपी किताब नहीं लाए। लेकिन बहाना कुछ नहीं चलेगा, यह लो कॉपी। यह है प्रॉब्लम। आधे घंटे में सॉल्व करके दिखाओ। और सुनो, नाक पर से मक्खी हटाओ……”अभी विजया अपनी बात पूरी करती कि रितेश ने अपना दाहिना हाथ मक्खी उड़ाने के लिए उठाया। विजया ज़ोर से हँस पड़ी।
“क्या हुआ?”
“तुम्हारी बेवकूफी पर तरस आ गया। मेरा मतलब था तुम्हारी नाक पर बहुत जल्द मक्खी छींकती है। यानी बड़े तुनक मिज़ाज़ हो, नाराज़ हो जाते हो। क्रोध करना कम करो। नाराज़गी कमजोर मन की निशानी होती है। समझे?”
“सब समझ रहा हूँ।“
“देखो केवल चार दिन बचे हैं। फिर तो परीक्षाएं शुरू हो जाएंगी। और उसके बाद तुम कहाँ मैं कहाँ? फिर कब मिलेंगे यह भी नहीं पता।“
“मिल कर करेंगे क्या?”
“क्यों?”
“कॅरियर बनने में तो चार छः वर्ष लगेंगे।“
“तुम पोखर के मेढक ही रहोगे। चलो अभी तीन दिन तो पढ़ो फिर कुछ सोचेंगे।“
“ठीक।“ मायूसी से रितेश ने कहा और घर के लिए चल पड़ा।

रास्ते भर विजया की नसीहतें उसे बेचैन किये रहीं। वह नसीहतों के बंधन में नहीं बंधना चाहता था। किंतु यहाँ नसीहतें ही उसका दायरा थी। उसी दायरे में उसे रहना था। दायरे को तोड़ कर रह पाना उसके लिए कठिन था। वह खिन्न हो उठा था। घर पहुंचकर भी उसकी खिन्नता में कमी नहीं आई। उस रात वह न पढ़ सका और न सो सका।
प्रीप्रेशन लीव के ये अंतिम तीन दिन जैसे काटने को नहीं आ रहे थे। शाम को विजया के साथ पढ़ाई का समय भी कम हो गया था। मुश्किल से आधे घंटे ही पढ़ाई होती। आंटी ने रितेश से गीत सुनाने को नहीं कहा। वह जानती थी उनका संगीत प्रेम रितेश की पढ़ाई में बाधक होगा। पढ़ाई के अंतिम दिन रितेश ने ही आंटी को बुलाया “आंटी आज पढ़ाई का अंतिम दिन है। मैं चाहता हूँ आपको अपनी मनपसंद के दो गीत सुना दूं।“
“अरे इससे अच्छी बात क्या होगी?”
“इसके बाद रितेश ने माउथ ऑर्गन पर दो गीत सुनाये।“
गीतों को सुनकर आंटी की आँखों में ख़ुशी के आंसू छलक आये।
“बेटा ईश्वर करे तुम एक महान संगीतकार बनो। तुम टैलेंटेड हो। टैलेंट को बेकार मत जाने देना।“
“आपका आशीर्वाद चाहिए आंटी।“
“वह सदैव मिलेगा। बैठो चाय पीकर जाना। मैं बनाकर लाती हूँ।“
आंटी चली गयी। विजया ने रितेश से कहा “जाओ मन लगाकर पढ़ना। अच्छे पेपर करना।“
“कोशिश करूंगा।“
“कोशिश करना शब्द आत्म विश्वास की कमी का परिचायक होता है। आत्म विश्वासी बनो। जवाब दो बहुत अच्छा पेपर करूँगा। थके स्वर में आत्म विश्वास को मत बाँधा करो। समझे?”
“समझा गुरुआइन।“
इतने में आंटी चाय ले आई। तीनों ने साथ बैठकर चाय पी। कुछ देर गप्प की।
“अच्छा आंटी आज्ञा दें।“
“हाँ बेटा जाओ। ईश्वर तुम्हें सफलता दे। विजया जाओ रितेश को गेट तक छोड़ आओ।“
“जी आंटी।“
“तुम बैठ जाओ। मैं चला जाऊंगा। अब कितने दिन गेट तक छोड़ने आओगी? आज के बाद तो यह गेट मेरे लिए बंद हो जाएंगे।“
“कैसी बात करते हो? आंटी तुम्हें कितना स्नेह देती हैं। मेरे जाने के बाद उनसे मिलने नहीं आओगे?”
“अभी से क्या कहूँ?”
“तुम नहीं सुधरोगे। कभी आत्म विश्वास के साथ तुम्हारी पॉजिटिव सोच नहीं होगी।“
“बात यह नहीं है। तुम्हारे जाने के बाद यह मोहल्ला ही काटने को दौड़ेगा। घर की क्या कहूँ? यादों के खण्डहर में कैसे खुशियाँ ढूँढूँगा?”
“खण्डहर ही सबसे अधिक आकर्षक होते हैं। अनंत खुशियाँ देते हैं। अन्यथा प्राचीन खण्डहरों को देखने का दुनियाभर के लोगों में पागलपन क्यों होता?”
“हार गया। चलो छोड़ो। तुम्हें देर हो रही है।“
“सुनो फर्स्ट आना है।“
“आत्मविश्वास से कहूँ?”
“कहो।“
“पास हुआ तो डीविज़न सेकण्ड ही होगी। इससे अधिक उम्मीद नहीं रखता।“
“ओफ्फो। जाओ। मैं ही तुम्हारे लिए भगवान् से प्रार्थना करूंगी।
“बाय।“
परीक्षाओं का अंतिम दिन था। छात्र-छात्राओं की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। कितना स्वतंत्र महसूस कर रहे थे। जिनके पेपर अच्छे हुए थे वह भी, जिनके पेपर ख़राब हुए थे वह भी, दोनों ही खुश थे। लेकिन रितेश कुछ मायूस सा था। इसलिए नहीं कि उसके पेपर कैसे हुए। उसे विजया से बिछुड़ना अखर रहा था। समझ नहीं पा रहा था किस प्रकार बीते क्षणों को मुट्ठी में भींच कर पकड़ ले। वह भी वहाँ चला जाये जहाँ विजया जा रही थी। विचारों की इसी उधेड़ बुन में पड़ा वह स्कूल गेट के बाहर आ गया था। सामने विजया और उसकी आंटी कार में बैठी थीं। मानो किसी की प्रतीक्षा कर रहीं हों।
“रितेश भैय्या।“ ड्राइवर ने रितेश को देखते हुए आवाज़ लगायी। “मेम साहब बुला रहीं हैं।“
रितेश रोबोट की भांति कार तक चला आया।
“आंटी प्रणाम।“
“बेटे आओ। हमारे साथ घर चलो।“
“आपके घर?”
“और क्या। आज शाम विजया जा रही है। मैंने सोचा आज हमसब एक साथ लंच कर लें।“
“रितेश मना नहीं कर सका। मना करने के लिए शब्द भी शेष नहीं थे। वह कार में बैठ गया। कुछ ही पलों में घर आ गया। तीनों ने साथ लंच किया। लंच के बाद आंटी क्लब चली गयी थी। रितेश और विजया काफी देर तक ड्राइंग रूम में बैठे पिछली बातों को याद करके हंसते हंसाते रहे।
“एक बात है रितेश। तुम कितने भी शैतान रहे हो लेकिन तुम्हारी सद्चरित्रता की मैं दाद देती हूँ। तुम उश्रंखल हो। जल्दी उत्तेजित हो जाते हो। मुँहफट हो। अपशब्दों का प्रयोग करने से भी नहीं चूकते हो। इस सब के बाद भी तुम बहुत सदाचारी हो।“
“यह तुम्हारी अपनी सोच है। सबकी नहीं।“
“गलत कह रहे हो। आज तक कक्षा की किसी छात्रा ने तुम्हारे चरित्र या व्यवहार पर उँगली नहीं उठायी। सबके दिल में तुम्हारे लिए इज़्ज़त रही है। स्नेह रहा है। उनकी हमेशा यही अपेक्षा रही कि तुम उनसे सहायता मांगो। लेकिन तुम स्वयं में इतने सक्षम कि तुम्हें कभी किसी की ज़रूरत नही पड़ी।
“तुम्हारी सभी सहेलियों का शुक्रिया कैसे अदा करूँ नहीं जानता।“
“शुक्रिया अदा करने की कोई ज़रूरत नहीं। बस एक वायदा करो।“
“क्या?”
“तुम शैतानियां कितनी भी करना, अपनी सद्चरित्रता पर आंच मत आने देना। अगर तुम ऐसा कर सके तो मुझे विश्वास होगा कि मेरा स्नेह विजयी रहा।“ रितेश चुप रहा।
“चुप क्यों हो? कुछ बोलते क्यों नहीं?”
“शब्द नहीं हैं। भावों के वेग ने जुबां को जकड़ रखा है।“ उसकी भी आँखें छलछला उठी थीं।
”रितेश वक़्त भाग रहा है। इसे हम पकड़ नहीं सकते। हमें इसके साथ ही चलना होगा। बातें तो बहुत हैं, ख़्वाब भी बहुत हैं। पर सभी वक़्त के सेंसर में जकड़े है। खैर चलो। दो महीने के यह स्वर्णिम क्षण जीवनभर यादगार रहेंगे। समझ लो इतने ही क्षण हम मिले थे।“ उसने अपने हाथों से अपना मुंह छिपा लिया था।
“विजया। तुमने देखा है न काली काली लंबी सड़कों पर चीखते ट्रकों को भागते , बस्तियों से गुज़रते और सन्देश देते ‘फिर मिलेंगे टाटा।‘ हर ट्रक के पीछे यही वाक्य लिखा होता है न? यह आशावाद का संदेश देता है। चलो हम भी ज़िंदगी की अनदेखी लंबी सड़कों पर चल पड़ें। इसी सन्देश के साथ फिर मिलेंगे।“ कहते कहते रितेश उठा और मुख्य द्वार की ओर चल पड़ा।
“रितेश।“
रितेश ने मुड़ कर देखा विजया आ रही थी।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं। तुम्हारे दूर होने का विचार मन को अकेला कर रहा है।“
“बी बोल्ड। कम लेट अस शेक हैण्ड, स्माइल बिफोर वी पार्ट।“
रितेश को अंग्रेजी में बोलता देख विजया ठहाका लगाकर हँस पड़ी। रितेश ने हाथ बढ़ाया। विजया ने रितेश के हाथ को गर्मजोशी से पकड़ लिया।
“लेकिन रितेश मैंने अवज्ञा की है माँ की। माँ कहती थी कि कभी किसी पराये लड़के का स्पर्श न करना। मैंने तुम्हारे हाथ में अपना हाथ दे दिया।“
“इट इज़ अ गुड साइन। हो सकता है यह भविष्य हो।“
यह सुनकर विजया और ज़ोर से हँसने लगी।
“ओ के। यह सही वक़्त है। हमारी आँखें अब नम नहीं। हमारे चेहरों पर हंसी है। चलो मैं साइकिल से घर पहुंचू। तुम कार से स्टेशन और ट्रेन से घर पहुँचों।“ और रितेश चल दिया।
विजया उसे तब तक देखती रही जब तक वह दृष्टि से ओझल नहीं हो गया। रितेश भी उसे पीछे मुड़कर तब तक देखता रहा जब तक सीधी सड़क एक मोड़ पर आकर ठिठक नहीं गयी।
क्रमशः ………..

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