फेल न होना …. भाग – 4

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रितेश ने अपने जाने की बात माँ को बताई। माँ ने रसोई घर का काम समेटते हुए कहा “अच्छी बात है। लेकिन समझ लो यह अंतिम वर्ष है। बोर्ड की परीक्षा है। इस वर्ष यदि पास नहीं हुए तो इसी क्लास में सड़ते रहोगे। तुम्हारे सब साथी आगे निकल जायेंगे। तुम पिछड़ जाओगे। तुम उनकी बराबरी न पढ़ाई में कर सकोगे और न करियर बनाने में। कितना बुरा लगेगा। पिताजी भी किसी को क्या बताएंगे कि तुम दसवीं पास नहीं कर पाए।“
“माँ तुम बहुत जल्द निराश हो जाती हो।“ कह तो रहा हूँ मेहनत करूंगा।
“ठीक है। पढ़ो, बड़े आदमी बनो। परिवार का नाम रोशन करो। हमें और क्या चाहिए?”
“मैं अपना सामान रखने जाऊँ?”
“हाँ। ले जाने वाला सामान निकालो। रसोई समेट कर आती हूँ। सामान पैक करवा दूँगी।“
“ठीक है।“
          रितेश चुपचाप अपने कमरे की ओर चला गया। कुछ ही समय में उसने अपना सामान निकल कर बेड के किनारे रख दिया और माँ की प्रतीक्षा करने लगा। दस बज चुका था। माँ नहीं आई थी। वह बेड के एक किनारे पर सिमटकर सो गया। उसे पता नहीं चला माँ कमरे में कब आई और कब उन्होंने उसका सामान पैक कर दिया।
दूसरे दिन वह अपनी आदत के अनुसार दिन चढ़े तक सोता रहा। दिन के ग्यारह बजे चुके थे। रितेश अभी तक सो रहा था।
नीलेश को मालूम था कि रितेश को जाना है। बार-बार वह रितेश के कमरे तक जाता। धीरे से दरवाजा खोलकर कमरे में झाँकता। रितेश को गहरी नींद में सोता देखकर लौटा आता।
बारह बज गए। रितेश नहीं उठा तो नीलेश से रहा नहीं गया। वह माँ के पास आया। धीरे से पूछा-
“मैं भैय्या को जगा दूं?”
“जाओ जगा दो।“ माँ ने कहा।
नीलेश और निधि दौड़ कर रितेश के कमरे तक गए और लगभग चीख कर बोले, “भैय्या एक बज रहा है। तुम्हें जाना है। उठोगे नहीं?”
“उठता हूँ।“
“माँ कह रही हैं जल्दी करो।“
“पिता जी चले गए?” रितेश ने पूछा।
“पिताजी जाने वाले हैं।“
“अच्छा।“ और वह फिर गहरी नींद में सो गया।
           दो बजे जब मिस्टर आनंद भोजन करके ऑफिस चले गए तब रितेश उठा। तीन बसजे तक वह जूते मोज़े पहनकर चलने के लिए तैयार हो गया। “बेटा मैंने तुम्हारे लिए कुछ मीठे और नमकीन पकवान बना दिए हैं। इसे ले जाना। और देखो इस बार मन लगा के पढ़ना।“
“ठीक है माँ।“
इसके बाद माँ, नीलेश और निधि के साथ रितेश को स्टेशन तक छोड़ने आईं। मिस्टर आनंद स्टेशन नहीं पहुंचे। उनके स्टेशन न पहुँचने से मिसेज आनंद को बहुत बुरा लगा। कभी वह रितेश के चेहरे को देखती तो कभी प्लेटफॉर्म के फर्श पर आँखें गढ़ाए कुछ सोचने लग जाती। नीलेश और निधि दूसरे प्लेटफॉर्म पर यात्रियों की चहल-पहल और गाड़ियों को आता-जाता देखकर आनंदित थे।
काठगोदाम एक्सप्रेस आ गयी थी। रितेश के डिब्बे में सवार होते ही तीनों की आँखें नम हो गयी थीं। रितेश मुस्कुराते हुए माँ और भाई बहन का अभिवादन स्वीकार कर रहा था। गाड़ी ने सीटी दे दी थी। माँ ने फिर एक बार रुंधे स्वर में कहा “बेटा मन लगाकर पढ़ना। फेल मत हो जाना।“
“अच्छा माँ।“
गाड़ी ने प्लेटफॉर्म छोड़ दिया था।
दस दिन बाद निधि और नीलेश को भी जाना था।
         जुलाई में स्कूल खुल गया। अनेक छात्र स्कूल छोड़ गए थे। रितेश को प्रमोशन मिल गया था। सभी विषयों में फेल होने के बाद भी उसे क्लास दस में प्रोन्नत कर दिया गया था। उसको पुनः स्कूल में अपने साथ पाकर दीवान और सन्देश बहुत खुश थे। तमाम ऐसे छात्र थे जिन्हें रितेश का प्रमोशन ठीक नहीं लग रहा था। कुछ अध्यापकों को भी रितेश का दसवीं कक्षा में आना पच नहीं रहा था। लेकिन कोई कुछ कर नहीं सकता था। सब जानते थे कि रितेश के पिता और स्कूल के प्राचार्य में बहुत घनिष्टता है। इस घनिष्टता का सीधा-सीधा लाभ रितेश को मिल रहा था।
कई अवसरों पर अध्यापकों ने प्रिंसिपल साहब से कहा था कि रितेश को इस प्रकार प्रमोशन देते रहने से एक तो दूसरे छात्रों में गलत संदेश जायेगा, अध्यापकों का मनोबल गिरेगा और रितेश बिगड़ता जायेगा। लेकिन प्रिंसिपल साहब का एक ही तर्क था, “रितेश प्रखर है, उसका संवेदनशील मन कहीं आहत हुआ है, जो वह ऐसा हो गया है। यदि उसे प्रमोशन नहीं दिया गया तो उसका मन पढ़ाई से उचट जायेगा। ऐसे एक दिन जरूर आएगा जब उसकी आहत संवेदनशीलता सहज हो जाएगी। वह पढ़ लिखकर अपने परिवार और समाज के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत कर सकेगा। किसी भी ईश्वर पुत्र के लिए हमें दया के द्वार बंद नहीं करने चाहिए।“ प्रिंसिपल के इन तर्कों के समक्ष सभी मौन हो जाया करते थे।
इस बार भी रितेश को प्रमोशन दिए जाने के पक्ष पर स्कूल के शिक्षकों ने विरोध जताया था। लेकिन गत वर्षों की भाँति अंत में सभी को प्रिंसिपल के निर्णय को एकमत से स्वीकार करना पड़ा।
प्रिंसिपल ने रितेश को सज़ा के तौर पर उसके पुराने रूम मेट्स को उससे अलग कर दिया। दीवान सिंह और सन्देश दोनों को अलग अलग कमरे दे दिए गए। दो फिसड्डी छात्र महेश और मानसिंह को रितेश के रूम में रहने के लिए कहा गया। रितेश को यह बर्दाश्त नहीं था।
         कुछ दिनों बाद उसने अपने दोनों नए रूम पार्टनर्स को एक दिन धमकाया।
“सुनो जैसे भी हो मेरे रूम से निकल जाओ”
“हम कहाँ जाए रितेश भाई?”
“यह उस खड़ूस से पूछो, जिसने तुम दोनों को मेरा रूम पार्टनर बनाया है।“
“हम प्रिंसिपल सर से क्या कहें?”
“कह दो, सर हम रितेश के साथ नहीं रह पाएंगे।“
“अगर सर ने पूछा, क्यों नहीं रह सकते?, तो हम क्या बताएँगे?”
“यह सब मैं नहीं जानता। तुम क्या बहाना बनाओगे यह मेरा सिर दर्द नहीं है। तुमलोग तीन दिन में मेरे कमरे से दफ़ा हो जाओ वरना एक-एल की भूर्ती बना दूँगा। समझे?”
महेश और मानसिंह घबरा गए। वह सीधे हॉस्टल वार्डन से मिले। वार्डन से उन्होंने बताया कि वह रात में देर तक पढ़ना चाहते हैं। रितेश जल्दी सो जाता है, वह प्रकाश में सो नहीं पता है। वह लाइट बंद करने को कहता है। ऐसे में उनकी पढ़ाई नहीं हो पा रही है इसलिए उन्हें कोई दूसरा रूम दे दिया जाए। वार्डन ने उनका रूम बदल दिया। रितेश के रूम पार्टनर के रूप में किन्हीं नए छात्रों को भेज दिया।
यह रितेश के लिए नयी मुसीबत थी। वह वार्डन से कैसे कहे कि दीवान सिंह और सन्देश को ही उसका रूम पार्टनर बनाया जाए। वह वार्डन के पास गया और बोला-“सर मेरा यह फाइनल ईयर है। आप जानते हैं मैं पढ़ाई में कितना कमजोर हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरे रूम में दीवान सिंह और सन्देश को एडजस्ट कर दिया जाए। मैं उनके साथ अपनी पढ़ाई ठीक से कर सकूंगा।“
“ओके। अगर तुम अपने पुराने साथियों के साथ रहकर पढ़ाई कर सकते हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। कल से तुम्हारे रूम में दीवान सिंह और सन्देश रहेंगे। कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए।“
“ठीक है सर।“
रितेश बहुत खुश था। उसके मन की मुराद पूरी हो गयी थी।
अगले दिन सुबह दीवान सिंह और सन्देश अपना सामान लेकर रितेश के रूम के बाहर खड़े थे।
“अबे दरवाजा खोल।“
“कौन है?”
“बाहर निकल कर देख।“
रितेश ने कमरे का दरवाजा खोला। दोनों पुराने दोस्तों को सामने खड़ा देखकर ख़ुशी से उछल पड़ा।
“क्या बात है?” कहते-कहते रितेश ने दोनों को गले से लगा लिया।
“अबे छोड़। पूछता है क्या बात है? बात तो यह कि हम तेरे लिए बलि का बकरा बन गए हैं। अब खुश हो।“
“ओए बकवास बंद कर। सामान अंदर रख। अपने मिने का जश्न तो मनाना ही होगा।“
“जश्न क्या खाक मनेगा। हमें एक तरफ तेरी मोहब्बत और दूसरी तरफ पढ़ाई का भूत परेशान किए है। देखो क्या होगा?” दीवान सिंह ने बड़ी मायूसी से कहा।
“दीवान रो मत। काम कर। महेश और मानसिंह का सामान उनके नए रूम तक पहुँचा कर आ।“
“अबे क्या मैं कुली हूँ। वह खुद ले जाएँगे। क्यों महेश।“
“हाँ भइया। चल मानसिंह बिस्तर समेट।“
कुछ ही पलों में चारों ने मिलकर महेश और मानसिंह का सामान बाँध दिया और सामान सहित दोनों को उनके नए रूम तक छोड़ भी आए। वापस आकर दीवान ने गंभीर होते हुए कहा।
“रितेश। देख तेरे कहने से हम दोनों तेरे साथ रहने का गए हैं। लेकिन याद रखियो यह फाइनल ईयर है। पढ़ाई में डिस्टर्ब न करियो। तुझे तो डिब्बा गोल होने की चिंता है नहीं। लेकिन मेरे लिए अच्छे नम्बरों में पास होना बहुत जरूरी है।“
“ओए दीवान। तू बहक क्यों रहा है। मैंने कब तुझे पढ़ने से रोका है। तू खुद ही न पढ़े तो मैं क्या करूँ?”
“डिब्बा गोल होने की बात मत कर। किसी का डिब्बा गोल नहीं होगा। जिनका डिब्बा गोल होगा वह रोएंगे।“
“ठीक है यार। मेरा मतलब केवल यह था कि इस वर्ष हम लोगों को गंभीरता से पढ़ना चाहिए।“
“यह तो है।“ सभी ने एक स्वर में कहा और कमरे में अपनी-अपनी चीजों को किनारे से रखने लगे।
          कुछ दिन बाद प्रिंसिपल सर ने रितेश को ऑफिस में बुलाया।
“बेटा बैठो।“
“सर थैंक यू”
“देखो तुम्हें मालूम है कि कक्षा छः से लेकर कक्षा नौ तक तुम हमेशा फ़ेल होते रहो हो। किसी भी विषय में तुम पास नहीं हुए। हर वर्ष एक अच्छे क्रिकेट खिलाड़ी की तरह छक्के मारते रहे। मैं तुम्हें शिक्षकों के विरोध के बाद भी प्रमोशन देता चला गया। जानते हो क्यों? सिर्फ इसलिए कि तुम्हारे पिताजी बहुत सज्जन और “गॉड फियरिंग” व्यक्ति हैं। मैं उनकी बहुत इज्ज़त करता हूँ। मैं नहीं चाहता कि उनका दिल टूटे। दूसरे मैं यह भी सोचता था कि एक न एक दिन शायद तुम सुधर जाओगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तुमने स्वयं को नहीं सुधारा। तुम्हें मालूम है कि दसवीं कक्षा की परीक्षा बोर्ड कराता है। यहाँ मैं तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकूंगा। अगर तुम पास नहीं हुए तो तुम्हारा यह साल बेकार चला जाएगा। क्या तुम अनपढ़ रहकर अपने पिता की प्रतिष्ठा को बढ़ा सकोगे?”
रितेश कुछ नहीं बोला। गंभीर अवश्य दिख रहा था। मन ही मन प्रिंसिपल की बातों का उपहास उड़ा रहा था।
“कुछ बोलो” प्रिंसिपल सर ने टोका।
“जी पढ़ूंगा।“
“पढ़ूंगा नहीं, मुझे यह भी बताओ कि कैसे पढ़ोगे?”
“जी।“
“कल सोचकर बताना। जाओ क्लास में।“
रितेश प्रिंसिपल ऑफिस से उठकर सीधे हॉस्टल आ गया। वह क्लास में नहीं गया। रात में उसने दीवान सिंह और सन्देश के साथ जी भर के प्रिंसिपल की नसीहतों की खिल्ली उड़ाई।
“तूने प्रिंसिपल सर को सही-सही क्यों नहीं बताया कि तेरा मन पढ़ाई में क्यों नहीं लगता?” दीवान ने पूछा।
“क्या लाभ?”
“सर कोई एक्शन ले सकते हैं।“
“किसी टीचर के खिलाफ आज तक कोई एक्शन हुआ है? मोटी साइलेस ने उसदिन मेरे छोटे भाई को कितना मारा था। गुस्से से जब मैंने मोटी के हाथ से फुटा छीन कर तोड़ दिया था तो सज़ा किसे मिली थी? मुझे। मोटी का कुछ नहीं हुआ। यह था सर का एक्शन। मैं किसी एक्शन पर विश्वास नहीं करता।“
“तो तू सर को अपनी कठिनाई बताने नहीं जाएगा?”
“नहीं। वह दिन कभी नहीं आएगा जब मुझे प्रिंसिपल सर से अपनी कठिनाई बताने जाना पड़े।“
           रितेश ने प्रिंसिपल सर को अपनी पढ़ाई संबंधी कठिनाइयाँ नहीं बताई। उसकी शरारतें बढ़ती रहीं। स्कूल से भाग जाना। स्कूल समय में पिक्चर देखना। गुटबंदी करना। आपस में मारपीट करना, सभी कुछ बढ़ता जा रहा था। हर पंद्रह-बीस दिन पर प्रिंसिपल उसकी रिपोर्ट घर भेजते रहे। पिताजी समझाते रहे। लेकिन वह चिकना घड़ा था। उसपर किसी बात का कोई असर नहीं था। उसमें कोई भी बदलाव नहीं आया।
वक़्त कैसे गुज़र गया, पता नहीं, हाईस्कूल की परीक्षाएँ भी हो गयीं। हॉस्टल के सब संगी-साथी अपने-अपने घर को वापस हो गए। रिज़ल्ट आने के पश्चात किसी को उस स्कूल में दोबारा नहीं आना था। पास होने वाले छात्रों के लिए इंटरमीडिएट शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी और फेल छात्रों को दाखिला मिलता नहीं था। सभी एक दूसरे से जुदा होने को थे।
“रितेश तुम यहाँ रुकोगे कि चले जाओगे?”, दीवान ने पूछा।
“मैं यहाँ रुक कर क्या करूँगा?”
“नीलेश और निधि कैसे जाएंगे?”
“जूनियर और सीनियर सेशन आगे पीछे चलते हैं। वह मेरे साथ कैसे आ जा सकते हैं? उन्हें तो पिताजी ही छोड़ने और लेने आते रहे हैं। वह बाद में ही जाएंगे।“
“ओके।“
स्कूली जीवन के प्रथम पड़ाव का अंतिम दिन था। सभी मायूस थे। कुछ ऐसे भी थे जिन्हें न मायूसी थी और न ख़ुशी। फिर भी उनकी आँखों में भविष्य का एक सुनहरा सपना तिर रहा था। वह स्कूल से कॉलेज में प्रवेश लेंगे। नए दोस्त, नया समाज, नई चुहुलबाजियाँ। सभी कुछ नया होगा। उसके बाद जीवन का तीसरा पड़ाव शुरू होगा- घर होगा, पत्नी होगी, बच्चे होंगे। काम-धंधा होगा। सुबह से शाम घर को सँवारने में बीत जाएगा वक़्त। कुछ समय बाद फिर वही इतिहास दोहराया जाएगा। हमेशा दोहराया जाता रहेगा।
           रितेश घर वापस आ गया था। उसके घर आने पर पिताजी कितना प्रसन्न थे उसे नहीं पता, किन्तु माँ का वात्सल्य प्रेम उमड़ रहा था।
“बेटा पेपर कैसे हुए?”
“माँ इस बार अच्छे हुए हैं। पास हो जाऊंगा।“
“तू थर्ड डिविज़न ही पास हो जा। किसी तरह बस पास हो जा। भगवान् हमारी लाज रख ले।“
“अरे माँ फर्स्ट नहीं पर सेकण्ड डिविज़न ज़रूर आ जाऊँगा।“
“बहुत अच्छी बात है बेटा। और सुन अब छुट्टियों में कुछ अच्छी पुस्तकें पढ़ जिससे तेरा सामान्य ज्ञान बढ़ सके और तू खुराफातों में न लग जाए। जानता है खाली दिमाग शैतान का घर। कुछ दिन में निधि और नीलेश भी आ जाएंगे। एक माह रहेंगे। उन दोनों को भी पढ़ा देना।“
“ठीक है माँ।“
लेकिन शीघ्र ही रितेश माँ की नसीहतों को भुला बैठा। सुबह से शाम तक आवारा कि तरह घर से बाहर रहना। गुटबंदी करना, मारपीट करना, उसकी रोज़ की दिनचर्या हो गयी थी। उसकी शरारतों और बेबाक स्वाभाव के कारण उसके आस-पड़ोस के अनेक लड़के और लड़कियाँ उससे मित्रता करने को आतुर रहने लगे थे। लेकिन उसे अपने आवारा दोस्तों के समक्ष सभी कुछ निरर्थक लगता था। उसकी शरारतों और शिकायतों से माँ और पिताजी बहुत परेशान रहने लगे थे। पिताजी ने तो बहुत पहले से ही उसे कोई नसीहत देना बंद कर दिया था। वह उससे बात तक नहीं करते थे। अब माँ भी रितेश से हार गई थी। उन्होंने भी उससे बातचीत करना कम कर दिया था।
निधि व नीलेश भी हॉस्टल से घर आ गए थे। पहले की भाँति माँ ही उनको किचन में पढ़ाती रही। रितेश ने उन्हें पढ़ाने में कोई रूचि नहीं दिखाई। वह पूरी तरह से आज़ाद था। जब उसका मन करता वह सोकर उठता। जहाँ मन होता, वह चला जाता। उसका घर में खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं था। माँ भी उसकी प्रतीक्षा खाने पर नहीं करती थी। अक्सर ऐसा होता कि वह दिन-भर कुछ नहीं खाता। बाहर दोस्तों के साथ जो मिल जाता खा लिया करता था।
दिन कटते जा रहे थे। रिज़ल्ट निकाने का दिन क़रीब था। रितेश को रिज़ल्ट की कोई फ़िक्र नहीं थी। उसके साथी या तो उससे निचली कक्षा के थे या फिर वह थे जो सात या आठ दर्जा फेल होने के बाद पढ़ाई छोड़ चुके थे। उन सबके पास एक ही काम था- गुटबंदी करना और अपनी ताकत का झंडा फहराना।
            जिसदिन हाईस्कूल का परिणाम घोषित हुआ रितेश घर के सामने वाले मैदान में बेफिक्री के साथ गुटबंदी के झगड़ों में लाठियाँ भाँज रहा था। घर में माँ, नीलेश और निधि अख़बार में उसका रोल नंबर ढूँढ़ रहे थे। वह फेल हो गया था। घर में उदासी छा गई थी। पास-पड़ोस के लोग और मिस्टर आनंद के मित्र रितेश के परीक्षा परिणाम की जानकारी करने घर आ रहे थे। मिस्टर आनंद सबको एक ही बात कह रहे थे,” वह हाथ से निकल गया है, अब नहीं पढ़ेगा। भगवान् ही उसका मालिक है।“ इसके आगे सब ख़ामोश हो जाते और मिस्टर आनंद को ढांढस बंधाते कि वह धैर्य रखें। रितेश अवश्य सुधरेगा। माँ को भी यही विश्वास था।
आने वालों का ताँता ख़त्म हो गया था। देर रात तक रितेश घर नहीं आया। उसको यह भी नहीं पता था कि उसका परीक्षा परिणाम क्या रहा? घर में क्या माहौल था? प्रतिदिन की भांति रात दस बजे के बाद घर आया। तब तक सभी सो चुके थे। दरवाज़े बंद थे। उसने दरवाज़े पर दस्तक नहीं दी। बाहर बरामदे में पड़े बेंत के सोफे पर सो गया।
कब सुबह हो गई उसे पता नहीं चला। वह सोता रहा। मिस्टर आनंद ठीक समय पर ऑफिस चले गए। उन्होंने रितेश को बाहर सोते हुए देखा, वह कुछ नहीं बोले। उसे नहीं जगाया।
दस बजे रितेश की निद्रा टूटी। दरवाज़ा खुला देखकर वह घर में गया।
“माँ।“
“क्या है? तुम कब आए?”
“दस बजे आ गया था।“
“कहाँ थे?”
“दरवाज़ा बंद हो गया था तो बाहर ही सो गया था।“
“रितेश तुझे मालूम है?”
“क्या”
“तुम फेल हो गए हो।“
“हाँ।“
“क्या करोगे?”
“फिर से पढ़ूंगा।“
माँ ख़ामोश हो गई थी। उठकर रसोई में चली गई थी। नाश्ता ख़त्म करके वह भी उठा और सीधे बाहर चला गया। सुबह का गया फिर वह रात को ही घर लौटा। हल्के से दरवाज़ा खटखटाया, किसी ने नहीं खोला। वह बाहर बरामदे में बैठे-बैठे सो गया।
एक महीने तक घर में उससे किसी ने न कुछ पूछा और न ही उसने घर में किसी से पढ़ाई के बारे में कोई बात की।
जुलाई आते पिताजी ने पूछा-“क्या इरादा है?”
“कहीं भर्ती करा दीजिये।“
“फेल छात्र को कहीं जगह नहीं मिलेगी।“
“प्राइवेट पढ़ लूँगा।“
पिताजी कुछ नहीं बोले। अपने एक मातहत से कहकर एक प्राइवेट स्कूल के छात्र के रूप में उसे भेजने का प्रबंध करा दिया बस।
           रितेश को अपने फेल होने का कोई अफ़सोस नहीं था। दीवान सिंह पंजाब चला गया था, सन्देश बंगाल चला गया था और मुकुल अपने घर जयपुर चला गया था। सभी को अच्छे स्कूल में दाखिला मिल चुका था।
रितेश के दाखिले के लिए कोई स्कूल नहीं था। उसे घर पर रहकर प्राइवेट दसवीं कक्षा पास करनी थी। लेकिन घर में सभी जानते थे कि यदि उसे दिनभर स्कूल नहीं भेजा गया तो उसकी पढ़ाई नहीं हो सकेगी और उसकी आवारा सांगत बढ़ जाएगी।
“मैं तुमसे कहती हूँ जैसा भी है बेटा तो अपना ही है। जरूर हम लोगों से उसके लालन-पालन में कुछ भूल-चूक हुई है जो उसका मन पढ़ने में नहीं लगा। अब जैसे भी हो उसे किसी भी स्कूल में भेजने का प्रयास कर दो नहीं तो यह बिलकुल हाथ से निकल जाएगा।“
“निकल जाए साला। पढ़ेगा तो अपने लिए, नहीं पढ़ेगा तो अपने लिए।
अपनी किस्मत का काटेगा और खाएगा। मैं उसके लिए अब ज्यादा जलालत नहीं उठाऊँगा।“
“शांत मन से सोचो उसको बिगाड़ने में हाथ किसका है? तुमने उसे फेल होने के कष्ट का एहसास ही नहीं होने दिया। तुम हमेशा उसको क्लास दिलाते गए। जब पहली बार वह छः विषयों में फेल हुआ था तभी अगर तुमने उसको कक्षा सात में प्रमोट न कराया होता तो शायद अपने दोस्तों के पास हो जाने से वह विचलित होता, मेहनत करता, एक साल बाद ज़रूर पास हो जाता। लेकिन तुम्हारी मदद ने उसे बिगाड़ दिया। उसमें एक ऐसा दम्भ भर दिया जिसके कारण वह यह समझ ही नहीं पाया कि तुम्हारे प्रभाव की भी कहीं सीमा है।“
“क्यों नहीं समझा वह? क्या दूध पीता बच्चा था। उसे नहीं पता कि बोर्ड परीक्षा में कोई सिफारिश नहीं चलती है?”
“नहीं उसे नहीं मालूम था। वह तो यही समझता था कि तुम उसे ऐसे ही क्लास प्रमोशन दिलाते रहोगे। मैंने जब भी सख्ती करनी चाही तो वह टके से उत्तर दिया करता था, पिताजी सब ठीक कर देंगे। फिर मेरा सख्ती करना तुमको भी कब अच्छा लगा। जब भी छुट्टियों में वह घर आता और मैं उसे सख़्ती से पढ़ने को कहती तो तुम मुझे चुप कर देते थे। तुम्हारी उदारता उसे बिगाड़ती चली गई। उसके मन में न तो किसी के प्रति भय रह गया और न किसी की अहमियत। वह पूरी तरह से आज़ाद हो गया।“
“तुम कहना क्या चाहती हो? मैंने साले से कहा कि पढ़ना मत- मैं पास करवा दूंगा। कितनी ही बार मैंने उसे डांटा, मारा और घर से निकाल देने की धमकी भी दी, लेकिन कुत्ते की दुम की तरह वह टेढ़ा का टेढ़ा ही रहा। आज भी वह उतना ही टेढ़ा है।“
“मैं कब कहती हूँ कि तुमने उसको पास कराते जाने का आश्वासन दिया? किन्तु हमेशा उसे अपने प्रभाव से प्रमोट तो करवाते गए और फिर तुमने कभी नियमित रूप से उसे पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं किया। जब तुम्हें धुन आ गयी तो उसे पढ़ाने बैठ गए। पढ़ाई में भी क्या पढ़ाया-सुलेख लिखना। सुलेख ठीक न होने पर तुमने उस पर हाथ छोड़ा, छड़ी से पीटना भी चाहा। उसे इतना उदण्ड बना दिया कि उसने तुम्हारे हाथ की छड़ी पकड़ ली। पता नहीं क्यों वह छड़ी उसने तुम पर नहीं चलाई वरना मैं कितनी आहत होती नहीं कह सकती। क्या होता उस घटना के बाद अपने घर का भविष्य?”
“पुरानी बातें मत दोहराओ। वह घर आये, उसे घुसने मत दो। जाए साला जहाँ चाहे वहाँ जाए।“
“यह कहना ही आसान है। भूल गए वह दिन जब तुमने उसे घर छोड़ने को कहा था, और वह आधी रात को घर से निकल गया था। दो दिन तक जब-तक वह नहीं मिला, तुम कितने परेशान हुए थे। न ऑफिस गए और न खाना खाया था।“
“मैं पागल हो जाऊँगा। तुम ही बताओ कम्बख़्त का क्या इलाज किया जाए?”
“एक ही इलाज है। घर के पास वाले स्कूल में यदि उसका नियमित दाखिला नहीं हो सकता है तो उसे क्लास में बैठने की अनुमति दिलवा दो। शायद वह सुधर जाए और पढ़-लिख जाए। हम लोगों की सबसे बड़ी भूल यह रही है कि हमने उससे यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर उसका पढ़ाई में मन क्यों नहीं लगता था?”
“यह भी पूछने की कोई बात थी? वह क्या कोई अजूबा पढ़ने गया था? खेल के नशे में उसने नहीं पढ़ा।“
“अगर खेल का नशा होता तो उसी में सफल होता। ऐसा भी कुछ नहीं हुआ और जो कुछ हुआ, जिस कारण से हुआ उसे न हमने जानना चाहा और न उसने समझाना चाहा। मैं माँ हूँ, मैं जानती हूँ, फेल होने पर उसकी वेदना जिसे वह शर्म के कारण कह नहीं पा रहा है। उसे अपनी भूल का एहसास भी हो गया है। अब सख्ती से पेश मत आओ। किशोर मन और भी बहक सकता है। अपने जीवन को तबाह कर सकता है।“
“तो ठीक है तुम उसे तबाही से बचा लो। मेरे लिए तो वह मर गया। मुझे उसकी जात से कोई उम्मीद नहीं बची है।“
माँ चुप हो गयी थी। गुमसुम सी रसोईघर में चली गई और रात के खाने की तैयारी में जुट गयी।
                                         क्रमशः ……..

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