चिड़िया

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एक चिड़िया चहकती
गुनगुनाती डाल पर
श्वास भर उड़ती गगन में
खुश थी अपने हाल पर
पर , खुशी का क्या ठिकाना
पल दो पल का है फ़साना ।

एक शिकारी की नजर
आकर टिकी मासूम पर
वह बेचारी बेखबर-सी
उड़ रही थी झूमकर
तीर पैना एक चला
जो हड्डियों में जा धँसा
प्राण आधे रह गए
कंठ में दाना फँसा …

हाय तूने क्या किया!
एक जिंदगी की लौ बुझा दी
दोष उसका क्या था बोलो
क्यों उसे इतनी सजा दी
क्यों उसे इतनी सजा दी…?

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