दम्भ का एक रूप …. !!!

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तुम कहते हो कि “दंभ हो जाएगा…!”
हाँ हो तो जाएगा ! इसलिए नहीं कि,
तुम कहते हो लाजवाब मुझे, कहते हो बहुत खूब हो तुम।
हाँ अच्छा लगता है…
अभिभूत हो जाती हूँ, सुनकर इन मीठे बोलों को ।
जैसे नई भोर एक आती है,पुरवैय्या रास रचाती है,
जीवनरुपी इस बगिया में कलियाँ खिल खिल उठती हैं,
भँवरे गुनगुन गाते हैं, नदिया करती अठखेलियाँ,
फूल, पंछी, मयूर, नदी, सब हो जाते सखा-सहेलियाँ,
बौरा जाती है पवन, पुलकित हो जाता है मेरा मन,
अलंकार नए बनते हैं, इंद्रधनुष फिर दिखते हैं,
ताल कहरवा लगती है, सरगम फिर छिड़ उठती है,
मन मयूर नृत्य करता है, सपने रंगीले बुनता है,
पग पग घुँघरू बजते हैं, सुर ताल सब मिलते हैं,
प्रेम माधुरी घुलती है, मृदु करती हर कोने को,
रस श्रृंगार सम करती है जीवन के हर एक छंदों को,
मज़बूत करती एक विश्वास को, अपनेपन के एहसास को,
एहसास; जीवन के सुनहरे सपनो का, हरदम साथ कुछ अपनों का।
स्वीकार्य है तुम्हारा ये अभिकथन कि “दम्भ हो जाएगा…!”
हाँ…!
मान तुम्हारे साथ का,अभिमान तुम्हारे प्यार का ।
यह स्वप्न नहीं सच्चाई है, प्रेम की गहराई है ।
उन चीजों का नहीं मोल, जो अहम् भाव को जन्म दे,
‘स्व’भाव जो जोड़ दे, स्नेह बंधन को तोड़ दे ।
प्रेम और समर्पण है मेरा तुम्हारे लिए, मैं नहीं होउंगी पीछे…
जो कोशिश की, तो तुम थाम लेना हाथ; कर लेना पास,
उसी मान के साथ, प्यार भरे अभिमान के साथ ।
जीवन में फिर होगी नयी भोर, बिखरेंगे नए रंग,
देखेंगे सुनहरे सपने एक बार फिर से, प्रियतम मिलकर हम तुम संंग…

            ~ प्राची द्विवेदी ~

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