स्वार्थ

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फारसी की एक कहानी है। एक दिन एक उल्लू किसी दूसरे उल्लू के शहर में अपनी लड़की की सगाई करने गया। भोजन के बाद जब दोनों उल्लू सगाई की शर्तें तय करने लगे तो सवाल दहेज का आ गया। पहले तो काफी सौदेबाजी और आनाकानी चली। मगर बाद में लड़की वाला उल्लू हौसले के साथ बोला कि देखो भई, जहाँ तक दहेज का सवाल है, खुदा की मेरे ऊपर ख़ास महेरबानी है, तुम्हारी शर्त का मैं अपमान नहीं करूँगा। जंगल का जितना बड़ा राज्य तुम्हारा है, उसका दस गुना मैं तुम्हें देने को तैयार हूँ। वीराने की हमारे यहाँ कमी नहीं है। अल्लाहताला, सुल्तान महमूद को सलामत रखे। जिधर उसकी फ़ौज निकल जाती है, उधर वीरानी ही वीरानी नजर आने लगती है । हमारा सुल्तान वीराने का सबसे बड़ा बादशाह है। सो, दहेज की परवाह मत करो। तुम्हें मनमानी वीरानगी जहाँ चाहोगे मैं दे दूँगा।

लड़के वाले उल्लू की बांछें खिल गईं, बोला- सच में तुम बड़े भाग्यशाली हो और तुम्हारा बादशाह दरअसल बरगद के काबिल है। इधर हमारे सुल्तान को देखो कि कब्रिस्तान में भी हमें चैन से नहीं बैठने देता, जब देखो तब कोई न कोई जलसे यहाँ किया करता है। भैया, बस अब लड़की को अपना ही समझो। सगाई की रस्म पूरी करो। जहाँ ज्यादा परेशानी हुई तो हम लोग भी वहाँ आ जायेंगे। एक कहानी तैमूर लंग के शाशनकाल की है। तैमूर लंग ने भी अपने नरसंहार में सुलतान महमूद गजनबी को मात करने की कोशिश की है। एक हमले के दौरान तैमूर ने एक शहर में कहते हैं कि कुत्ते-बिल्लियों को भी जीता नहीं छोड़ा। सड़कें खून की नालियाँ बन गईं और आसमान मुर्दों की सड़ांध और घायलों के आर्तनाद से साक्षात नरक का जवाब बन गया। ईरानी कवी मुश्तरी ने इसे कथाबद्ध करते हुए लिखा है कि सुलतान तैमूर को धन्यवाद देने और उसकी लम्बी ज़िन्दगी के लिए प्रार्थना करने के लिए गिद्धों ने तैमूर को इतिहास का सबसे बड़ा बादशाह करार दिया। कई दिनों तक गिद्धों की दावतें होती रहीं और दूर-दूर से गिद्धों के कारवाँ निमंत्रण पर आये और ऐसा दुर्लभ भोजन पाकर सबने एक स्वर से भगवान से दुआएँ माँगी।

हे भगवान तेरे घर में देर है, अंधेर नहीं। तू सबकी सुनता है। लेकिन दुःख है, तू गिद्धों की प्रार्थना देर से सुनता है। इंसानों की प्रार्थना न जाने क्यों जल्दी सुनता है। पता नहीं तैमूर लंग जैसा दानवीर तेरे आवे से धरती पर कब आएगा।
तैमूर लंग के ज़माने में व्यक्त गिद्धों के ये शिकवे और शिकायतें, लगता है भगवान से ज्यादा दिन तक बरदाश्त नहीं हुए और उन्होंने नादिरशाह, हिटलर के रूप में कई तैमूर लंग इस धरती पर भेजे। भगवान किसी को निराश नहीं करता, सबकी सुनता है। सन्त लोग गलत थोड़े ही कह गए हैं- ‘राम झरोखे बैठ कर सबका मुजरा लेय, जिसकी जैसी चाकरी तिसको तैसा देय।’ फिर भगवान तो निर्विकार है, कर्मफल उन्हें लगता नहीं है। गीता में कहा है-

न मां कर्माणि लिम्पति
न में कर्मफले स्पृहा।

किन्तु गिद्धों के ये भोज आज के जगत की इंसानियत अंधी, बहरी होकर देखती रहे, सुनती रहे और सहती रहे, इसे तो इंसानियत की मौत ही कहनी चाहिए। क्या सचमुच, इंसान की इंसानियत आज मर गई? एक बार आइंस्टीन से यही सवाल उन यहूदी काफिलों ने पूछा था जो हिटलर के कुम्भीपाक से बचकर भाग निकले थे। आइंस्टीन ने ग्रीक फिलास्फर युरिपडीज के इस स्वर्ण सूत्र को दोहराते हुए कहा था कि इंसानियत मरती नहीं है, अपने ही विष में मूर्च्छित रहती है, किन्तु जब किसी की दुर्बुद्धि उसे कुचलने लगती है तो चैतन्य उसमें प्रकट होता है। उसके सामने कोई भी आतताई भस्म हुए बिना नहीं रहता। आज भी इंसानियत मरी नहीं है।

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