*** स्व-अभिज्ञता ***

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स्व-अभिज्ञता (self consciousness) के कारण अनेक लोग जीवन में अपेक्षाओं के अनुरूप उन्नति नहीं कर पाते हैं। स्व-अभिज्ञता के कारण वह स्वभाव से झेंपू, जिह्वाबन्ध और अनिश्चयी हो जाते हैं ।
अपने व्यक्तित्व के इन दोषों के कारण वह अपना आत्मविश्वास खो देते हैं। वह स्वयं को दूसरों की अपेक्षा हीन समझने लगते हैं। वह अंतर्मुखी हो जाते हैं। जग और समाज से कट जाते हैं। अपनी बात भी वह दूसरों से नहीं कह पाते हैं। यही नहीं वह अपना आधे से अधिक समय यह सोचने में नष्ट कर देते हैं कि लोगों की धारणा उनके बारे में क्या है। लोग उनके विषय में क्या सोचते हैं? उनकी क्या आलोचना करते हैं ? उनके पास यह सोचने का समय नहीं रह जाता कि उनके जीवन का लक्ष्य क्या है? वह लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? वह अपने जीवन और उसकी उन्नति के सबंध में दूसरों की टिप्पणियाँ तथा दूसरों की दृष्टि में उनका स्थान।
जीवन में उन्नति पथ पर अग्रसर होने के लिए आवश्यक है कि झेंपूपन और स्व- अभिज्ञता के शिकार अपने इन दोषों से ऊपर उठें। वह अपनी रुचियों के दायरे बढ़ाएं। अपने निर्दिष्ट लक्ष्य को पहचाने। उसकी प्राप्ति के लिए वांछित दिशा में आगे बढ़े।
जितना अधिक रुचियों का दायरा बढ़ेगा उतना ही झेंपूपन काम होगा। उनके अंदर का ‘स्व’ जागेगा। वह अंतर्मुखी से बहिर्मुखी हो सकेंगे। वह अपनी बात दूसरों से कह सकेंगे। अपने लक्ष्य को पहचानने में भी उन्हें कठिनाई नहीं होगी। एक बार लक्ष्य निर्धारित हो जाने के बाद, उन्नति के मार्ग में जो व्यवधान बड़ी कठिनाईयों से प्रतीत होते थे अब सिमट जाएंगे। कठिनाइयों की भावना स्वतः लुप्त हो जायेगी। उन्नति के रास्ते खुलते चले जायेंगे।
व्यक्ति को स्व-अभिज्ञता से ऊपर उठना होगा। क्योंकि स्व-अभिज्ञ व्यक्ति के पास लक्ष्य नहीं होता। वह सदा अनुत्पादक एवं अलाभकारी विचारों के मंथन में फँसा रहता है। भटकता रहता है। शनैः शनैः वह स्व-सहानुभूति का पात्र बन जाता है। अपने मूल लक्ष्य से भटक जाता है।
स्व-अभिज्ञता से ऊपर उठा व्यक्ति आशावादिता की प्रतिमूर्ति होता है। वह अपने लक्ष्य को भेदने के लिए अपने चारों ओर की परिस्थितियों के प्रति सहृदय हो जाता है। यह परिस्थितियाँ उसकी उन्नति का मार्ग खोलती हैं

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