*** यादें ***

470

काश ! मैं फिर , बच्चा हो जाऊं
थोड़ा-सा बुद्धू , दिल का सच्चा हो जाऊं
काश ! मैं फिर , बच्चा हो जाऊं….
बचपन में मुझे कोई चिंता न सताती थी
बेफिक्र था मन , हर बात मुझे भाती थी
मानो मुसीबतें भी मुझ पर प्यार जताती थी
य कहूं , भोले मन को वो समझ न आती थी
काश! मैं फिर , उस भोलेपन में खो जाऊं
काश! मैं फिर , बच्चा हो जाऊं
काश! मैं फिर , बच्चा हो जाऊं….
याद आती हैं मुझे
बचपन की वो घड़ियां
वो हंसना वो रोना
वो आंगन की फुलझड़ियाँ
वो सूरज की लाली
वो नदियों का कल-कल
वो फूलों की डाली
वो गलियों की हल-चल
वो बागों के जामुन
वो बाबा की डांट
वो दादी की लोरी
वो ठेले की चाट
वो मिट्टी के बर्तन
वो बोली में राग
वो परियों की बातें
वो होली में फाग
वो सावन के झूले
वो रिमझिम फुहार
वो कोयल की कूं-कूं
वो माँ का दुलार
काश! मैं फिर , माँ के पल्लू में सो जाऊं
काश ! मैं फिर , बच्चा हो जाऊं
थोड़ा-सा बुद्धू दिल का सच्चा हो जाऊं
काश! मैं फिर , बच्चा हो जाऊं….

~ मोहिनी तिवारी  ~

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here