🔹याद मुझको आ रही है….🔹

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आज कुछ बदला है जीवन ,
कुछ तो कहता है मेरा मन ।
आँख में कंटक चुभा है ,
रात्रि में कैसी विभा है ।
कुछ गलत तो हो रहा है ,
कुछ अपरिचित खो रहा है ।
तन क्यों भारी लग रहा है…!
यूं हृदय क्यों रो रहा है ?
घर कि मेरा स्वप्न है जो,
क्यों नजर से दूर है वो ?

माँ कि मेरा जो सहारा ,
नाव को जैसे किनारा ।
माँ मेरी भोली-बहादुर ,
दृढ़व्रती पर मोम-सा उर ।
पतझड़ो से खींच लाई ,
जंगलों में सींच लाई ।
माँ मुझे है याद आती ,
जैसे चंदन की हो पाती ।
याद मुझको आ रही है ,
कुछ अधिक ही आ रही है…..

पिता मेरे वृद्ध है अब ,
जानते हैं राज वे सब ।
हैं हितैषी क्रोध में भी ,
हैं खड़े अवरोध में भी ।
पिता जिनकी प्रेम भाषा ,
दे रही जीवन को आशा ।
याद मुझको आ रही है ,
कुछ अधिक ही आ रही है ।
नेह की बदली छा रही है ,
याद मुझको आ रही है…..

मेरे छोटे भाई-बहन ,
हँसते-रोते भाई-बहन ,
उन पलों का क्या ही कहना ,
जैसे सावन का हो महीना ।
प्रेम की बौछार बनकर ,
चाँदनी-सा रुप धरकर ,
याद मुझको आ रही है ,
कुछ अधिक ही आ रही है…..

ओ सुनो मदमस्त पवनें ,
जोकि मेरे घर को जाना ,
सबको सब अच्छा बताना ,
सबसे कहना ठीक हूँ मैं ,
नाचती हूँ, घूमती हूँ, मैं प्रफुल्लित झूमती हूँ ।
ये न कहना मैं दुखी हूँ ,
टूटकर खुद से रूकी हूँ ,
मेरा रोना तुम न कहना ,
बन के जड़ खामोश रहना ।

और सुन लो चाँद-तारे ,
जोकि घर तुमको निहारे ।
तुम भी उसको देख लेना ,
सिर झुकाकर टेक लेना ।
घर कि मुझसे दूर है जो ,
हर खुशी का पूर है जो ।
याद मुझको आ रही है ,
कुछ अधिक ही आ रही है ,
नेह की बदली छा रही है ,
याद मुझको आ रही है ,
याद मुझको आ रही है…….

~  मोहिनी तिवारी ~

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