व्यथा

597

जो हैं बेबस , लाचार , विकल
दिखता नहीं जिनके दुःखों का हल
मिलती नहीं जिन्हें भरपेट रोटी
खुशियाँ जिनकी तिनकों-सी छोटी
जो लहू भरे पगों से गिरते-पड़ते जा रहे हैं
जीवन जीना है तो आगे बढ़ते जा रहे है
उन लोगों को हम मजदूर कहते हैं
जो हर दिन हारे , मजबूर रहते हैं।

कहने में तो वे आदरणीय , मेहनती , सृजन के सिपाही हैं
पर , यह बात केवल शब्दों में आई है
यदि होता उनका कोई भी मान ,
यूं न जाती सैकड़ों की जान
जिंदगी उनकी इतनी सस्ती न होती
मँझधार में डूबी उनकी कश्ती न होती
बच्चे उनके न घर को तरसते
आंधी औ’ शोले न उन पर बरसते
हृदय उनका इतना ज़ख्मी न होता
उनका कुटुम्ब भी निश्चिंत सोता
उनका कुटुम्ब भी निश्चिंत सोता..।

  • मोहिनी तिवारी

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here