मां का आचल

783

मां का आचल था
मेलों से भरा था
सीने से लगा के रखा था
जिससे आती है महक
मेरे मां की प्यार की दुलार की
उस आंचल को पकड़कर
मेने चलना है सीखा
घुटनों में रेद्धकर
मां के आंचल को भेदकर
मेने सीखा है चलना
मां का एक आंचल था
जिसे पकड़ने का हमेशा
एक बहाना था
मां के आंचल में
महक थी मेरे माठी की
जिसकी महक से
याद आती थी मेरे बचपन की

मां के आंचल ने है मुझे बचाया
धूप से छांव से
शैतानी भरी निगाहों से
अंधेरे के इस गांव से
आंचल ने है मुझे संवारा
मां के आंचल से
महक आती है अपनों की
जो इस दुनिया में
मिले न अपनों से
मां का आंचल था
जो लूं और पसीने की
गंध से भरा था
उस आंचल के छांव में
दुनिया के दिये धावों से
मुझे है संवारा
मां का आंचल था
जो खुशियों से भरा था।

=>मंजु नायर 

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here