कविताएं – आधुनिक परिवेश और बदलते सामाजिक तत्व

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Pooja Prashar

समय के साथ जहाँ परिस्थितियाँ बदलती हैं, वहीं व्यक्ति की सोच भी एक नया रूप ले लेती है। ऐसी ही नई सोच के साथ सामाजिक व्यवस्था और यथार्थ को जी.पी. वर्मा जी ने अपनी कविताओं के माध्यम से अपने मनोभावों को बहुत ही सहज एवं सरल भाषा मेंप्रत्यक्ष किया है।

बँटा रहेगा शिक्षक” कविता के माध्यम से कवि ने शिक्षक के बदलते रूप को दिखाने का प्रयास किया है। जब तकशिक्षक, जाति, वेतन, व्यवसाय और स्वार्थ के वश होकर अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार नहीं होगा,वह शिक्षक दिवस और शिक्षक सम्मान के रूप से समाज को छलता रहेगा।
नारी के प्रति कृतज्ञता और उसकी शक्ति का आभास कराते हुए कवि लिखते हैं कि नारी के रहस्य को देवता भी नहीं बता पाएंगे।  जो उसे जानने का प्रयास करेगा वह सुख, संपत्ति, समृद्धि और शक्ति  का अनुभव प्राप्त करेगा-
उसका परिवेश
उसमें तिरते
चुंबकीय अणु-कण
जो किसी को भी-
कुल समर्पण से खींचते हैं-“

अब इसी पर फिदा है…” के द्वारा कवि ने ‘फेसबुक’ की महत्ता को बताया है कि एक समय जहां बोलते थे-‘ये सब कुछ बकवास है’वहीं-
फेसबुक अब
जीवन रेखा बनी है ।
……………………
घर- गृहस्ती से ज्यादा –
अब इसी पर
फिदा है।
वहीं दूसरी कविता में आपने बताया है कि जहाँ व्यक्ति के पास व्यक्ति को सुनने समझने का वक्त नहीं है, वहां “फालतू बकवास”  समझा जाने वाला ‘फेसबुक’  एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है।
तकनीकी दुनिया में व्यस्त व्यक्ति के लिए कवि ने “लिखो उंगली के सहारे” कविता द्वारा व्यक्ति के अंदर खोती संवेदनशीलता और शब्दों को गुम होते दिखाया है।

“सृष्टि की चूक या उसके किसी प्रयोग का अधूरा परिणाम -…..”
अपने आप में प्रश्न किए उत्तर के साथ-
विभु की रचना है
विभु ने भेजा है,
खुशी बांटने
खुशी भोगने नहीं,
फिर भी आज क्यों व्यक्ति पूर्ण रूप से उसे स्वीकार नहीं कर रहा ? प्रश्न लिए, कवि ने किन्नर जाति के प्रति संवेदना व्यक्त की है।

“खामोशी तोड़ो”जैसी रचना समाज के सामने एक सवाल खड़ी करती है की मां, बहन, बेटी, पत्नी, प्रेयसी और दोस्त के रूप में नारी,जहाँउसे जीवन देती है वहीं गाली देकर वह, उसका हीअपमान करता है। क्यों आज तक इस पर खामोशी है?
कवि ने आने वाले समय को चुनौतीपूर्ण बताते हुए कविता के माध्यम से आकाशवाणी की है-
सकुचाती हँसी,
संशकित-
मुस्कान…
…………..
हारती साँसे!
नए समाज की
पद ध्वनियाँ है?

‘कोरोना’ से नाराज़गी जताते हुए, प्रकृति से दूर रहने पर विवश, कवि ने अपनी आंतरिक भावनाओं को व्यक्त किया है-
खुलेपन से,
ऋतुओं से,
मित्रों से,
जुदा कर दिया –
बंदी बना दिया…..

“यादों की बस्ती…..”द्वारा कवि नेजहाँरिश्तों की गहराई और अटूट जुड़ाव को दिखाया है वहीं गुलाब के फूल द्वारा बहुत ही सुंदर ढंग से रिश्तों की खासियत और उसकी महत्ता को प्रस्तुत किया है –
खिलता है
देर से,
मशक्कत से,
कांटों में ।
……………
बिखर जाता है –
……………….
गलतफहमियों की
गर्म हवाओं से।

“दम तोड़ती, भावनाओं की दहलीज पर…कविता में आज के व्यक्ति द्वारा अपनी संवेदनशीलता और निस्वार्थ भावना को त्यागते हुए दिखाया गया है, जिसे कवि ने मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। आपने मानवता के ह्रास के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की हैl

कम से कम शब्दों में परिस्थितियों का सजीव चित्रण आँखों के सामने प्रत्यक्ष कर देना,कवि के कलम की श्रेष्ठ कला और आपके अनुभव एवं आंतरिक अनुभूति का प्रभाव है, जो पाठक की अनुभूति को भी स्पर्श करता है।

  • पूजा पाराशर (चेन्नई)

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