कोई नाम न दो…भाग-6

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तीन महीने हो गए। न वह पढ़ाने गया और न ही पढ़ाने के लिए उसे बुलावा आया। वह अपनी पुरानी दिनचर्या पर लौट चुका था। अर्चना को भी समय नहीं था कि वह उसके घर के बंद या खुले दरवाजे की जानकारी रखे।
ठीक दीपावली के दिन अर्चना ने बारामदे की सफाई करते हुए अविनाश को दरवाजे पर ताला बंद करते देखा। कुछ ही पलों में अविनाश ने अपना हैंड बैग उठाया और बाहर खड़े रिक्शे पर बैठ गया। अर्चना वृक्षों के झुरमुट से उसे देखती रही। चाह कर भी उसने नमस्ते नहीं किया। अविनाश उसकी निगाहों से ओझल हो गया। उसके बाद अगले कई महीनों तक वह उसके दरवाजे पर लटके ताले के खुलने की प्रतीक्षा करती रही, लेकिन वह कभी न खुला।
एक तो आस-पड़ोस में ऐसा कोई नहीं था जो अविनाश के बारे में कुछ बता सकता और न ही अर्चना ने उसके संबंध में किसी से कुछ पूछने की हिम्मत ही जुटाई।
एक दिन मिसिर जी ने पूछा,”अरे अर्चू आजकल अविनाश नहीं दिखाई पड़ते हैं, क्या कहीं चले गए हैं?”
“जी बाबा। लेकिन यह नहीं बताया कि वह कहाँ गए हैं और कब लौटेंगे।”
“अच्छा। हो सकता है विद्यालय के किसी काम से भेज दिया गया हो। पता करूँगा।”
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फिर परीक्षा का वक्त पास आ गया था। अविनाश अभी भी वापस नहीं लौटा। मार्च में परीक्षाओं के ख्याल से अर्चना व्यग्र हो रही थी। मिसिर जी अभी तक अविनाश के संबंध में कुछ पता नहीं कर पाए थे। उसके विद्यालय से इतना जरुर पता चला था कि हायर स्टडीज के लिए वह छुट्टी लेकर गए हैं। कहाँ गए हैं और कब लौटेंगे, किसी को नहीं मालूम था।
रोज की भाँति बारामदे में डस्टिंग करते हुए अर्चना ने अविनाश के घर की ओर देखा। दरवाजे पर धूल गर्द में लिपटा बड़ा-सा ताला लटक रहा था। बाहर पड़े सस्ते से स्टूल पर परिंदों ने गंदगी कर रखी थी। वह तेज कदमों से गीले डस्टर को लिए हुए अविनाश के घर गई और ताले और स्टूल को साफ करके वापस आ गई। इस घटना को भी दस दिन बीत गए। ताला और स्टूल फिर गंदे हो गए। उनकी देखभाल करने वाला अभी भी नहीं लौटा था।
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बहुत दिनों बाद एक दिन देर शाम उसने सामने वाले कमरे में बत्ती जलती देखी।
“बाबा लगता है मास्टर साहब आ गए हैं।”
“कैसे पता?”
“उनके कमरे में बत्ती जल रही है।”
“अच्छा जा देख आ।”
“मैं, मतलब मैं अकेले चली जाऊँ।”
“अच्छा ठहर, मैं जाता हूँ।”
छड़ी का सहारा लिए मिसिर जी स्वयं अविनाश के घर पहुँच गए। अविनाश चारपाई पर फैले कपड़ों को ठीक कर रहा था।
“अरे बाबू जी आप।”
“बेटा कहाँ चले गए थे? कुछ बताया भी नहीं।”
“दरअसल मैंने पढ़ाई के लिए दो वर्षों की छुट्टी ली थी। वह मिल गई तो दिल्ली चला गया था।”
“तो अब दिल्ली में रहोगे?”
“हाँ, जब तक मेरा शोध कार्य पूरा नहीं हो जाता, वहीं रहना पड़ेगा।”
“चलो यह तो बहुत अच्छी बात है। अच्छा चलो खाना घर पर खा लो।”
“अभी तो मन नहीं है।”
“मैं कुछ नहीं सुनूँगा। मेरा आदेश है।”
“ठीक है बाबू जी।”
कपड़े बदलकर वह मिसिर जी के घर पहुँच गया। कुछ ही देर में मिसिर जी की बहू दो थालियाँ सजाकर उनके सामने रख कर चली गई थी। इस बार घर का नौकर खाना परोस रहा था। इस बीच अर्चना की पढ़ाई का कोई जिक्र नहीं हुआ। अविनाश ने भी कुछ नहीं पूछा। खाना खाकर चुपचाप घर वापस आ गया।
उस रात अविनाश सो नहीं पाया। न जाने उसके मन में कैसे-कैसे विचार उठते रहे।
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दूसरे दिन सुबह उसने अर्चना को बारामदे में रखे तुलसी के पौधे को पानी देते देखा। वह एक पल के लिए ठिठक गया। अर्चना ने उसे देखा। हाथ जोड़कर नमन किया। अविनाश ने भी दोनों हाथों को ऊपर उठाकर उसका अभिवादन स्वीकार कर लिया।
इसके बाद वह अपने काम में लग गया। चाहकर भी शाम को वह अर्चना के घर नहीं जा सका। उसके कमरे का दरवाजा खुला था। वह कुछ लिखने में व्यस्त था। तभी किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी- ‘सर’ उसने पीछे मुड़कर देखा, हाथ में किताब लिए अर्चना खड़ी थी।
“अर्चना तुम?”
“जी मैं अपने कहे शब्द वापस लेने आई हूँ।”
“तो ले लो।”
“बस यही सुनना चाहती थी। जा रही हूँ।”
“अर्चू ठहरो, एक पल रुको।”
“नहीं, रुकना संभव नहीं है।”
“मैं कल पढ़ाने आऊँगा।”
“तो मैं प्रतिक्षा करूँगी।”
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दूसरे दिन अविनाश पढ़ाने गया था। वह अनमनी-सी बैठी थी।
“क्या हुआ?” अविनाश ने पूछा।
“कुछ नहीं। मुझे नोट्स दे दीजिए। अपने सहारे परीक्षा देनी है। पढ़ाई बहुत है।”
“क्यों मैं तो हूँ तुम्हारी मदद के लिए।”
“अच्छी बात है लेकिन स्वावलंबी होना ज्यादा अच्छी बात है।”
“कैसी बातें कर रही हो?”
“मास्टर जी मैंने कहा न। पढ़ा सकते हैं तो पढ़ा दीजिए। बातों में समय क्यों नष्ट किया जाए।”
बिना जवाब दिए अविनाश ने गंभीरता से उसे पढ़ाना शुरू कर दिया। ऐसा अब रोज होने लगा। दोनों के बीच पढ़ाई के अलावा कोई दूसरी बात नहीं होती थी। परीक्षाएँ शुरू हो चुकी थीं।
“मास्टर जी अब केवल अंग्रेजी वाले पेपर के पहले पढ़ा दीजिएगा। बीच में मत आइएगा। डिस्टर्ब होगा।”
“ठीक कहा।”
और ऐसा ही हुआ। न अविनाश रोज आया और न ही अर्चना ने उसे बुलाया। परीक्षाफल घोषित हुआ तो घर के सभी लोग अवाक रह गए। अंग्रेजी को छोड़कर अर्चना का सभी विषयों में बुरा हाल था।
अविनाश के पास कोई जवाब नहीं था।
“अविनाश बाबू मुझे लगता है इसे ट्यूशन की सख्त जरूरत है। यदि आपके पास समय न निकले तो किसी अच्छे अध्यापक को बता दें। बड़ी मेहरबानी होगी।” मिसिर जी बोले।
“ठीक है।”
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मिसिर जी प्रतीक्षा करते रहे। अविनाश किसी भी अच्छे अध्यापक को ढूँढ नहीं पाया। अंत में एक दिन वह मिसिर जी से मिलने गया। अविनाश की आवाज सुनकर अर्चना बाहर आई।
“आइए बाबा से मिलने आए होंगे।”
“हाँ।”
“बाबा नहीं हैं। घर पर कोई भी नहीं है। देर रात तक लौटेंगे।”
“ठीक है। कल मिल लूँगा। चलता हूँ।”
“मास्टर जी” अर्चना सिर झुकाकर बोली।
“हाँ।”
“हमसे बहुत नाराज हैं?”
“किसने कहा?”
“तभी तो हमें पढ़ाना छोड़ दिया।”
“अर्चना तुमने अवसर ही कहाँ दिया कि तुम्हें कुछ बताता।”
“आज बता दीजिए। आइए।”
अविनाश अर्चना के साथ उसके पढ़ाई वाले कमरे में चला गया।
“अर्चू दरअसल….”
“मास्टर जी आप कुछ न कहें। मुझे सब मालूम है। मैं तो सिर्फ एक बात कहना चाहती हूँ।”
“कहो।”
“अगर आप नहीं पढ़ाएँगे तो हम कभी पास नहीं हो पाएँगे। इस बार आपने देखा ही होगा।”
“कैसी पागलपन की बातें कर रही हो?”
“आप के लिए पागलपन हो सकता है। मेरे लिए नहीं। बोलिए आप पढ़ाएँगे या नहीं?”
“सोचने दो।”
“खूब सोच लीजिए। एक बात और, आप नहीं पढ़ाएँगे तो मुझे पढ़ना भी नहीं है। आपके अभाव में मुझे कुछ संभव नहीं लगता है। आप नहीं थे तो मैंने सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों से अपने को अलग कर लिया था। फिर भी नहीं पढ़ सकी। आप कहीं भी रहें, मुझे दो दिन भी पढ़ा देंगे तो मैं अव्वल पास होती रहूँगी।”
“तुम मेरे साथ पढ़ती कहाँ हो?”
“आपको क्या पता?”
“अच्छा बाबा पढ़ाऊँगा बस। कुछ दिन के लिए बाहर जरूर जाऊँगा।”
“मंजूर है। बात पक्की। मिलाइए हाथ।”
“और चपत भी लगा दूँ?”
“जी सिर हाजिर है।”
दोनों हँस पड़े।
अविनाश के ऊपर एक नई जिम्मेदारी आ गई थी, किंतु इस जिम्मेदारी से उसे परहेज नहीं था।
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दूसरे दिन अविनाश के कमरे में दाखिल होते ही अर्चना ने पूछा, “आपको मालूम है कि पिछले तीन सालों में क्या हुआ?”
“क्या हुआ?”
” लो यह भी नहीं मालूम। मास्टर जी आप विद्यालय और उम्र के पैमाने में वरिष्ठता पर आ गए और हम भी वरिष्ठ हो गए। इंटर फाइनल में आ गए।”
“है ना अजीब बात?”
“इसमें अजीब क्या हुआ?”
“यह अजीब तो है ही। हम कहाँ से कहाँ आ गए। हमें कुछ पता भी नहीं चला और मास्टर जी ऐसे ही यहाँ से कब कहाँ चले जाएँगे, पता भी नहीं चलेगा।”
“अरे तुम तो गंभीर हो गई। चलो काम दिखाओ।”
“मास्टर जी आप भुलक्कड़ होते जा रहे हैं। कल काम कहाँ दिया था?”
“अच्छा एक बात कहूँ?”
“कहो।”
“हम वरिष्ठ हो गए हैं। मास्टर जी कहना अच्छा नहीं लगता। आपको सर करने का मन करता है, अगर आप अनुमति दें तो..।”
“मेरी ओर से तुम्हें सब अनुमति है।”
“नया संबोधन मुबारक हो सर। मिलाइए हाथ।”
अविनाश का हाथ अपने हाथों में लेकर अर्चना खिलखिलाकर हँस पड़ी। कुछ देर यूँ ही हँसती रही।
“अर्चू चलो मस़खरापन बहुत हो गया। पढ़ाई शुरू करो।”
“सर आज पढ़ाई का बिल्कुल मन नहीं है। कुछ बातें हो जाएँ। मैं कॉफी बना कर लाती हूँ।”
इससे पहले कि अविनाश उसे रोकता, वह तेजी से अंदर चली गई। अविनाश बैठे उसकी प्रतीक्षा करता रहा।
उस दिन भी पढ़ाई के नाम पर कॉफी और पकौड़ों की दावत भर हुई। तीन घंटे इधर-उधर की बातें करने के बाद अविनाश घर लौट आया था।
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वह हतप्रभ था। अर्चना उसके लिए एक पहेली थी। न तो वह उसे सुलझा पा रहा था और न ही उससे अलग हो पा रहा था।
“सर एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“सर अब आप गीत नहीं लिखते?”
“लिखता हूँ।”
“कभी बताया नहीं आपने?”
“तुमने कब पूछा?”
“यह भी कोई पूछने की बात है। क्या कभी आपके मन में यह भाव नहीं उठे कि अपनी चहेती शिष्या को अपनी नई रचना सुनाऊँ? कितना अच्छा होता वह पल जब बिना कहे आपने अपनी रचना सुनाई होती। हाँ यह अवश्य है कि आपको वह तालियाँ नहीं मिलतीं जो महफ़िलों में मिलती हैं। ताली मिलती तो धीरे स्वर में किंतु…”
“किंतु क्या?”
“कुछ नहीं।”
“नहीं कहो तो।”
“आपको कभी इस बात का अहसास ही नहीं हुआ कि आपकी रचना सुनकर किसी को कितनी प्रसन्नता होगी।”
“ऐसा नहीं है।”
“फिर कैसा है?”
“यहाँ मैं शिक्षक धर्म से जुड़ा हूँ। कवि धर्म से नहीं।”
“वाह क्या बात कही।”
“और मैं तो अपने सुख के लिए लिखता हूँ। दूसरों से उसे क्यों शेयर करूँ? इसीलिए कवि सम्मेलनों में जाना छोड़ दिया।”
“सर यह बात समझ नहीं आई।”
“तो समझने का प्रयास करना। अभी पढ़ाई करो।”
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पूरा वर्ष ऐसे ही हल्की-फुल्की बातों और पढ़ाई में बीत गया और सरकते-सरकते पतझड़ का बसंती मौसम आ धमका।
“सर कल वसंत है” पढ़ते-पढ़ते अर्चना ने खामोशी तोड़ी।
“तो बसंत से तुम्हें क्या लेना?”
“मुझे कुछ लेना नहीं है। आपको लेना है।”
“मुझे क्या लेना है?”
“पीले रंग का एक रुमाल। पर चिंता न करें। खरीदने की जरूरत नहीं। मैंने आपके लिए रंग दिया है। देखिए कैसा रंग चढ़ा है।”
“रंग तो अच्छा चढ़ा है लेकिन मैं तो यह सब…”
“हाँ, हाँ आप यह सब नहीं मानते। पर हम मानते हैं और माँ सरस्वती के पर्व पर शिक्षक को पीला रुमाल भेंट करना, सबसे उत्तम उपहार है।”
“अच्छा।”
“बड़े भोले बनते हैं। जैसे कुछ जानते ही नहीं।”
“अर्चना पढ़ ले। समय कम है। परीक्षाएँ सिर पर हैं।”
“सर हमने आपसे एक ही बात कही थी। आप आते रहें। हमें ऐसे ही पढ़ाते रहें। हम पढ़ लेंगे। अव्वल भी आ जाएँगे और हाँ अबकी सभी विषयों की परीक्षा के पर्चे देखने आपको प्रतिदिन आना होगा। इसमें कोई हीला-हवाली स्वीकार नहीं होगी।”
“अगर समय नहीं मिल पाया तो?”
“यह सब हमें नहीं पता। आपको आना है।”
अविनाश के पास अन्य दिनों की भाँति आज भी कोई उत्तर नहीं था।
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परीक्षाएँ खत्म हो चुकी थीं। अविनाश ने परीक्षाओं से पूर्व हुए अनुबंध को पूरी तरह निभाया था। इससे अर्चना बहुत खुश थी। परीक्षा के अंतिम दिन भी अविनाश आया था।
“हाँ तो अब क्या नया आदेश है?” अविनाश ने मुस्कुराते हुए पूछा।
“सर हम सोच रहे हैं कि गर्मी के दो उदास महीने कैसे काटे जाएँ?”
“क्यों क्या ये महीने नए आए हैं?”
“नहीं महीने तो पुराने हैं, पर आकांक्षाएँ और भावनाएँ जरूर नई पैदा हो गई हैं। समझ नहीं आता कि क्या करूँ?”
“बताओ शायद कोई समाधान सामने आ जाए।”
“नहीं सर, कोई समाधान नहीं होगा। पापा कहते हैं डॉक्टर बनो। सच यह है कि मैं कुछ नहीं बनना चाहती। मैं सिर्फ पढ़ना चाहती हूँ।”
“यह भी कोई बात हुई। आखिर कुछ बन पाने के लिए ही तो लोग पढ़ते हैं। धन और समय नष्ट करते हैं।”
“हाँ यह तो है। इसीलिए तो कहती हूँ कुछ समझ नहीं आ रहा।”
“ऐसा करो, परीक्षाफल आने दो। तब कुछ निर्णय हो जाएगा।”
“अरे सर अगर डॉक्टर बनना है तो कोचिंग लेनी होगी। वह भी विज्ञान की और अभी से।”
“मैं बताऊँ कोचिंग शुरु कर दो।”
“और अंग्रेजी आपसे पढ़ती रहूँ।”
“उसमें अंग्रेजी की क्या जरूरत?”
“वाह सर वो डॉक्टर ही क्या जिसे अंग्रेजी न आती हो?”
“चलो मैं जब तक यहाँ हूँ, तुम्हें अंग्रेजी पढ़ाता रहूँगा।”
“श्योर।मिलाइए हाथ।”
“नया कोर्स मुबारक हो।”
“मुबारक-उबारक कुछ नहीं। कल आपको हमारे दाखिले के लिए चलना पड़ेगा।”
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दूसरे दिन अविनाश ने अर्चना को अपनी नई पुस्तकों को सलीके से रखते देखकर टोका,”लगता है मन लगेगा।”
“सर मन-वन क्या लगेगा? जिंदगी की शर्ते हैं, जो पूरा करने की कोशिश में हूँ।”
“कैसी शर्तें?”
“सर सच बताऊँ, पापा कहते हैं यदि कोई प्रोफेशनल कोर्स नहीं करना तो पढ़ाई छोड़ो। लड़का देखें, शादी कर दें। ज्यादा पढ़ जाओगी तो अच्छे लड़के नहीं मिलेंगे और मैं अभी शादी नहीं करना चाहती। इसलिए वक्त काटने के लिए डॉक्टर बन जाना चाहती हूँ। यकीन मानिए मेरा सिलेक्शन कभी नहीं होगा।”
“यह तो खुद को और दूसरों को धोखा देना होगा।”
“सो तो है, पर हम क्या करें? हमसे यही अपेक्षा की जा रही है। मेरी एक सहेली है। वह शिक्षिका बनना चाहती है। उसके पापा उसे पी.सी.एस. बना देना चाहते हैं। वह भी यही कर रही है।”
“तुमने पापा से मन की बात बताई नहीं?”
“मम्मी-पापा तो वही ठीक समझते हैं जो उन्हें ठीक लगता है। हमारी कौन सुनता है…।”
“अच्छा मैं बात करके देखूँगा।”
“प्रयास कर लीजिए। पापा बहुत जिद्दी हैं।”
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अविनाश ने घरवालों को समझाने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने एक न सुनी। उनका एक ही जवाब था, क्या बच्चों की नादानी पर उनके भविष्य के निर्माण का अधिकार उन्हें दे दिया जाए? अविनाश ने समझ लिया कि उन्हें समझा पाना कठिन था। उसने अर्चना को अपने प्रयासों के बारे में बता दिया। अर्चना सब सुनकर हँस उठी थी।जैसे कह रही हो “सर उन्हें समझाना आपको नहीं, मुझे आता है। मैं अच्छी तरह से समझा लूँगी। मैं कोचिंग जरूर करूँगी, पर बी.एस.सी. नहीं बी.ए. करूँगी।”
कोचिंग से आते-जाते और घर पर अंग्रेजी पढ़ते-पढ़ते दो माह बीत गए।
घर में सभी बहुत खुश थे।
एक दिन बातों-बातों में माँ ने कहा, “अविनाश जी हम तो चाहते हैं कि अर्चना की शादी कर दें। काफी तो पढ़ गई है।”
“हूँ” तिरस्कार के स्वर में अर्चना ने कहा, “मैं इतनी जल्दी घर-गृहस्थी के पचड़े में नहीं पडूँगी।”
“घर-गृहस्थी जितनी जल्दी बस जाए उतना अच्छा होता है।”
“माँ छोड़ो भी बेकार की बातें। मास्टर जी को बोर कर रही हो। क्यों मास्टर जी?”
“नहीं-नहीं, बोर होने का प्रश्न नहीं। माँ जी बात तो व्यावहारिक कह रही हैं।”
“आप भी दकियानूसी ख्यालों के हैं मास्टर जी।”
“अरे अर्चू मास्टर साहब से ऐसे बोला जाता है?”
“नहीं माँ जी किसी के बोलने पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। फिर अर्चना तो काफी समझदार भी है।”
“अच्छा माँ मैं बी.ए. करने के लिए को-एड में दाखिला लूँगी।”
“जहाँ पढ़ सको वहाँ दाखिला लो। हम को-एड, फो-एड नहीं जानते।”
“मास्टर जी कल एडमिशन फाइनल।”
“ठीक है।”
“ठीक क्या है। परसों से पढ़ाई शुरू।”
“अरे बेटी इतना अधिक पढ़ोगी तो सेहत पर खराब असर पड़ेगा। कॉलेज खुल जाएं तभी पढ़ना शुरू करना।”
“बाबा बड़ी कक्षा है। ज्यादा पढ़ाई है। पिछड़ गई तो फिसड्डी रह जाऊँगी।”
“अच्छा बाबा जा तू अभी से पढ़ाई शुरू कर दे।”
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अविनाश के साथ जाकर अर्चना ने शहर के एक बड़े महाविद्यालय में एडमिशन ले लिया। साथ ही पुस्तकें, रजिस्टर और अच्छा-सा कॉलेज बैग भी बाजार से खरीदा। दिन की भाग-दौड़ के बाद दोनों थक गए थे। दोपहर बीत चुकी थी। अविनाश ने प्रस्ताव रखा कि “चलो किसी होटल में कुछ खा लें।”
“क्यों नहीं? मगर सर बिल हम देंगे।”
“क्यों?”
“गुरु दक्षिणा में।”
अविनाश अपनी हँसी रोक नहीं पाया।
“सर आप तो कभी-कभी पगला जाते हैं। इसमें हँसने की ऐसी कौन-सी बात थी?”
“भला इसमें गंभीर होने की भी क्या बात थी। ठीक ही तो है मॉडर्न युग में गुरू दक्षिणा बिलों से ही अदा होती है। यही सोच कर हँसी आ गई थी।”
शाम को घर लौटने पर अर्चना ने महाविद्यालय की खूबियाँ बताते हुए माँ से कहा, “जानती हो महाविद्यालय क्या है? पूरा अजायबघर है अजायबघर..। कैसे-कैसे लड़के-लड़कियाँ वहाँ पढ़ने चले आते हैं।”
“क्या बदमाश लड़के पढ़ने आते हैं?”
“अरे नहीं माँ। मेरा मतलब यह है कि वहाँ फैशन परेड लगती है। ऐसे-ऐसे रंग-बिरंगे ऊँचे-नीचे कपड़े कि देखते ही रह जाओ।”
“देख तू इन सब चक्करों में मत फँस जाना। पढ़ने गई है तो अच्छे नंबरों से पास होना।”
“अच्छा देखा जाएगा। कॉलेज तो खुलने दो।”
“और माँ जी मुझे क्या आदेश है?” बीच में टोकते हुए अविनाश ने पूछा।
“एल्लो। मास्टर जी को देखो। क्या आदेश चाहिए। आदेश यह है कि कल से आपको आना है।”
“अरे अर्चू कैसे बोलती है” माँ ने टोका।
“सच तो कह रही हूँ। जब देखो तब मास्टर जी मुझसे पीछा छुड़ाने की बात किया करते हैं।”
“माँ मैं किसी के सहारे-वहारे नहीं। अपने सहारे हूँ। समझी। क्यों मास्टर जी?”
“हाँ बिल्कुल ठीक। तभी तो कह रहा हूँ अपने आप पढ़ो, मुझे छुट्टी दो।”
“मैं अपने आप ही तो पढ़ती हूँ। आपने कब पढ़ाया? बोलिए मास्टर जी?”
“अच्छा ठीक है।”
आई-गई बात खत्म हो गई थी। चाय खत्म करके अविनाश घर चला गया था। अर्चना किताबों पर कवर चढ़ाने बैठ गई थी।
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