कोई नाम न दो…भाग-5

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एक सप्ताह हो गया था। मिसिर जी अविनाश की प्रतीक्षा करते रहे। वह नहीं आया। जब एक दिन उनसे रहा नहीं गया, तो पूजा के बाद वह उसके घर आ धमके। अविनाश अभी सोकर उठा था। मिसिर जी को बारामदे में देखकर वह ठिठक गया।

“प्रणाम बाबू जी।”
“आज प्रणाम स्वीकार नहीं है।” मिसिर जी गंभीर स्वर में बोले।
“आज मैं सिर्फ एक आदेश देने आया हूँ।”
“जी, आदेश कीजिए।”
“आज रात्रि भोजन हमारे साथ करना है।”
“आदेश स्वीकार है।”

मिसिर जी बिना कुछ बोले बारामदे से नीचे उतर आए। अविनाश ने उन्हें रोकना चाहा किंतु वह नहीं रुके। अविनाश उनके मनःभावों को समझ गया था। असमंजस में था कि अपनी संकोच-केचुली उतार कर कैसे उनके घर जाए। सुबह से शाम उहापोह में बीत गई। अंत में उसने मन बना लिया कि वह मिसिर जी के साथ भोजन करेगा। ठीक आठ बजे वह मिसिर जी के घर पहुँच गया। खुली खिड़की से अविनाश ने देखा मिसिर जी पूजा में ध्यानामग्न थे। उसने दरवाजे पर दस्तक नहीं दी। बाहर पड़े स्टूल पर बैठ गया।

आधे घंटे बाद मिसिर जी ने आवाज लगाई, “अर्चू”
“हाँ बाबा।”
“अरे देख अविनाश बाबू नहीं आए?”
“बाबा अभी देखा था। घर बंद है। शायद वह कहीं निकल गए हैं।”
“अरे कहाँ गए होंगे?”
“पता नहीं, वैसे खाना तो तैयार है।”

इसी बीच अविनाश ने दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा खुला। सामने खड़ी अर्चना ने दोनों हाथ जोड़कर श्रद्धापूर्वक नमन किया। “बाबा अभी आपको पूछ ही रहे थे।”

“हाँ, मैंने सुना था।”
“आपने सुना था?”
“हाँ, मैं आधे घंटे से बारामदे में बैठा बाबू जी का पूजा से उठने का इंतजार कर रहा था।”
“अरे! बड़ा अफसोस है मैं आपको देख नहीं पाई” अपराध बोध से अर्चना ने कहा। तब तक मिसिर जी आ गए थे। “अरे क्या हुआ, यही खड़े रहोगे कि अंदर भी आओगे।”
“हाँ, आइए-आइए।”

उस रात मिसिर जी का पूरा परिवार अविनाश के साथ भोजन पर था। अर्चना दौड़-दौड़ कर गरम रोटियाँ सबको परोस रही थी। अर्चना का सबके साथ भोजन पर न बैठ पाना, अविनाश को अच्छा नहीं लग रहा था। उसने एक-दो बार कहा भी कि उसे गरम रोटियाँ पसंद नहीं हैं। सबके साथ बैठकर खाना अच्छा लगता है। लेकिन उसकी बात अनसुनी रही।
भोजन समाप्ति पर अविनाश को समझ नहीं आया कि भोजन की तारीफ में क्या कहें। बड़े हिचकिचाते हुए उसने कहा, “गरम रोटियों ने भोजन में रंग बिखेर दिया बाबा।”

“हूँ” मिसिर जी ने हाँ में हाँ ऐसे मिलाई जैसे अन्य व्यंजनों का अपमान ही कर दिया गया हो। दोनों की बात सुनकर अर्चना मुस्कुराई भर थी और अविनाश सबसे विदा लेकर घर चलने को था।
“अर्चू जा अविनाश बाबू को गेट तक छोड़ आ” मिसिर जी बोले।
“जी बाबा।”
गेट पर पहुँचकर अर्चना का मौन टूटा। “मास्टर साहब कल से आ रहे हैं न?”
“कल से? ठीक है आऊँगा।”
“किस समय आएँगे?”
“शाम छः बजे ठीक रहेगा।”
“जी।”
“अच्छा नमस्ते” कहते-कहते अर्चना ने फाटक बंद कर दिया था।
●●●

दूसरे दिन छः बजे अविनाश मिसिर जी के घर पहुँच गया। अर्चना पहले से ही किताब-कापियों को मेज पर सलीके से लगाए बैठी थी।
“अरे, तुम तो पढ़ाई के प्रति बहुत गंभीर हो।”
“जी” और वह खिलखिलाकर हँस पड़ी।
अविनाश कुछ नहीं बोला। खामोश कुर्सी पर बैठे किताबों के पन्ने पलट रहा था।
“सर क्या पढ़ाएँगे?”
“मुझे क्या पढ़ाना है, तुम बताओ किसी विषय में कोई कठिनाई हो तो दूर करने का प्रयास किया जाए।”
“जी मुझे अंग्रेजी बड़ी कठिन लगती है।”
उसके बाद अविनाश ने लगभग दो घंटे तक उसे अंग्रेजी व्याकरण समझाई और अगले दिन आने का वायदा करके चला गया।
अर्चना उसे फाटक तक छोड़ने आई। चलते समय कहा- “मास्टर साहब कल आप जरूर आएँगे।”
“हाँ” और अविनाश घर आ गया।
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दूसरे दिन भी अर्चना ठीक समय पर अपनी पुस्तकों के साथ पढ़ाई वाले कमरे में बैठी थी।
“अरे तुम सचमुच पढ़ाई के प्रति गंभीर हो?”
“बाबा कहते हैं जैसा देश, वैसा भेष।”
“इसका क्या अर्थ हुआ?”
जब गुरु जी गंभीर हों तो शिष्या गंभीरता की अवहेलना कैसे कर सकती है।”
“अर्चना के इस उत्तर पर अविनाश खिलखिला कर हँसा।
“अरे आपको तो हँसी आ गई, क्या मैंने कुछ मूर्खता भरी बात कह दी?”
“नहीं-नहीं, बस हँसी आनी थी, सो आ गई।”
“वैसे मैं मूर्ख तो हूँ।”
“तुम्हें कैसे मालूम?”
“सभी कहते हैं।”
“क्या कहते हैं?”
“यही कि अर्चू तू निरी मूढ़ मगज है। कुछ नहीं समझती।”
“कौन कहता है?”
“बाबा, पापा, मम्मी, दादी सभी तो यह कहते हैं।”
“फिर?”
“फिर क्या कुछ नहीं। मूढ़ मगज हूँ तो हूँ। क्या करूँ?”
“नहीं ऐसा नहीं है। कल का काम किया?”
“नहीं कर पाई।”
“अर्चू तो मैं आगे क्या पढ़ाऊँ?”
“अगला पाठ।”
“पिछले पाठ का क्या होगा?”
“वह समझ में आ जाएगा।
“समझ में आ जाएगा?”
“हाँ, हाँ आपने समझा दिया है न। उसे मैं भूल नहीं सकती। बस लिखने का समय नहीं मिला।”
“चलो ठीक है।”
दो घंटे से ऊपर हो गए थे। अंदर से आवाज आई, “अर्चू, अविनाश बाबू गए?”
“दादी अभी हम पढ़ रहे हैं।”
“अच्छा।”
अविनाश को लगा उसे अब उठना चाहिए। बिना किसी औपचारिकता के वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
“क्या हुआ मास्टर साहब?”
“कुछ नहीं। काफी देर हो गई है न, अब फिर पढाएँगे।”
“फिर कब? कल तो आप आएँगे नहीं।”
“हाँ, अगले हफ्ते फिर आऊँगा।”
“अगले हफ्ते!” अर्चना ने चौंकते हुए पूछा।
“हाँ और क्या?”
“लेकिन मास्टर साहब मुझे तो बहुत कुछ पूछना है। प्लीज कल आ जाइए।”
“अर्चू समझा करो। कल नहीं आ सकूँगा।”
“फिर भी मैं इंतजार करूँगी।”
सप्ताह के प्रत्येक दिन नियत समय पर अर्चना उसकी प्रतीक्षा करती रही, किंतु अविनाश नहीं आया। उसने एक-दो दिन जाने के लिए सोचा भी किंतु यह सोचकर कि कहीं मिसिर जी उसका प्रतिदिन आना अन्यथा ना ले लें, वह नहीं गया।
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दूसरे सप्ताह जब सोमवार को वह पहुँचा तो अर्चना को गंभीर पाया।
“मास्टर साहब नमस्ते।”
“नमस्ते, कैसी हो?”
“ठीक हैं।”
“पढ़ाई की?”
“जी।”
“कितने संक्षिप्त उत्तर हैं तुम्हारे।”
“क्या करें, हमसे बात करना आपको अच्छा कहाँ लगता है।”
“अरे यह कैसे सोच लिया तुमने?”
“नहीं तो आप पिछले सप्ताह आए क्यों नहीं?”
“अर्चना तुम समझा करो।”
“यह तो सभी कहते हैं, लेकिन..।” कहते-कहते वह रुक गई थी।
“लेकिन क्या?”
“लेकिन अर्चना को कौन समझे?”
“उसे समझने की जरूरत है?” हँसते हुए अविनाश ने कहा।
“नहीं, उसे समझने की क्या जरूरत है, वह तो पराया धन है, चला जाएगा। जहाँ जाएगा वहाँ कोई क्यों समझेगा। वह तो धन ग्रहण कर धन पर एहसान जो करता है। इतना सीमित ही तो है जीवन एक लड़की का।”
“अर्चू तू तो दार्शनिक निकली।”
“मास्टर साहब मैंने सामाजिक परिवेश में लड़की को इसी घुटन का शिकार होते देखा है। उसे समझने की आवश्यकता कोई नहीं समझता।”
“अच्छा आज मैं तुम्हें समझने का वचन देता हूँ।”
“सच?”
“हाँ सच।”
“हाऊ ग्रेट यू आर।”
“अंग्रेजी आ गई?”
“जी, कल ही तो यह जुमला आपने मेरे लिए बोला था।”
“तो आज क्या पढ़ोगी?”
“कुछ नहीं। एक घंटा हो गया। अब मुझे एक सहेली के जन्मदिन पर जाना है। मुझे छुट्टी दे दो। बाकी पढ़ाई कल होगी।”
“जैसी तुम्हारी मर्जी।”
“जी।”
रास्ते भर अविनाश अर्चना की मनःस्थिति पर विचार विश्लेषण में खोता रहा।
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दूसरे दिन अर्चना गेट पर खड़ी अविनाश की प्रतीक्षा कर रही थी।
“आप आप…दो मिनट देर से आए हैं।”
“अच्छा।”
“अच्छा नहीं, इसका दंड देना पड़ेगा।”
“दंड क्या होगा?”
“दंड यह होगा कि आपको आज तीन घंटे मुझे पढ़ाना पड़ेगा।”
“अच्छा बाबा ठीक है। आओ चलें।”
“मास्टर साहब एक बात पूछूँ? आप इतने गंभीर क्यों रहते हैं?”
“गंभीर तो नहीं रहता। जरा बात करना कम आता है। इसलिए चुप ही रहता हूँ।”
“नहीं, आप शर्माते भी बहुत हैं।”
अविनाश फिर खिलखिला कर हँस पड़ा।
“क्या हुआ मास्टर साहब? मैंने कुछ गलत तो नहीं कहा?”
“नहीं-नहीं, तुम गलत हो ही नहीं सकती।”
“तो आज पढ़ाई की जगह कुछ बातें कर ली जाएं?”
“बातें, क्या बातें करोगी? मुझे तो ज्यादा बात करनी आती नहीं।”
“तभी तो मुझे आपको बातों का पाठ पढ़ाना है।”
अविनाश फिर अपनी उन्मुक्त हँसी को नहीं रोक पाया। बड़ी देर तक हँसता रहा। अर्चना उसे अवाक देखती रही।
“लगता है मैं जरूर मूर्खतापूर्ण बातें कर रही हूँ। है ना?”
“नहीं अर्चना ऐसा नहीं है। मुझे अपने ऊपर हँसी आती है। अच्छा छोड़ो, चलो पढ़ाई शुरू करें।”
“पढ़ाई, वह मैंने कर ली। आज आप बातें कीजिए। मैं सुनूँगी।”
“नहीं। बातें करनी है तुम तो करो। मैं सुनूँगा। लेकिन बेबी अगर तुम्हारे बाबा ने यह पढ़ाई देख ली तो मैं कहीं का नहीं रहूँगा।”
“आज घर पर कोई नहीं है। सब आपके जाने के बाद आएँगे। मुझे भी जाना था लेकिन यह सोचकर कि आप आएँगे, मैं नहीं गई।”
“अच्छा।”
इसप्रकार बातों में तीन घंटे से अधिक समय निकल गया। अर्चना ने कितनी ही कहानियाँ सुनाईं, कितनी बातें बताईं, किंतु अविनाश एक भी कहानी नहीं सुना पाया। फिर भी अर्चना प्रसन्न थी। बहुत प्रसन्न थी कि किसी में उसको सुनने का धैर्य था।
●●●

रेंगते-रेंगते फरवरी का महीना आ गया था। मौसम में बदलाव दिखने लगा था। अगले महीने बोर्ड की परीक्षाएँ थीं। कुल दस दिन स्कूल जाने के शेष थे। अविनाश की चिंता बढ़ रही थी। आखिर उसने एक दिन पूछ ही लिया, “अर्चू पिछले तीन महीने सिर्फ बातों में गुजरे हैं। पढ़ाई के नाम पर सब जीरो रहा है। क्या होगा तुम्हारे रिजल्ट का?”
“क्या होगा? अरे आपकी अर्चू अव्वल पास होगी।”
“अर्चू मुझे लगता है कहीं मेरी नाक ही न कट जाए?”
“कैसी बातें कर रहे हैं मास्टर साहब आप। अर्चू के रहते आपकी नाक ऊँची ही रहेगी। वह कभी नीची नहीं होगी।”
“तुमने मुझसे कुछ पढ़ा तो है नहीं?”
“मास्टर साहब आप आते रहे हैं, यही मेरी पढ़ाई है। पढ़ तो मैं लेती हूँ।”
“अच्छा।”
“जी” और जिस दिन आप आना बंद कर देंगे, वहीं मेरी पढ़ाई खत्म हो जाएगी।”
“मैं तुम्हारी बातों को नहीं समझ सकता। मैं चाहता हूँ कि आज से बातें बंद और एक महीना पढ़ाई कर ली जाए।”
“ठीक है बाबा ठीक है। देखूँगी।”
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अविनाश उसे नहीं समझ सका था। वह गंभीर भी नहीं हुई। पूरा महीना पिछले महीनों की तरह निकल गया। परीक्षाएँ शुरू हो चुकी थीं।
“अर्चना अब जिस दिन अंग्रेजी का पर्चा होगा, मैं आऊँगा। बीच में नहीं। अन्यथा तुम्हें पढ़ाई का समय नहीं मिलेगा।”
“मास्टर साहब” लगभग चीख पड़ी थी अर्चना। “आपको रोज आना होगा। ऐसे ही पढ़ाना होगा। वरना मैं फेल हो जाऊँगी।”
“अर्चना समझा करो।”
“आप भी तो मुझे समझिए सर।”
“अच्छा मैडम आऊँगा।”
“ओह थैंक्स।”
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इसके बाद परीक्षा के दौरान अविनाश अर्चना के घर जाता रहा। परीक्षाएँ खत्म होने को थीं।
“मास्टर साहब परसों मेरा अंतिम पर्चा है।”
“चलो फिर छुट्टी मिली पढ़ाई से।”
“नहीं सर छुट्टियों में मेरी अंग्रेजी पक्की करवा दीजिए।”
“अरे कोई छुट्टियों में पढ़ता है?”
“हाँ, जो कहीं नहीं जाते वे पढ़ते हैं।”
“अगर मुझे कहीं जाना हो?”
“आप जाएँगे तो तब, जब हम इजाजत देंगे।”
“अच्छा।”
“जी। आप कहीं न जाइएगा। हम लोग पढ़ेंगे। ठीक।”
“हूँ।”
वैसा ही हुआ। अविनाश नियत दिनों पर अर्चना को पढ़ाने जाता रहा। मिसिर जी भी प्रसन्न थे। परीक्षाफल आने पर उनकी खुशी दुगनी हो गई थी। अर्चना न केवल अव्वल आई थी, वरन् तीन विषयों में उसके अस्सी प्रतिशत अंक थे।
“मास्टर साहब लड्डू खाइए। मैंने आपसे क्या कहा था, आपकी नाक नहीं कटेगी।”
अविनाश मौन था। वह मुस्कुराया भर था।
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रिजल्ट के बाद अर्चना को कॉलेज में दाखिला लिए बीस दिन भी हो गए थे। इन बीस दिनों में अविनाश एक भी दिन उसके घर नहीं गया था। दिन भर विद्यालय की व्यस्तता और शाम को जो भी समय मिलता, उसमें कुछ रचनात्मक कार्य में व्यस्त हो जाता। अर्चना बार-बार खिड़की तक आती, एक नजर उसके बारामदे पर डालती। उसके दरवाजे को बंद देखकर अगले क्षण वह भी अपने काम में लग जाया करती।
एक दिन प्रातः बारामदे की खिड़की को डस्टिंग करते हुए उसने अविनाश को घर के बाहर खामोश खड़े देखा। वह एकटक उसे देखती रही। ज्यों ही अविनाश कमरे में दाखिल होने के लिए पलटा, उसने दोनों हाथ जोड़कर उसे मौन नमस्कार किया।
अविनाश उसकी इस मुद्रा पर मुस्कुरा उठा।
शाम को वह उसके घर पहुँचा। मिसिर जी बारामदे में बैठे रामायण पढ़ रहे थे।
“आओ अविनाश बाबू, बहुत दिनों बाद आए हो।”
“इधर व्यस्तता बहुत रही। आज पता नहीं क्यों आपके दर्शन को बेचैन हो गया। आपको देखा तो चला आया। आप कैसे हैं?”
“बेटा बहुत अच्छा किया तुमने। अपना घर समझकर आ जाया करो। कोई जरूरत हो तो नि:संकोच बताया करो।”
“जी बाबा।”
“अरे अर्चू” मिसिर जी ने आवाज दी, “देख अविनाश बाबू आए हैं। पानी तो ले आ।”
“आई बाबा।”
थोड़ी देर में एक साफ-सुथरी प्लेट में मिठाई और चाय लिए अर्चना सामने खड़ी थी।
“मास्टर जी नमस्ते।”
“नमस्ते। कैसी हो?”
“जी सब ठीक है। पढ़ाई शुरु होनी है।”
“अरे अभी तो समय है।”
“जी वह तो है, लेकिन मेरी अंग्रेजी बहुत कमजोर है न।”
“अरे अविनाश बाबू आपको कष्ट अवश्य होगा लेकिन इसकी छुट्टी को छुट्टी न समझिए। अपनी सुविधानुसार पढ़ा दिया कीजिए। नहीं तो पिछड़ जाएगी हमारी रानी बिटिया।”
“आज पढ़ोगी?”
“जी आइए।”
“चाय पी लूँ। तब तक तुम पढ़ाई की टेबल ठीक कर लो।”
“वह सब बिल्कुल ठीक है।”
“अरे अर्चू ऐसा कर, चाय अपने ही कमरे में ले जा। एक पंथ दो काज हो जाएँगे।”
“जी बाबा” वह फुर्ती से चाय की प्लेट लेकर अंदर जाने लगी।
“आइए मास्टर जी।”
“चलो आ रहा हूँ” मिसिर जी से विदा लेकर अविनाश भी कमरे में चला गया।
“तशरीफ रखिए” कुर्सी खींचते हुए अर्चना ने कहा।
“जी आप भी बैठिए।”
“हाँ तो आप बाबा से मिलने आए थे। मिल लिए, मुलाकात कैसी रही?”
“मुलाकात हो क्या होना था?”
“अरे यही कि शायद मैंने आकर कबाब में हड्डी की भूमिका निभा दी हो।”
“अर्चना कैसी बातें कर रही हो?”
“क्यों बीस दिन में एक भी दिन हमारा ख्याल नहीं आया आपको। आज हमीं ने सानुरोध नमस्कार किया तो आप आ गए और बहाना कर दिया कि बाबा आपकी याद आ रही थी। काश ऐसा हमारे लिए कहा होता।”
“अरे अचानक बीस दिन बाद जिस किसी से मिलना हो तो सभ्यतावश कुछ तो कहना ही पड़ेगा न। क्या मैं कहता कि अर्चना की याद आ रही थी।”
वह जोर से हँस पड़ी थी। अगले क्षण संयत होते बोली, “आप यह भी तो कह सकते थे कि देखें अर्चू की पढ़ाई का क्या हाल है? लेकिन यह वाक्य तो तभी निकलता जब आप सचमुच मेरी पढ़ाई के बारे में चिंतित होते।”
“तुम्हें क्या लगता है, मैं तुम्हारी पढ़ाई के बारे में गंभीर नहीं हूँ?”
“छोड़िए अच्छा। अब बताइए मुझे पढ़ाने कब से आ रहे हैं?”
“किताबें ले लो। कॉलेज खुल जाए और पढ़ाई शुरू हो जाए, मैं आने लगूँगा।”
“यह तो कोई बात नहीं हुई। सुनिए अब मैं बड़ी कक्षा मैं आ गई हूँ। आपको रोज आना होगा और कल से आना होगा। मैं बाबा से कह दूँगी।”
“बाबा से क्यों कहोगी?”
“इसलिए क्योंकि आप कब तक उनकी याद आने की बात को सभ्यतावश कहते रहेंगे।”
अविनाश जोर से हँसा। हँसते-हँसते उसने अर्चना के सिर पर हल्की-सी चपत लगा दी थी।
“मास्टर साहब आपने चपत क्यों लगा दी?
“कोई गुनाह कर दिया क्या?”अविनाश ने पूछा।
“गुनाह आपने नहीं किया, पर मैं कर सकती थी। कहीं मेरे बालों में लगी चिमटियाँ आपकी उंगलियों में बिंध जाती तो गुनाहगार कौन होता? क्या मुझे आपकी मरहम-पट्टी नहीं करनी पड़ती?” वाक्य खत्म होते-होते दोनों एक दूसरे को देखकर हँस पड़े थे।
उस दिन के बाद से अविनाश नियमित रूप से अर्चना को पढ़ाने जाने लगा था। कॉलेज में पढ़ाई भी शुरू हो चुकी थी। क्लास में लड़के-लड़कियाँ उसकी बुद्धिमत्ता का लोहा मान चुके थे। प्रत्येक कार्यक्रम में अर्चना को संगठनात्मक कार्य सौंपे जाने लगे। वह भी हर कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगी थी। एक कार्यक्रम के सिलसिले में उसे अपने सहपाठियों और शिक्षिका के साथ नैनीताल जाना था। कार्यक्रम की संचालिका भी वह बना दी गई थी। शाम को अविनाश के आते ही अर्चना ने एक साँस में उसे सब कुछ बता दिया।
“बहुत खूब। जाओ। मैं भी कुछ दिन अपने काम कर सकूँगा।”
“मास्टर साहब” अर्चू साधिकार बोली।
“क्यों क्या हुआ?”
“आप मुझे एक भार समझकर ढो रहे हैं?”
“क्या सवाल करती हो?”
“मास्टर जी सवाल, सवाल है। जवाब आपको देना है।”
“और मैं कहूँ हाँ तो क्या करोगी?”
“ठीक है। आप पढ़ाने मत आइए। मैं पढ़ लूँगी।” कहते-कहते अर्चू कमरे से बाहर चली गई।
अविनाश ठगा-सा रह गया। कुछ देर कमरे में रुकने के बाद वह भी धीरे से बाहर चला गया। अभी वह मुख्य द्वार पर पहुँचा ही था कि पीछे से आवाज आई “नमस्ते।”
उसने पलट कर देखा। कोई नहीं था। वह घर आ गया।
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