जो बोल सकते हैं…

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Mousam Rajput
जो बोल सकते हैं
उन्हें अपने अपने गूंगे होने का भ्रम है

और जो हाथ उठा सकते हैं
उन्होंने हाथ फैलाने को नियम मान लिया है
जो व्यवस्था के विषधर महल गिरा सकते हैं
वे तपस्या रत हैं
दीमक लगे राजमहल का स्तंभ बनने के लिए

हाथ फैलाने से नहीं टूटेंगे शोषण के महल
न ही टूटेंगे समानता पर अतिक्रमण करने वाले गढ़
न मिलेगा हक
उसके लिए हाथ उठाना अनिवार्य शर्त है

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हमारे हिस्से की रोशनी
हमें नहीं मिली
हमे मिला अंधेरे में चीखता घायल भविष्य
कि जिसकी पट्टियां करने में
बीत गया वर्तमान सारा

हमें अब कुछ नहीं चाहिए
सिवा पूरे के पूरे सूरज के ।

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यह बदलाव जलवायु का स्वभाव नहीं है
न ही इतिहास का स्वतः दोहराव

इसके लिए तोड़ने होगी
शर्म की हर सीमा
डर के हर खंडहर
चुपचाप सह जाने की आदत
संकरी गली से निकलकर बाहर आ जाने का
भयाग्रस्त स्वभाव
तब जाकर टूटेंगे वे गढ़

जिन्होंने रोक रखी है
रोशनी हवा खुशबू
और वह हर चीज जिसे हकलाते हुए कहते हैं लोग
हक

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