हे पिता… !

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हे पिता! तुमसे मेरे अस्तित्व का आधार है।
मुझ अकिंचन पर तुम्हारे प्रेम का उपकार है।।

जब मैं जन्मा भी नहीं था; तब भी तुम मेरे लिए,
सर्वसाधन खोजने को; भाग्य से अपने लड़े।
मेरे तन पर धूप-बरखा-शीत की विपदा पड़े,
उससे पहले मुस्कुराकर, तुमने सारे दुख सहे।
(आज जितना भी मेरे जीवन का यह विस्तार है।
मुझ अकिंचन पर तुम्हारे प्रेम का उपकार है।।)

माँगता था नित्य तुमसे – दूर का तारा कोई,
पर तुम्हारे त्याग ने; सपने मेरे सम्भव किए।
थी खिलौनों से भरी; जो मेरी अलमारी रही,
वो तुम्हारे हाथ के छालों के ऋण में है दबी।
(मेरी आशा के सुनहरे महल जो तैयार हैं।
मुझ अकिंचन पर तुम्हारे प्रेम का उपकार है।)

चाहता; वात्सल्य-ऋण से मुक्त निज मानस करूँ,
विश्व की सर्वोच्च निधियाँ; ला तुम्हारे कर धरूँ।
क्या तुम्हारे प्रेम के ऋण से उऋण हो पाऊँगा?
प्राण जो अर्पित करूँ; तृणसम नहीं दे पाऊँगा।
(पितृसेवा में रमूँ; तो जीव का उद्धार है।
मुझ अकिंचन पर तुम्हारे प्रेम का उपकार है।।)

हे पिता! तुमसे मेरे अस्तित्व का आधार है।
मुझ अकिंचन पर तुम्हारे प्रेम का उपकार है।।

*सन्त कुमार दीक्षित*

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