गुफ़्तगू चाँद और चिराग़ की…

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शुरू हो गयी एक दिन
गुफ़्तगू चाँद और चिराग़ की..
होंगी कुछ मीठी तकरारें,
या बातें प्यार भरे राग की..

यूँही बोल उठा चिराग़,
कभी तू भी तो चिराग़ रहा होगा जरूर..
ए चाँद!! जो तू चिराग़ था न
तो ही भला था…
जो चाँद हुआ
तो न ज़मीं का रहा
ना आसमाँ का हुआ…
पड़ा ही रहा तू
अधर में कहीं
ना इस जहाँ का रहा
ना उस जहाँ का हुआ….

फिर बोल पड़ा चाँद भी
ये चिराग़ की ही फ़ितरत है
मेरे दोस्त!!!
जी भर के जलता है
मिटने से पहले ….
कहाँ है बस में
चाँद के,
साबित करने को
अपनी वफ़ा,
राख़ हो जाये
वो जल के…..

लगा कहने फिर वो चिराग़,
खुद में ही कुछ परेशान सा,
निहारता आसमां में फैली चमक…
खुद को चिराग़ सा ही तो समझा था,
जो किसी कोने रौशन कर दे..
कहाँ मालूम था यूँही किसी रोज़
किसी के चाँद हो जाएंगे…
और जो हुए चाँद तो
बेमानी से ख़्वाबों में खो जाएंगे…

तड़प तो उठी चाँद के भी दिल में
बोला, ए चिराग़!!!!
क्या कर लिया मैंने चाँद होके भी,
रोज घिस घिस के एक दिन गायब हो जाता है,
एक चौमासे तक अपने दर्द को सह जाता है,
यहाँ अकेला पड़ा बस धरा को निहारता है,
इसकी बराबरी करेगा चिराग़ क्या, जो बस रात भर भी दर्द न सह पाता है …..

खुल गईं आँखें उस चिराग़ की,
पीड़ा समझ गया वो शायद,
चाँद के सीने में लगी आग की…
कहा उसने समेट के ख़ुद को,
तू बन जा वो मिसाल-ए-सबक़, ऐ चाँद!!!!!
कि चिराग़ ख़ुद की औक़ात न भूले,
लाख समझ ले ख़ुद को चाँद सा, कोई चिराग़,
अँधेरा ही होता है उसके अपने ही तले…….

अनीता राय

Asst. Teacher

UP BASIC EDUCATION DEPARTMENT

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