फुर्सत के लम्हें

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फुर्सत के लमहों की जरुरत किसको नहीं होती। मानसिक श्रम करने वाला व्यक्ति एक ऐसे दिन की बाट जोहता है जब उसे कोई कार्य न करना पड़े। शारीरिक श्रम करने वाला भी उन लम्हों की प्रतीक्षा करता है जब वह अपने शरीर को कुछ आराम दे सके। सभी को कुछ समय के लिए आराम चाहिए।
आराम के क्षणों को अक्सर लोग निष्क्रियता या अकर्मण्यता (आइडिल) से जोड़कर देखते हैं, उनका प्रयास होता है कि छुट्टी के दिन यदि वह कोई भी कार्य नहीं करेंगे तो वह अधिक आराम और आनंद को प्राप्त करेंगे। ऐसा सोचकर वह अपना अधिक समय नींद को होम कर देने की मशक्कत करते हैं। वह सोचते हैं कि छुट्टी के दिन वह कुछ भी न करें – यही सबसे बड़ा आराम होगा। वह अपनी थकान मिटा सकेंगे। ऐसा करने पर भी अगले दिन वह स्वयं को खुश नहीं पाते। उन्हें लगता है कि वह छुट्टी के क्षणों का पूरा पूरा उपयोग नहीं कर सके। फुर्सत के लम्हें जल्दी बीत गए और उन्हें हासिल कुछ भी नहीं हुआ।
उनकी शिकायत होती है कि पूरे दिन बिना किसी काम को किए वह सोते रहे या बैठे रहे फिर भी थकान नहीं गयी। मन और शरीर रोज की भाँति थका थका सा लगता है।
वस्तुतः आराम, काम छोड़कर निष्क्रिय (आइडिल) पड़े रहने से नहीं मिलता। आराम व्यवसाय बदलने से मिलता है। यदि छुट्टी के दिन शारीरिक श्रम करने वाला व्यक्ति किसी मानसिक क्रिया में व्यस्त हो जाता है तो उसके आराम का ग्राफ बढ़ जाएगा। इसी प्रकार मानसिक श्रम करने वाला व्यक्ति फुर्सत के क्षणों में कुछ शारीरिक श्रम करे तो उसके आराम में वृद्धि होगी। फुर्सत के क्षणों में कुछ भी नहीं करना थकान को और भी अधिक बढ़ा देता है।
आराम और थकान का सम्बन्ध शरीर में उत्पन्न होने वाली ऊर्जा के सदुपयोग से है। यदि उत्पन्न ऊर्जा का समुचित निष्पादन नहीं होगा तो थकान और मन की उदासी दूर नहीं होगी। एक आलसी व्यक्ति सदा थकान की शिकायत करता मिलेगा क्योंकि उसके शरीर की ऊर्जा उसकी काहिली के कारण निष्पादित नहीं होती। सर्वाधिक खुश व्यक्ति वह होता है जो अपने शरीर की ऊर्जा का समुचित उपयोग करता है। निष्क्रिय नहीं रहता है।

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