फेल न होना ….भाग – 2

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रात के दो बजने को थे। रितेश और सन्देश अभी भी नहीं लौटे। दीवान ने घड़ी देखी और पढ़ने में लीन हो गया। थोड़ी देर बाद नींद उस पर भारी पड़ने लगी। उसने पुनः घड़ी देखी। तीन बज चुका था। वह बुदबुदाया “अजीब बेवकूफ हैं। न जाने कहाँ घूम रहे हैं। कौन सी पिक्चर है जो अब तक खत्म नहीं हुई। आयेगें नींद ख़राब करेगें। सुबह स्कूल भी जाना है। कैसे क्या करूंगा? रोज़ का तमाशा बना लिया है। मैं अपना रूम बदलवा लूँगा। लफंगों के साथ कौन रह सकता है?” फिर एक झटके से उठा और ट्यूब लाइट का स्विच ऑफ कर दिया। मुँह तक रजाई तान कर सो गया।
चार बजे के लगभग रितेश और सन्देश वापस लौटे। उढ़के हुए दरवाजे को धकेल कर कमरे में प्रवेश कर गए। दीवान अभी कच्ची नींद में था। उसकी आँख खुल गयी।
“अबे पिक्चर इतनी देर से खत्म हुई?”
“पिक्चर कौन गया था?”
“फिर कहाँ गए थे?”
“पिक्चर से बड़ी पिक्चर देखने।“
“वह क्या होती है?”
“मुजरा।“
“छी बड़े गंदे लोगों के साथ पाला पड़ा है।“
“अबे क्या गंदगी है?”
“छी औरतों का नाच देखा और कहता है क्या गंदगी है?”
“हमने मैदान में देखा, तू सपनों में छिप कर देखता है। बोल देखता नहीं है।“
“राम-राम! ऐसी ओछी बातें मत करो। तुम्हें गार्ड ने रोका नहीं?”
“उसे जूता मार कर सुला दिया था।“
“अब यकीन मान प्रिंसिपल सर से शिकायत होगी। तुम दोनों स्कूल से निकाले जाओगे। समझे?”
“समझ लिया। वह शिकायत नहीं करेगा।“, रितेश बोला।
“जूता खाने के बाद भी?”
“तगड़ा जूता था। वह बेहोश पड़ा है।“
“अपना रस्टीकेशन तो निश्चित समझो।“
“अबे रस्टीकेशन होगा तेरा और तेरे दुश्मनों का। हम तो छाती ठोंक कर स्कूल में पढ़ेंगे, हॉस्टल में रहेंगे, पास हो या फेल। हम कहीं नहीं जायेंगे।“
“क्या बात है? कितना आत्मविश्वास है।“
“अबे बात हमारी नहीं। चांदी के जूते की है। जिसे पड़ेगा उसे बेहोश कर देगा।“
“यह सब कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहा है? कुछ समझ नहीं आ रहा है।“
“अबे रितेश किसे समझा रहा है?”, सन्देश ने टोका।
“हाँ यह तो मैं भूल ही गया था। चल दीवान दफा हो। पांच बजे हैं  सो लेने दे। कल तो फिर खड़ूस की क्लास है।“
अगले दिन रितेश और सन्देश क्लास में नहीं आये। दीवान दोपहर में बहुत घबड़ाया हुआ आया।
“क्या हुआ?”, रितेश ने पूछा।
“प्राचार्य सर क्लास में आये थे। हाजिरी रजिस्टर चेक किया। उन्होंने चेतावनी दी कि जिन छात्रों की हाजिरी पूरी नहीं होगी और जिनकी परफॉर्मेन्स ठीक नहीं होगी, उन्हें परीक्षा में बैठने नहीं दिया जाएगा।“
“ठीक है। अब मेरी सुन ले। कल तू जाना, चुरवे से कहना वह जो चाहे करे, मैं अपनी रफ़्तार से ही चलूँगा। हाजिरी पूरी हो या नहीं मैं परीक्षा में भी बैठूंगा। उसका बाप भी मुझे रोक नहीं पायेगा।“
“रितेश ये सब तू ही बताने जा। एप्लीकेशन देनी हो तो मुझे दे दे। मैं दे दूंगा। मैं कह कुछ नहीं पाऊँगा।“
“तो चल दफा हो यहाँ से। जब तू मेरी बात उससे कह नहीं सकता तो उसकी बात मुझे क्यों बताता है?”
“मैं तो इसीलिए बताता हूँ कि कल को तेरा कोई नुक्सान न हो जाए। तो कहता है तो अब नहीं बताऊँगा लेकिन कुछ ऊंचा-नीचा हो जाए तो मुझसे शिकायत मत करना।“
“शिकायत, और वो भी तुझसे? अबे तेरी क्या औकात जो मेरी शिकायत सुनेगा और शिकायत को दूर करेगा? मुझे शिकायत होगी तो अपनी जेब से। अपने ईश्वर से।“
“वह सब तो ठीक है। लेकिन याद रखना समय को चुनौती नहीं देना। किसी ने समय नहीं देखा है। जेब भी समय की दासी है।“
“अबे दीवान होगी समय की दासी। तू भाग। अभी तो हमें अपने ख़्वाबों में जीने दे। कल जो होगा उससे भी निपट लिया जायेगा।“
“ठीक है, जाता हूँ। विवेकानंद जी ने कहा है ‘सच्चा गुरु अनुभव है’। तू उनके इस कथन को सिद्ध कर रहा है।“
“दीवान तू पण्डिताई के पीछे क्यों पड़ गया है? पण्डिताई का शौक जागा है तो फिर सर पर चोटी, माथे पर बड़ी सी टिकली, धोती कुरता और हाथ में रामनाम की माला धारण कर। हम तेरा आदर करेंगे। वरना ठकुराई के परचम फ़हरा। ज़िन्दगी जीना सीख।“
“गलतियाँ करके उनको महसूस करके और उन्हें सुधार कर ही आगे बढ़ा जा सकता है रितेश।“
“यह किसने कहा है बे?”
“राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने।“ दीवान ने भोलेपन से कहा।
“और भी कुछ सुनाना शेष है?” रितेश ने खीजते हुए पूछा।
“नहीं।“
“तो जा टेबल पर। किताबों में लोट लगा। हमें सोने दे।“
लगातार दस दिन तक रितेश स्कूल नहीं गया। सन्देश कभी जाता और कभी नहीं जाता। प्रिंसिपल ने दोनों को चेतावनी पत्र थमा दिया कि यदि वह नियमित रूप से स्कूल नहीं आये तो उन्हें परीक्षा में नहीं बैठने दिया जाएगा। पत्र पाकर सन्देश ने निर्णय लिया कि वह स्कूल गोल नहीं करेगा। लेकिन रितेश पर कोई असर नहीं हुआ।
सन्देश ने रितेश को समझाया “यार कक्षा से गायब रहना ठीक नहीं है। तू ऐसा करके अपने आप को और अपने माता-पिता को धोखा दे रहा है।“
“सन्देश तू मुझे बता मैं कक्षा में जाकर क्या करूँ? मैथ्स का टीचर रिचर्ड श्रॉफ कह चुका है मैं जीवनभर उसके सब्जेक्ट में पास नहीं हो सकता। जब मैं उसके सब्जेक्ट में पास नहीं हो सकूंगा तो दूसरे सब्जेक्ट में पास हो जाने पर भी क्या होगा? रहूँगा तो फेल ही न? मैं क्यों पढ़ूँ?”
“पर तू यह क्यों नहीं सोचता कि तू इंटेलीजेंट है। कुशाग्र बुद्धि वाला है। तू मन लगा कर मैथ्स पढ़े तो क्यों फेल होगा?”
“भाई मैथ्स से जैसे अरुचि हो गयी है। मैथ्स की पुस्तकें मैं नहीं झेल सकता।“
“अगर तुझे मैथ्स से इतनी घृणा हो गयी है तो घर में बता दे किसी और कोर्स में चला जा। सबको धोखे में क्यों रखे हैं?”
“यार मैं तो कह दूं मगर मेरी सुनेगा कौन? ट्यूशन और लगा दी जायेगी। फिर तो मेरे पास एक ही रास्ता बचेगा।“
“कौन सा रास्ता?”
“या तो मैं घर छोड़ कर भाग जाऊँ या फिर फांसी लगाकर मर जाऊँ।“
“छि कैसी पागलपन की बात करता है। चल छोड़ तू क्लास ना जा। लेकिन खुश रह। जीवन में करने को बहुत कुछ है। पढ़ाई ही सब कुछ नहीं होती। मेरे पापा कहते हैं कि समय आने पर सब ठीक हो जाता है। तेरा भी समय आएगा। तेरे अपने हुनर रंग लाएंगे। तेरी तरक्की के मौके भी आएंगे।“
सन्देश की बातें रितेश के मन को छू गयी थीं। वह बोला कुछ नहीं लेकिन दूसरे दिन से उसने स्कूल जाना शुरू कर दिया। रितेश को लगातार स्कूल आते देख कर हिंदी की टीचर मिसेज जोसेफ ने कहा “रितेश तुम्हें नियम से कक्षा में पा कर मैं बहुत खुश हूँ। तुम्हारा कक्षा में आने का फैसला बहुत प्रशंसनीय है। भगवान तुम्हें सद्बुद्धि दे। पढ़-लिख कर आगे बढ़ो। तरक्की करो। माँ-बाप का नाम रोशन करो। देश और समाज के प्रति अपना फ़र्ज पूरा करो।“
“मैम क्या बिना पढ़े-लिखे लोग आगे नहीं बढ़ते? वह अपने माँ-बाप, समाज और देश का नाम रोशन नहीं करते?”
“शायद उतना नहीं जितना पढ़े-लिखे लोग रोशन करते हैं।“ मिसेज़ जोसेफ ने कहा। रितेश बहस के मूड में नहीं था। वह चुप हो गया। एक क्षण की खामोशी को तोड़ते हुए मिसेज़ जोसेफ ने कहा “हाँ देखो परसों स्कूल में सदानंद जी आ रहे हैं। लोकप्रिय हैं। पहुँचे हुए संत हैं। आदर्श जीवन की उपयोगिता पर व्याख्यान देंगे। उस दिन एब्सेंट मत होना।“
रितेश अभी तक क्लास में मुँह नीचे किए खामोश बैठा था। अचानक वह जोर से हंस पड़ा।
“स्टैंड-अप रितेश”, मिसेज़ जोसेफ ने सख्ती से कहा। “इसमें हँसने की क्या बात है?”
“मैम मुझे लगा कि स्वामीजी का प्रवचन एक बड़ा मज़ाक होगा।“
“व्हाट नॉनसेंस?”
“मैम पहुँचे हुए व्यक्ति जीवन कहाँ जीते हैं? उन्हें सामान्य, आसामान्य और आदर्श जीवन का अनुभव ही कहाँ होता है? वह आदर्श जीवन के संबंध में काल्पनिक विचार ही समक्ष रखेंगे। हमें बोर करेंगे। उनके प्रवचन के अंशों की कल्पना करके ही मुझे हंसी आ गयी थी।“
“तुम अभी बच्चे हो। तुम्हें यही तो जानना है कि जीवन क्या है? सामान्य जीवन क्या है? आदर्श जीवन क्या है? सामान्य जीवन से ऊपर उठकर जो जीवन जीता है वही आदर्श जीवन है। लेकिन इस जीवन को पहुँचे हुए व्यक्ति ही जी सकते हैं, दूसरे नहीं”
रितेश एक बार फिर ज़ोर से हंस पड़ा। मैम ने उसे गुस्से से क्लास के बाहर निकाल दिया। वह सज़ा पाकर भी अपनी हंसी नहीं रोक पा रहा था।
तीसरे दिन जब वह सदानंद का प्रवचन सुनकर हॉस्टल लौटा तो उसकी हंसी थम नहीं रही थी। उसके लिए सदानंद स्वामी के प्रवचनों से अधिक आकर्षक था, स्वामीजी का पहनावा। गंजे सिर पर तरकश सी पैनी लंबी चोटी, घनी दाढ़ी, घनी मूंछों में छिपा मुँह और उनकी अस्पष्ट बोली।
“सन्देश तूने देखा, स्वामी जी जोकर जैसे लग रहे थे?”
“अबे किसी संत पुरुष को ऐसे अपमानित नहीं करना चाहिए।“
“संत” कहते कहते रितेश और ज़ोर से खिलखिला पड़ा।“ संत तो बेटा मैं हूँ। जैसा हूँ, वैसा ही हूँ। वह तो जैसे थे वैसे नहीं थे। देखा था उनका रईसी खाना? उनके रईसी ठाठ? सचमुच वह आदर्श जीवन जी रहे थे।“
“तेरी बातें सुनकर तो लगता है कि स्वामी जी ने जो कुछ कहा ठीक कहा।“
“क्या कहा स्वामी जी ने?”
“उन्होंने कहा कि अशिक्षा के भूत से लड़ने के लिए जो शिक्षा हमें दी जा रही है, वह हमें और अधिक अज्ञानता की ओर ढकेल रही है। हम शिक्षित होकर जिद्दी तर्क-वितर्की, असंस्कृत, असहनशील और असंवेदनशील होते जा रहे हैं। अब हम केवल अपने बारे में सोचते हैं। अपने सम्मान और अपने सुख के बारे में सोचते हैं। दूसरे के सम्मान और सुख के बारे में हम नादान रहते हैं। तुम भी ऐसे ही शिक्षित किशोर हो।“
“ओये स्वामी जी की आत्मा मेरे ऊपर चढाने का टोना मत कर। तू ही उनकी आत्मा में विराजमान हो जा। मुझे यह दो कौड़ी की बातें नहीं अच्छी लगती हैं।“
“स्वामी जी की बातें दो कौड़ी की हैं?”
“और नहीं तो क्या? शिक्षा के सारे दोष जो स्वामी जी ने गिनाएं हैं वह उन लोगों के मन में घर कर जाते हैं जो ज्ञान प्राप्ति के लिए दिमाग के झरोखे या खिड़कियाँ पूरी तरह से नहीं खोलते। वह ज्ञान के प्रकाश को बंद झरोखे की चौखट की सेंध से आने देना नहीं चाहते हैं। ऐसा ज्ञान जो कोई भी प्राप्त करेगा वह जड़ और हठी हो जाएगा। भले ही वह स्वामी जी ही क्यों न हों?”
“अबे तुमसे कौन पंगा ले? चल छोड़। कल टेस्ट है। पढ़ ले नहीं तो फेल हो जाएगा।“
“तो क्या हुआ? प्रमोशन तो मिल ही जाएगा। वह खड़ूस मुझे फेल कर सकता है? मुझे प्रमोशन देने से मन नहीं कर सकता है।“
“वह क्यों?” ,सन्देश ने पूछा।
“देख लेना।“

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