आशंकाएं पूछो !

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Mousam Rajput

पूछो न मुझसे अतीत के काले पृष्ठों का परिचय
मुझसे मेरी आशंकाएं पूछो
देखो मेरे हाथों में है जो कुछ न होने का सुनापन
उलझी रेखाओं पर अंकित अनुमानित जीवन
उस सूनेपन के कल्पित स्पर्श की अभिलाषाएं पूछो
मुझसे मेरी आशंकाएं पूछो…

रंग महल के तोरण द्वार नहीं स्वागत को आतुर
भाग्य शीला पर लिखा न पाया कोई शब्द मधुर
नहीं रेशमी बस्ते में हैं, विरासत की स्वर्ण मुद्राएं
सीखी नही अभी तक अनुकंपा अनुशंसा की भाषाएं
बहुत गौण है मेरी दृष्टि
कैसे समझूं जग के गहन मौन का मैं आशय
घायल तन के घावों की गहराई नहीं तो
तृण जैसे इस तन की चुभती सी बाधाएं पूछो

यह हृदय है? घोर तिमिर की आंखों में जलता भय
स्पर्धा के तप्त कणों से निकाल खोजता नित संशय
रागहीन प्यासे प्रेतों से प्रेम-प्रणय को प्रतिपल आकुल
कुटिल कंठों की कोठियों से चाहता स्नेह शब्द मंजुल
इस व्याकुलता के वन में
न खोजो कोई मृग शावक अभय
निरीह नयनों में पल रही मुझसे वितृष्णाए पूछो
मुझसे मेरी आशंकाएं पूछो…

मौसम..

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