रेल का रोमांचित ऐतिहासिक सफर

850

प्राची द्विवेदी
(भारतीय रेल मंत्रालय से पुरुस्कृत लेख)

भारतीय रेल का सफर कभी उबाऊ रहा होगा, लेकिन अब नहीं। अब बड़ी रोमांचक और आरामदायक हो गयी है भारतीय रेल । राजधानी, शताब्दी जैसी ट्रेनों का सफर हवाई जहाज के सफर से कम नहीं। बड़ा आनंद आता है इन गाड़ियों में सफर करके । साफ़ सुथरे वतानुकुकित कोच, आरामदायक सीटें , आकर्षक परिधान में नाश्ता भोजन परोसने वाले लोग, स्वादिष्ट देशीय प्रदेशीय व्यंजन, पढ़ने को अखबार । भारतीय रेल के ग्लास स्क्रीन से बाहर के मनोहर दृश्यों को देखने की सुविधा, न धुंआ न कोयले की राख, तीव्रतम गति से बिजली चालित इंजिनों से दौड़ती रेल गाड़ियां , वाई फाई सिस्टम । और क्या चाहिए एक मुसाफिर को ? अब तो वो हँसते हँसते सफर करता है और अगली बार भी रेल से सफर करने को इच्छुक रहता है । रेल में आरक्षण भी अब समस्या नहीं ।

रेल के सभी आयामों की चर्चा करते समय में इसके भावनात्मक पहलू को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा तथा यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की भारतीय रेल ज़मीन के एक भाग को ही दूसरे से नहीं जोड़ता है ,बल्कि अलग अलग भागों में रहने वाले लोगों के दिलों के बीच की दूरियां भी कम करता है।
यही कुछ एक महीने पहले की बात ही रही होगी , मैं दिल्ली में एक मल्टी नेशनल कंपनी में कार्यरत थी ,अचानक घर से माँ ने फ़ोन कर बताया कि दादा जी की तबियत काफी ख़राब है और उन्हें देखने के लिए जाना है मैंने ऑफिस में इमरजेंसी अवकाश के लिए प्रार्थना पत्र दिया तथा वहां से अपनी छोटी सी कार लेकर निकल पड़ी। दादाजी उत्तर प्रदेश के एक क़स्बे में रहते थे । यहाँ आकर पता चला की डॉक्टर्स ने दादाजी को मुम्बई के हस्पताल के लिए रेफर किया है, मैंने तुरंत ही दादा जी से मुम्बई चलने के लिए कहा । लेकिन समस्या इस बात की थी की बीमार दादा जी ज्यादा देर बैठ नहीं सकते थे इसीलिए कार से इतनी दूर का सफर उनके लिए आसान नहीं था और उन्हें एक्रोफोबिया की समस्या भी होने के कारण हवाई जहाज से जाने के बारे में सोचना ही बेमानी थी ।

मैं सोच में पड़ गयी की क्या करूँ ? फिर मुझे रेल द्वारा दी गयी तत्काल सुविधा का ख्याल आया, मैंने तुरंत ही रेलवे की साइट को खोला, गाड़ियों को तलाशा, फिर क्या था तत्काल में आरक्षण की अर्जी लगा दी, पल भर नहीं लगा होगा आरक्षण हो गया । कोच नंबर और सीट नंबर भी मिल गया, झटपट टिकेट डाउनलोड किया और जाने की तैयारी शुरू की । गाड़ी के सम्बन्ध में सारी जानकारी जीपीएस के माध्यम से मिलती रही । जीपीएस के अनुसार ही दादाजी को लेकर स्टेशन पहुंची और अपने कोच में आसानी से प्रवेश पा गयी । वैसे ये मेरी पहली रेल यात्रा भी थी, लेकिन वेब और संचार के माध्यम से मुझे रेल मंत्रालय द्वारा प्रदान की जा रहीं सुविधाओं का ज्ञान था । इसीलिए मालूम था कि गाड़ी में खानपान की उत्कृष्ट व्यवस्था है, मैं अपने साथ कुछ भी भोजन सामग्री नहीं लायी थी, हालांकि दादाजी अपनी कुछ पुरानी रेल यात्राओं के बुरे अनुभवों की वजह से बहुत अरसे बाद की जा रही इस नयी रेलयात्रा के नाम से ही घबराये हुए थे लेकिन पानी से लेकर खाने तक की कोई असुविधा गाड़ी में नहीं हुई । रेलगाड़ी अपने नियत समय से चल दी । क्योंकि मेरे लिए भी ये एक नया अनुभव था तो मैं अपनी इस पहली रेल यात्रा को लेकर कुछ उत्साहित भी थी। हमलोगों को स्टेशन पर परिवारीजन छोड़ने आये हुए थे , मेरे लिए यह एक नयी बात थी जो मैंने भारतीय रेल के बारे में देखी और वो ये की रेलयात्रा करने जा रहे लोगों के परिजन उन्हें शुभ यात्रा कहने के लिए ट्रेन में बैठाने आये थे, और अब जब प्लेटफॉर्म साफ़ सुथरे रहने लगे हैं तो ट्रेन में अपने जनों को बैठाने वालों की संख्या में भी बढ़त होती जा रही है, मैंने देखा की वो कुछ देर के लिए उनके पिकनिक स्पॉट से बन गए। मेरी एक सहयात्री ने बताया कि वह रेल यात्राओं की बहुत शौक़ीन हैं और हर यात्रा के समय ऐसा होता है कितने ही बच्चे बड़े और परिजन ख़ुशी से आते हैं वो आनंदित होते हैं और तब तक वापस नहीं लौटते जब तक सरकती ट्रेन के साथ वो दौड़ते दौड़ते बाई बाई करने में पिछड़ नहीं जाते, मैं उनका ये अनुभव सुनकर आनंद विभोर हो उठी । मेरे साथ भी पहली बार ऐसा ही हो रहा था। गाड़ी अपने नियत समय पर हॉर्न बजाते हुए चल दी ।

मैंने अपना सामान रैक में रख दिया । तभी दादाजी ने इशारा करते हुए सामान पर ध्यान देने की हिदायत थी । मुझे कुछ समझ नहीं आया तो मैंने दादाजी से पूछ ही लिया की रेल यात्रा के नाम से ही वो घबरा क्यों गए हैं ?

तब उन्होंने अपनी अटकती धीमी आवाज़ में एक जुमला दोहराया कि घुटते घुटते ट्रेन में सफर करना हमें याद है, न खाना न पानी और शौचालय की गंदगी हमें याद है ।

मेरे चेहरे के भावों को अपने तजुर्बे से पढ़ कर उन्होंने भाँप लिया था कि उनको अपने इस जुमले को विस्तार से समझाने की आवश्यकता है और फिर जब उन्होंने अपनी इससे पहले पुरानी की गयी रेलयात्राओं के कुछ किस्से साझा किये तब मालूम पड़ा कि उस समय ट्रेन के डिब्बों में लकड़ी की सीटें होती थी, प्रथम व द्वितीय कम्पार्टमेंट में रेक्सीन की हलके गद्देदार सीटें, खिड़की बंद करने के बाद भी गंतव्य तक पहुँचों तो परिधान से लेकर सिर व चेहरा कोयलों के कणों से भर जाता था क्योंकि तब गाड़ियों को कोयले से चलने वाले इंजन खींचते थे, कुछ समय बाद डीजल इंजन ने कोयले इंजन की जगह ले ली, कुछ सुधार तो हुआ किन्तु रेल सफर की यात्राओं में कमीं नहीं आयीं । दादाजी ने अपनी एक रेलयात्रा का रोमांचक अनुभव साझा करते हुए आगे बताया कि कैसे 70 के दशक में जब उन्हें और अम्मा को रामेश्वरम जाना था तो कानपुर से मद्रास के लिए बड़ी जद्दोजहद के बाद लंबी लाइन में लगकर महीनों पहले से ही आरक्षण करवाना पड़ा था, तब जाकर कहीं द्वितीय श्रेणी के शयन कक्ष में दो बर्थ मिली । बड़ी मुश्किलों का सामना करते हुए स्टेशन की ओर जाने वाले रास्ते में घूमते आवारा जानवरों के बीच में से जब वे लोग नियत समय पर स्टेशन पहुँच गए, वहां बैठने के काफी देर बाद भी जब ट्रेन नहीं आयी और इन्तज़ार करते करते दो घंटे बीत गए तब तो स्टेशन के आसपास पड़ी गंदगी और बदबूदार माहौल के बीच एक भी पल काटना दूभर हो रहा था। अंततः बिना देरी की सूचना के पूरे तीन घंटे के इंतज़ार के बाद जब ट्रेन आयी तो गाड़ी के प्लेटफॉर्म पर ठहरते ही डिब्बे में चढ़ने वाली और उस पर से उतरने वाले भीड़ का रेला आपस में भिड़ गया । बमुश्किल वह अम्मा को लेकर डिब्बे में प्रवेश कर सके। दादा जी जब अपनी इस लंबी और साहसिक रेलयात्रा के अनुभवों को मुझसे साझा कर रहे थे , तभी हमारे कोच में रेल केटरिंग की तरफ से एक महाशय रात के खाने का आर्डर लेने आये, क्योंकि दादाजी को हल्का खाना ही खाने की हिदायत थी सो उनका साथ देने के लिए मैंने भी अपने लिए हलके भोजन का आर्डर दे दिया ।

छोटे छोटे स्टेशनों को पार करते हुए ट्रेन अपनी पूरी गति से चल रही थी। रेल के आधुनिकीकरण और जीपीएस तथा और भी नयी नयी तकनीकों से संबद्ध होने की वजह से रात्रि होने के बावजूद मुझे अपनी लोकेशन का सही सही पता चल रहा था और अभी मुम्बई आने में कुछ समय शेष भी था इसलिए मैं फिर से दादाजी की मद्रास वाली रेलयात्रा के आगे के अनुभव जानने के लिए उत्सुक थी । मेरी बात मानते हुए दादाजी ने आगे बताया कि जैसे ही वो डिब्बे में प्रवेश करते हुए अम्मा को लेकर टिकेट में अंकित अपनी बर्थ पर गए तो देखा कि उनकी बर्थ पर दूसरे महाशय अपनी धर्मपत्नी के साथ कब्ज़ा किये बैठे हैं, बोले कि- उन्हें भी यही बर्थ दी गयी है, अब काटो तो खून नहीं। कैसे होगा मद्रास तक का सफर। दादाजी ने अम्मा को, महाशय जी की धर्मपत्नी जी के बगल में बची सांस लेने भर की जगह में डट जाने का इशारा किया। अम्मा भी फिर कहाँ चुपचाप खड़ी रहने वालों में से थी , तुरंत रत्तीभर की जगह में देखते ही देखते वो रम गयी। यहीसब चल रहा था कि टी टी आये , उन्होंने सब सुना , टिकेट देखा, दबी ज़ुबान से उन यात्री महाशय और उनकी अर्धांगिनी जी को अपने साथ ले गए। कहीं और बैठा दिया। बाद में पता चला कि उन सज्जन को किसी प्रभावशाली कुली महाशय ने अलग से कोच में सफर का आश्वासन देकर बैठा दिया था लेकिन ताज्जुब कि, कुली द्वारा कराये गए आरक्षण का लाभ उनको मिला है, ये तब पता चला जब वे मद्रास स्टेशन पर उतरे और मुस्कुराकर बोले ,”बेटा, ट्रेन में सफर जुगाड़ से होता है।“ दादा जी ने अपनी उस अभूतपूर्व यात्रा के तीसरे दौर के बारे में बताया कि किस तरह से एक वृद्ध जोड़ा जो की तीर्थ यात्रा पर जा रहा था , पूरी यात्रा के दौरान उन्होंने न तो रेलवे केटरिंग का भोजन ग्रहण किया और न ही बाहर के विक्रेताओं से कुछ भी ख़रीदा। उन्होनें जो भी ग्रहण किया उसे मिट्टी के तेल के स्टोव पर कोच के भीतर ही बनाया। लाख समझाने पर भी वो नहीं माने, टी टी भी हार गए, समझाकर चले जाते थे और वो थे की अपने में खोए थे, उन्हें न तो किसी के खतरे का एहसास था और न ही इस बात की चिंता कि अन्य सह यात्रियों को भाप, धुंए और तेल की महक से क्या परेशानी हो रही है।

दादा जी अपनी इस रोमांचक और जोखिम भरी रेल यात्रा के अनुभवों को साझा कर ही रहे थे कि तभी ट्रेन एक बड़े स्टेशन पर रुकी । स्टेशन चारों तरफ रौशनी से जगमगा रहा था , चहल पहल भी थी। बड़ा ही साफ़ सुथरा स्टेशन था । कुछ यात्रीगण अपनी अपनी ट्रेन को पकड़ने के लिए प्लेटफॉर्म के अंदर आ रहे थे तो कुछ ट्रेन से उतरकर उन्हें लेने आये परिजनों से गले मिलकर ख़ुशी का इजहार कर रहे थे। दादा जी से बातें करते करते ही हमने अपना अपना रात्रि का भोजन ग्रहण किया।
फिर मैंने उन्हें रात्रि भोजन के बाद की दवा खिलाते हुए थोड़ा आराम करने को कहा और स्वयं भी अपनी साफ़ सुथरी बर्थ पर लेट गयी । क्योंकि मैंने जीपीएस के अनुसार अपने गंतव्य तक पहुँचने वाले समय का अनुमान लगा लिया था सो फ़ोन में अलार्म लगाकर सो गयी।

कुछ घंटों के बाद जब हम मुम्बई स्टेशन पर उतरे तो लग ही नहीं रहा था कि इतना लंबा सफर करके आये हैं, हम उतना ही फ्रेश महसूस कर रहे थे जितना गाड़ी में प्रवेश करते हुए। दादा जी भी बोले कि अभी तक अपनी उस अंतिम रेल यात्रा जो उन्होंने अम्मा के साथ मद्रास तक के लिए की थी, उसके कटु अनुभब उनके जेहन में ज़िंदा थे, लेकिन अब अपनी इस रेल यात्रा के सुखद और आरामदेह अनुभवों से वो बहुत खुश हैं।

इस यात्रा के बाद फिर मैंने कई और रेल यात्राएं की। कुछ अपने मित्रों के साथ ,तो कुछ परिवारीजनों के साथ। और इन सब यात्राओं के अनुभवों से मैंने पाया कि अब वो कुछ छोटी दूरी की गाड़ियों को छोड़कर किसी भी गाडी में लकड़ी वाली कष्टदायक सीटें नहीं हैं, कोच साफ़ सुथरे हैं तथा शौचालय भी अधिकांश ट्रेनों में साफ़ मिलते हैं। वहां पानी भी होता है, हाथ साफ करने के लिए लिक्विड सोप और टॉयलेट पेपर भी । लेकिन अनारक्षित कोचों में अभी इन सुविधाओं की काफी कमी खटकती है और वो शायद दूर भी नहीं की जा सकती क्योंकि इनमें अधिकांश ऐसे मुसाफिरों की अनियंत्रित भीड़ होती है जो सुख समृद्धि और संम्पन्नता की कल्पना से दूर एक उन्मुक्त परिवेशीय जीवन शैली के हिमायती होते हैं। यह सत्य है कि इधर हाल के कुछ वर्षों में ट्रेन सुविधाओं में प्रसार होने के साथ ही ट्रेन परिचालन में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। प्लेटफॉर्म के सुंदरीकरण से लेकर ट्रेनों की संख्या, उनकी गति तथा ट्रेन के माध्यम से दूरस्थ राज्यों तथा छोटे से बड़ों शहरों को जोड़ने की प्रक्रिया में विस्तार हुआ है। पर्यावरण अनुकूल शौचालय, कूपे में यात्रियों को इलेक्ट्रॉनिक सिंबल के द्वारा प्लेटफॉर्म का दिशा ज्ञान, वाई फाई सुविधा, उच्च श्रेणी के कूपों में सुगम संगीत का प्रसारण आदि उच्चीकृत तकनीकी के द्वारा से ट्रेन यात्रा को लोकप्रिय बनाने में सफल प्रयोग हुआ है।

विश्व की इस सबसे बड़ी रेल श्रृंखला को अभी और उच्चीकृत करने की आवश्यकता है ताकि यह यात्रियों के आकर्षण का केंद्र बन सके।

भारतीय रेलवे की उन्नति के लिए यह भी आवश्यक है कि स्टेशन तक पहुँचने वाले मार्गों (एप्रोच रोड्स) को बेहतर बनाया जाये। अभी भी अनेक शहरों में स्टेशन के आसपास एक किलोमीटर तक की सड़कें गड्ढा युक्त हैं, जलभराव से ग्रसित है जिसके परिणामस्वरूप यात्रियों को स्टेशन तक पहुँचने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, किसी तरह यदि स्टेशन पहुँच भी जाएं तो प्लेटफॉर्म पर टहलते हुए आवारा जानवर जैसे गाय, कुत्ते, साँड़ आदि, यात्रियों के लिए बड़ी परेशानी का सबब बनते हैं। अवैध खान पान से जुड़े विक्रेताओं के द्वारा संदूषित ढंग से बनायीं व बेचीं जा रही खाद्य वस्तुएं अंजान बीमारियों को न्योता देने का पर्याय बनी हुई है। इस पर रोक लगाना वांछनीय है।

ट्रेन के कूपे में सब ओर तो सफाई है, लेकिन एक दृश्य शूल सा चुभता है, वह है बंद डिब्बे वाले भोजन का भण्डारण कूपों में अक्सर ऐसी जगह किया जाता है जो शौचालय के करीब और बदबू के वातावरण से घिरा होता है।
अपने मुम्बई के सुविधाजनक सफर के बाद मैंने होली में ट्रेन से ही घर जाने का निश्चय किया और शताब्दी के द्वितीय श्रेणी कुर्सी यान के लिए आरक्षण करवाया। लेकिन इस बार की रेलयात्रा में मुझे कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा। वो ये कि मुझे अपना एक छोटा सा ब्रीफ़केस भी लगेज रैक पर रखने का स्थान नहीं मिला और दूसरा ये कि आरक्षित कुर्सियां कोच में सीटों के दरमियान कम फासला होने के कारण पूरी यात्रा में पैरों को सिकोड़कर बैठे रहने के लिए मजबूर होना पड़ा जिसके चलते मेरे जोड़ों का दर्द और भी बढ़ गया तथा यात्रा मेरे लिए पीड़ादायी हो गयी।

अतः सीटों के बीच यदि कुछ जगह बढ़ा दी जाए तो जोड़ रोग से पीड़ित यात्रियों को काफी रहत मिलेगी, ऐसा मेरा मानना है। तथा किसी भी श्रेणी में सामान ले जाने की एक निश्चित सीमा का पालन न हीने से कूपे में सफर कर रहे यात्रियों के सामान रखने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। यदि सभी यात्री निर्धारित सीमा में आने सामान को साथ रखे तो यात्रा का आनंद सभी उठा सकेंगे। सामन अधिक हो तो उसे ब्रेक वैन में रखे जाने संबंधी नियम का कड़ाई से पालन होना चाहिए।

यह प्रशंसनीय है कि रेल मंत्रालय ने ट्विटर के माध्यम से ट्रेन में होने वाली असुविधा की जानकारी रेल अधिकारियों , यहाँ तक कि रेल मंत्री जी को देने की सुविधा प्रदान की है तथा निवारण ,अर्पण और दिशा जैसी ऍप्लिकेशन्स के माध्यम से सीधे जनता से संवाद करने की पहल की है। और भी अच्छा होगा यदि कंपार्टमेंट्स में ट्विटर अकाउंट आईडी लिखवा दी जाये तो उससे यात्रियों का बड़ा वर्ग लाभान्वित हो सकेगा। आईडी के अभाव में अनेक यात्री अपनी समस्या को उच्च अधिकारियों तक नहीं पहुंचा पाते हैं।

ट्रेन में सफर करते हुए मैंने देखा है कि तकनीकी अनुकूल जिन यात्रियों ने होने वाली असुविधाओं की सूचना रेल मंत्रालय को दी है, तुरंत ही उसका समाधान हुआ है। इस अभूतपूर्व सुविधा की जितनी प्रशंसा की जाये कम होगी।
ऑफिस के काम से एक बार जब ट्रेन से मेरा केरल जाना हुआ, तो मैंने देखा की कुछ राज्य जैसे केरल और मध्य प्रदेश में लगभग हर बड़े और छोटे शहर के रेलवे स्टेशन जितने साफ़ सुथरे हैं वैसे अन्य प्रांतों के बड़े रेलवे स्टेशन भी नहीं।

केरल तक की यात्रा में अनेक असुविधाओं का सामना करके जब मैं केरल पहुंची तो वहां के स्टेशन और प्लेटफॉर्म की चमक देखते ही मेरी असुविधाजन्य पीड़ा काफूर हो गयी और बस एक ही वाक्य निकला- काश ! सभी स्टेशन ऐसे ही साफ़ रहे।
बात जब रेलवे की हो तो सुरक्षा संबंधी पहलू पर ध्यान न देना बहुत बड़ी भूल साबित हो सकती है। बात ट्रेन दुर्घटनाओं की हो या ट्रेन में होने वाली दुर्घटनाओं की, भारतीय रेलवे प्रणाली का सुरक्षा संबंधी पक्ष बीते कुछ वर्षों में कमजोर साबित हुआ है।
ट्रेन में महिलाओं के सफर को आसान बनाने के लिए अलग से महिला कोटा की सुविधा भारतीय रेल का सराहनीय प्रयास है लेकिन महिला विशेष कोचों के अतिरिक्त कोचों में भी महिलाओं की सुरक्षा पर ध्यान देना होगा। देश के सविंधान की मूल भावना जोकि समानता पर आधारित है उसका सम्मान बनाये रखते हुए भारतीय रेलवे को अनारक्षित डिब्बों में सफर करने वाली महिलाओं की सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा । क्योंकि भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में यह संभव नहीं है कि हर नागरिक अपने तथा अपने परिवार के लिए आरक्षण व्यवस्था का लाभ उठाकर ही रेल में सफर कर सके।

जबकि भारतीय रेलवे रेल हादसों की संख्या में कमी लाने की निरंतर कोशिश कर रही है, और इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि वर्त्तमान और भविष्य में आगे कोई भी अनहोनी न होने पाए तथा लोगों का भरोसा देश के रेलवे प्रणाली पर बना रहे।
भारतीय रेल, भारत के लिए एक नित बहती जीवन धारा के सामान है तथा देश की बेहतर अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम् पहलू है और शायद इसी वजह से हम संजीदगी से देश के इस अहम् पहलू के नित नए आयामों तथा आने वाले समय के लिए भारतीय रेलवे में विकास की नयी नयी संभावनाओं को खोजने की कोशिश कर रहे हैं। गौरतलब है कि रेल मंत्रालय ने भारत सरकार की महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत मुहीम से जुड़कर रेलवे स्टेशनों, परिसर तथा रेलवे ट्रैक्स को साफ़ सुथरा तथा पर्यावरण अनुकूल बनाने में भी अपना विशेष योगदान दिया है।

देश ने विकास का लंबा सफर तय किया है और देश के साथ रेलवे ने भी विकास के सफर में उसका साथ दिया है। इसलिए यह सिर्फ भारतीय रेलवे की ही जिम्मेदारी नहीं बनती कि रेलवे परिसर तथा रेलवे ट्रैक्स स्वच्छ हों, अपितु प्रत्येक नागरिक, जो हर दिन सफर पर निकलने वाली भारतीय रेल के साथ सफर पर निकलता है , की जिम्मेदारी बनती है कि हम सब मिलकर देश के प्रति अपने कर्तव्य को समझते हुए भारतीय रेल की तरक्की से जुड़ी रेल मंत्रालय की हर मुहिम में सक्रिय भागीदारी करें और जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय दें।

1 COMMENT

  1. भारतीय रेल की पूर्ववर्ती एवं आधुनिक व्यवस्थाओं की उपमा, अत्यंत सरल शैली में करता हुआ यह लेख, निश्चित ही रेल मंत्रालय की भविष्य की योजनाओं हेतु एक प्रभावी मार्गदर्शक होगा। लेखिका को कोटिशः बधाई एवं शुभकामनाएँ 👌👌💐💐

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here